दिल्ली दंगा मामला: सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी देवांगना कलिता को गैर-भरोसेमंद दस्तावेज देखने की अनुमति देने वाले हाईकोर्ट के आदेश पर लगाई रोक

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें 2020 के दिल्ली दंगा साजिश मामले की आरोपी देवांगना कलिता को उन दस्तावेजों का निरीक्षण करने की अनुमति दी गई थी, जिनका इस्तेमाल अभियोजन पक्ष (पुलिस) अदालत में नहीं कर रहा है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने दिल्ली पुलिस की याचिका पर देवांगना कलिता को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की और अगली तारीख दो हफ्ते बाद तय की है। सुनवाई के दौरान पीठ ने मामले में हो रही देरी पर गंभीर रुख अपनाया। कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर इसी तरह की प्रक्रियाएं चलती रहीं, तो आप 10 साल में भी अपनी दलीलें पूरी नहीं कर पाएंगे और फिर शिकायत करेंगे कि मुकदमे में देरी हो रही है।

अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें

दिल्ली पुलिस की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एस. वी. राजू ने दलील दी कि कानून के तहत आरोप तय होने से पहले आरोपी को ऐसे किसी भी दस्तावेज को देखने का कोई अधिकार नहीं है, जिसका इस्तेमाल अभियोजन पक्ष केस में नहीं कर रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि कानूनी प्रक्रिया के इस चरण में कलिता द्वारा इन अतिरिक्त दस्तावेजों के निरीक्षण की मांग करने का कोई औचित्य नहीं बनता।

दूसरी ओर, कलिता के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के ही एक पूर्व फैसले का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि नियमों के अनुसार आरोप तय होने से पहले ही बचाव पक्ष को उन सभी दस्तावेजों की सूची उपलब्ध कराई जानी चाहिए, जिनका इस्तेमाल जांच एजेंसी केस साबित करने के लिए नहीं कर रही है।

READ ALSO  आंध्र प्रदेश सीआईडी ने कौशल विकास घोटाले में चंद्रबाबू नायडू की आगे की हिरासत की मांग की

हाईकोर्ट का पिछला फैसला और उसकी शर्तें

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद दिल्ली हाईकोर्ट का बीती 5 जून का वह आदेश फिलहाल निलंबित हो गया है, जिसमें निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का हवाला दिया गया था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि भले ही मामला आतंकी गतिविधियों (यूएपीए) से जुड़ा हो, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखना अनिवार्य है। इसी आधार पर अदालत ने कलिता को उन अतिरिक्त दस्तावेजों का निरीक्षण करने की इजाजत दी थी, जिन्हें पुलिस ने मुख्य चार्जशीट में शामिल नहीं किया था।

हालांकि, हाईकोर्ट ने कलिता की उस मुख्य याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें उन्होंने पुलिस अधिकारियों के व्हाट्सएप चैट और कुछ विशिष्ट वीडियो फुटेज सौंपने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया था कि अभियोजन पक्ष पहले ही कलिता को मुख्य चार्जशीट, उससे जुड़े सबूत और दंगों के सभी प्रासंगिक वीडियो फुटेज सौंप चुका है। कोर्ट ने माना था कि पुलिस अधिकारियों के आंतरिक व्हाट्सएप ग्रुप और चैट कलिता के खिलाफ सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं हो रहे हैं, इसलिए इन्हें दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 207 के तहत सौंपना जरूरी नहीं है। अदालत का यह भी कहना था कि इन चैट्स में संवेदनशील या गोपनीय जानकारियां हो सकती हैं। इसके अलावा, कुछ सीसीटीवी फुटेज देने से भी इनकार किया गया था क्योंकि मामले में जांच जारी है और कई आरोपी अब भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं।

इस 5 जून के आदेश से पहले, हाईकोर्ट ने 12 सितंबर 2024 को एक अंतरिम आदेश जारी कर निचली अदालत पर आरोप तय करने के संबंध में कोई भी अंतिम निर्णय लेने पर रोक लगा दी थी, जिसे बाद में हटा लिया गया था।

READ ALSO  हाईकोर्ट जजों का होगा परफॉर्मेंस मूल्यांकन: सुप्रीम कोर्ट ने  अनावश्यक स्थगन और देरी पर जताई चिंता

दंगा मामले और इस विवाद की पृष्ठभूमि

देवांगना कलिता ने साल 2023 में हाईकोर्ट का रुख किया था। उनका दावा था कि दिल्ली पुलिस ने फरवरी 2020 में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के विरोध में चल रहे प्रदर्शनों की रिकॉर्डिंग के लिए कुछ लोगों को तैनात किया था। कलिता का कहना था कि यदि उस समय का पूरा वीडियो फुटेज अदालत के सामने आए, तो यह साबित हो जाएगा कि वह केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शन का हिस्सा थीं। उन्होंने पुलिस व्हाट्सएप ग्रुप के पूरे चैट रिकॉर्ड की भी मांग की थी और आरोप लगाया था कि उनके खिलाफ चैट्स के केवल चुनिंदा हिस्सों को ही पेश किया जा रहा है।

READ ALSO  गोद लेने की उम्र सीमा के करीब पहुंचे दंपत्ति को कलकत्ता हाईकोर्ट से बड़ी राहत, वरिष्ठता बहाल रखने का निर्देश

कलिता उन कई छात्र कार्यकर्ताओं और राजनीतिक हस्तियों में शामिल हैं, जिन्हें इस बड़ी दंगा साजिश के आरोप में दर्ज विभिन्न प्राथमिकियों (FIR) के तहत आरोपी बनाया गया है। इस मामले के अन्य मुख्य आरोपियों में नताशा नरवाल, उमर खालिद, शारजील इमाम, जामिया समन्वय समिति की सदस्य सफूरा जरगर और आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन शामिल हैं।

यह पूरा मामला फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़के सांप्रदायिक दंगों से जुड़ा है, जिसमें कम से कम 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles