पूर्व-गिरफ्तारी औपचारिकताओं का पालन सुनिश्चित किए बिना रिमांड पर विचार न करें: केरल हाई कोर्ट का सभी आपराधिक अदालतों को निर्देश; यौन उत्पीड़न मामले में वन अधिकारी को जमानत

केरल हाई कोर्ट ने राज्य की सभी आपराधिक अदालतों को निर्देश दिया है कि किसी आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेजने से पहले यह सुनिश्चित किया जाए कि गिरफ्तारी से पहले की सभी कानूनी औपचारिकताओं का पालन किया गया है। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित पूर्व-गिरफ्तारी प्रक्रियाओं का पालन किए बिना रिमांड पर विचार नहीं किया जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन ने गुरुवार को यह निर्देश देते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट या विशेष न्यायाधीश को रिमांड आदेश पारित करने से पहले कार्यवाही पत्र (प्रोसीडिंग शीट) में यह दर्ज कराना होगा कि गिरफ्तारी से पूर्व आवश्यक औपचारिकताओं का पालन किया गया है और इस संबंध में आरोपी की कोई आपत्ति नहीं है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि जांच अधिकारी द्वारा इन औपचारिकताओं का पालन नहीं किया गया है तो मजिस्ट्रेट या विशेष न्यायाधीश पहले संबंधित अधिकारी से इन प्रक्रियाओं का अनुपालन सुनिश्चित करें और उसके बाद ही रिमांड के प्रश्न पर विचार करें।

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जानबूझकर उल्लंघन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश

हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि अदालत को यह प्रतीत होता है कि जांच अधिकारी या गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी ने जानबूझकर इन औपचारिकताओं का पालन नहीं किया, तो संबंधित मजिस्ट्रेट या न्यायाधीश ऐसे अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश कर सकते हैं।

अदालत ने अपने आदेश की प्रति राज्य के सभी आपराधिक न्यायालयों और पुलिस महानिदेशक (DGP) को भेजने का निर्देश भी दिया, ताकि सभी जांच अधिकारियों और थाना प्रभारियों को इन प्रक्रियाओं के पालन और उल्लंघन के परिणामों के बारे में अवगत कराया जा सके।

यौन उत्पीड़न के आरोपी वन अधिकारी की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान आदेश

यह निर्देश अदालत ने एक उप वन क्षेत्राधिकारी (Deputy Range Forest Officer) की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान जारी किए। आरोपी पर अपने कार्यस्थल पर एक महिला बीट फॉरेस्ट अधिकारी के साथ यौन उत्पीड़न करने का आरोप है।

अभियोजन के अनुसार, 4 फरवरी को डिप्टी रेंज कार्यालय में बिजली चली जाने के कारण अंधेरा था। उसी दौरान महिला बीट अधिकारी अपने सहकर्मियों को टॉर्च की रोशनी में भोजन परोस रही थीं, तभी आरोपी ने कथित रूप से उन्हें अनुचित तरीके से छुआ।

हाई कोर्ट ने प्रथम सूचना बयान (First Information Statement) का अवलोकन करते हुए कहा कि आरोपों से प्रथम दृष्टया संबंधित अपराधों के तत्व स्पष्ट रूप से बनते हैं। अदालत ने आरोपी के वकील द्वारा प्रस्तुत “पूर्ण निर्दोषता” के तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

प्रथम अपराधी होने के आधार पर मिली जमानत

हालांकि, अदालत ने विशेष न्यायालय द्वारा नियमित जमानत से इनकार करने के आदेश को रद्द करते हुए आरोपी को राहत दी। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि आरोपी पहली बार अपराध में शामिल बताया गया है।

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हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि आरोपी को ₹1,00,000 के निजी मुचलके और समान राशि के दो जमानतदारों पर रिहा किया जाए, जो संबंधित विशेष अदालत की संतुष्टि के अधीन होंगे।

जमानत की शर्तों के तहत आरोपी को गवाहों को डराने-धमकाने या साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने से रोका गया है। उसे जांच में सहयोग करना होगा और जब भी जांच अधिकारी बुलाए, उपस्थित होना होगा।

अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी किसी भी प्रकार से शिकायतकर्ता को प्रभावित करने, धमकाने या प्रलोभन देने की कोशिश नहीं करेगा। यदि जमानत की अवधि के दौरान शिकायतकर्ता को परेशान करने की कोई घटना सामने आती है, तो यह जमानत रद्द करने का पर्याप्त आधार होगा।

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