सात साल से कम सजा वाले केस में रूटीन गिरफ्तारी न हो: इलाहाबाद हाई कोर्ट

प्रयागराज–इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रदेश के पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया है कि सात साल की सजा तक के व छोटी घटनाओं में कार्यवाई करने से पूर्व व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक व्यवस्था के मध्य संतुलन बनाने की कोशिश करें।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की नजीरों का हवाला देते हुए कहा कि पुलिस को ऐसे मामलों में गिरफ्तारी के रूटीन तरीके नही अपनाने चाहिए। कोर्ट ने यह आदेश नोएडा में तैनात एक ट्रैफिक पुलिस के सिपाही की अर्जी को आंशिक रूप से मंजूर करते हुए दिया है।

जस्टिस डॉ केजे ठाकर ने कॉन्स्टेबल वीरेन्द्र कुमार यादव की धारा 482 दप्रन्स के तहत दाखिल अर्जी निस्तारित करते हुए निर्देश दिया है कि याची के साथ किसी भी प्रकार की बलपूर्वक कार्यवाई न कि जाए

याचिकाकर्ता के पक्षकार वरिष्ठ अधिवक्ता विजय गौतम का कहना था कि याची की नोएडा में वीवीआइपी ड्यूटी थी। उसने अपने ड्यूटी के स्थान पर सही ड्यूटी की। बाद में पता चला कि एक ही वक्त में उसकी दो जगह ड्यूटी लगा दी गई थी। याची पर आरोप लगाया गया कि दो जगह ड्यूटी लगाने को लेकर हेड कांस्टेबल के साथ याची ने मारपीट की। इस घटना को लेकर याची के विरूद्ध थाना सेक्टर 20 नोएडा में 2018 में आईपीसी की धारा 332,323,504 और 506 के तहत मुकदमा दर्ज हुआ। वकील का कहना था की कि याची की इसमें कोई गलती नही थी।

पुलिस ने याचिकाकर्ता के विरूद्ध आरोप पत्र दाखिल कर फ़िया है। जिसे पूर्व में चुनौती दी गई थी। लेकिन कोर्ट ने यह कहकर खारिज कर दिया कि याची कोर्ट में उचित वक़्त पर डिस्चार्ज अर्जी दी और कोर्ट उस पर सकारण आदेश पारित करेगी।याची ने दोबारा याचिका दाखिल कर लोअर कोर्ट द्वारा डिस्चार्ज अर्जी खारिज कर देने के आदेश को चुनौती दी थी।

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कहा गया था कि याची सरकारी नौकरी में है और अगर वह अरेस्ट कर लिया गया तो उसे अपूर्णीय क्षति होगी। कहा गया था कि उस पर लगी सभी धारायें सात वर्ष से कम के सजा की है।

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