अवध बार एसोसिएशन, हाईकोर्ट लखनऊ ने कक्षा 8 के नए सामाजिक विज्ञान पाठ्यक्रम में “न्यायपालिका भ्रष्टाचार” (Judiciary Corruption) शीर्षक वाले एक खंड को शामिल करने के लिए राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। औपचारिक विरोध के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए पुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है, जो न्यायपालिका की छवि को धूमिल करने की कोशिशों पर कानूनी बिरादरी की गहरी चिंताओं की पुष्टि करता है।
NCERT और केंद्र सरकार को अवध बार का प्रतिवेदन
25 फरवरी, 2026 को NCERT के निदेशक और केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री को भेजे गए औपचारिक पत्रों में, अवध बार एसोसिएशन—जो कि 1901 में स्थापित 125 वर्ष पुरानी एक प्रतिष्ठित संस्था है—ने नए पाठ्यक्रम की “कड़ी निंदा” करते हुए “गहरी चिंता” व्यक्त की।
एसोसिएशन के अध्यक्ष पी. एस. चन्द्रा और महासचिव ललित किशोर तिवारी के नेतृत्व में बार ने तर्क दिया कि यह प्रकाशन “बिना सोचे-समझे और बेहद गैर-जिम्मेदाराना तरीके से” किया गया है।
अवध बार एसोसिएशन के प्रमुख तर्क:
- सार्वजनिक विश्वास का उल्लंघन: बार ने जोर देकर कहा कि न्यायपालिका उन लोगों के लिए “अंतिम आशा” है जो प्रताड़ित हैं या न्याय की गुहार लगा रहे हैं। “न्यायपालिका भ्रष्टाचार” नामक अध्याय के माध्यम से, NCERT कथित तौर पर उस “अटूट विश्वास” पर हमला कर रहा है जो एक आम नागरिक कानूनी प्रणाली में रखता है।
- छात्रों और समाज पर प्रभाव: एसोसिएशन ने रेखांकित किया कि कक्षा 8 के बच्चों को ऐसा पाठ्यक्रम पढ़ाना कानून-व्यवस्था के प्रति उनके विश्वास को कमजोर करेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि विश्वास के इस क्षरण से समाज में अपराध बढ़ सकता है, क्योंकि संविधान के संरक्षक के रूप में न्यायपालिका की छवि गंभीर रूप से प्रभावित होगी।
- ऐतिहासिक और संवैधानिक भूमिका: पत्रों में अधिकारियों को याद दिलाया गया कि भारतीय न्यायपालिका दुनिया की सबसे “उत्कृष्ट” प्रणालियों में से एक है, जो कानूनी और संवैधानिक व्यवस्था स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने कहा कि माननीय सुप्रीम कोर्ट और माननीय हाईकोर्ट संविधान के “मुख्य संरक्षक” हैं।
- तत्काल कार्रवाई की मांग: बार ने सभी पाठ्यपुस्तकों से इस अध्याय को तत्काल हटाने, इसकी बिक्री पर रोक लगाने और वेबसाइटों एवं सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से इस सामग्री को हटाने के लिए “डिजिटल सफाई” की मांग की।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णायक हस्तक्षेप
बढ़ते सार्वजनिक और कानूनी आक्रोश के बीच, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में प्रभावी ढंग से स्वतः संज्ञान लिया और इस प्रकाशन को न्यायिक संस्था की गरिमा को नष्ट करने की एक “सोची-समझी साजिश” करार दिया। देश के नंबर 1 लीगल न्यूज पोर्टल ‘लॉ ट्रेंड’ (Law Trend) के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने NCERT के “लापरवाह और प्रेरित” आचरण की कड़ी आलोचना की।
प्रमुख न्यायिक टिप्पणियां और आदेश:
- “संस्थान से खून बह रहा है”: न्यायिक कार्यवाही के दौरान, मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत ने टिप्पणी की, “उन्होंने गोली चला दी है। न्यायपालिका से खून बह रहा है।” उन्होंने आगे कहा कि कोर्ट का यह कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि इस तरह के गंभीर अपमान के लिए जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई हो।
- पूर्ण प्रतिबंध: सामग्री को “आपत्तिजनक” और “लापरवाह” बताते हुए, कोर्ट ने ‘Exploring Society: India and Beyond’ (Vol II) नामक पाठ्यपुस्तक के किसी भी भविष्य के प्रकाशन, पुनर्मुद्रण या डिजिटल प्रसार पर तत्काल और पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।
- प्रतियों की जब्ती: कोर्ट ने बाजार में मौजूद सभी भौतिक और डिजिटल प्रतियों को तुरंत जब्त करने का सख्त निर्देश दिया और चेतावनी दी कि किसी भी अन्य शीर्षक के माध्यम से इस आदेश का उल्लंघन करने की कोशिश को अवमानना माना जाएगा।
- जवाबदेही: NCERT के निदेशक और स्कूली शिक्षा विभाग के सचिव को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है कि क्यों न उनके खिलाफ न्यायपालिका के संस्थागत अधिकार को कम करने के लिए आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू की जाए।

