एक बार जब बैंक समझौता राशि स्वीकार कर लेता है और नो ड्यूज सर्टिफिकेट जारी कर देता है, तो वह मालिकाना हक के दस्तावेज नहीं रोक सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर एक रिट याचिका को स्वीकार करते हुए बैंक ऑफ इंडिया को गाजियाबाद स्थित एक आवासीय संपत्ति के मूल मालिकाना हक के दस्तावेज (टाइटल डीड) तुरंत जारी करने का निर्देश दिया है। जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता सीमा जैन के पक्ष में फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता ने मूल मालिक के कर्जदार बेटे के बकाया ऋण को एकमुश्त समझौता योजना (Compromise Settlement) के तहत चुका दिया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब बैंक ने समझौते की राशि स्वीकार कर ली और “नो ड्यूज सर्टिफिकेट” (देयता मुक्त प्रमाण पत्र) जारी कर दिया, तो उसके पास दस्तावेज रोकने का कोई कानूनी आधार नहीं रह जाता।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता सीमा जैन ने गाजियाबाद के गौशाला रोड स्थित प्रेम नगर (भट्टा जाट) में मकान नंबर 265 को उसके मूल मालिक (जो याचिका में प्रतिवादी संख्या 3 हैं) से 18 अक्टूबर 2002 को मुख्तारनामा (पावर ऑफ अटॉर्नी) धारक के रूप में खरीदा था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने संपत्ति पर भौतिक कब्जा प्राप्त कर लिया और नगर निगम के रिकॉर्ड में अपना नाम भी दर्ज (म्युटेशन) करा लिया।

इस संपत्ति पर बैंक का सुरक्षा हित (Security Interest) वर्ष 2000 में ही सृजित हो गया था, जो कि 2002 में निष्पादित सेल डीड से पहले का था। बैंक द्वारा मुख्य देनदार को 3 लाख रुपये की कैश क्रेडिट सीमा और 2 लाख रुपये का टर्म लोन दिया गया था।

वर्ष 2012 में, प्रतिवादी बैंक ने याचिकाकर्ता को कब्जे का नोटिस जारी किया और वित्तीय आस्तियों के प्रतिभूतिकरण और पुनर्गठन तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन (सरफेसी) अधिनियम, 2002 की धारा 14 के तहत कार्रवाई शुरू करने का प्रयास किया।

जब याचिकाकर्ता ने संबंधित बैंक प्रबंधक से संपर्क किया, तो उन्हें बताया गया कि कर्जदार (प्रतिवादी संख्या 3 के बेटे) का कोई अता-पता नहीं है। ऐसी स्थिति में, बैंक ने संपत्ति पर काबिज मालकिन (याचिकाकर्ता) के साथ एक समझौता किया। याचिकाकर्ता ने बकाया ऋण को निपटाने के लिए 5,50,000 रुपये (5,00,000 रुपये मूलधन और 50,000 रुपये ब्याज व अन्य शुल्क) का एकमुश्त भुगतान करने पर सहमति व्यक्त की।

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भुगतान के बाद, बैंक ने 15 मई 2013 को एक “नो ड्यूज सर्टिफिकेट” जारी किया, जिसका मूल पाठ इस प्रकार था:

“प्रमाणित किया जाता है कि मैसर्स चारू प्रोडक्ट्स, प्रोपराइटर श्री नरेश कुमार सुपुत्र श्री तीरथ दास, निवासी 265 प्रेम नगर, गाजियाबाद के खाता संख्या 711130100000019 और लोन खाता संख्या 711170400050035 को आपसी समझौते के तहत बंद कर दिया गया है। अब मैसर्स चारू प्रोडक्ट्स का कोई भी बकाया देय नहीं है।”

इस समझौते के बावजूद, बैंक ने मूल टाइटल डीड अपने पास ही रोक रखी थी। याचिकाकर्ता अपनी बेटी की शादी के लिए वित्तीय ऋण लेना चाहती थीं, लेकिन मूल दस्तावेजों के अभाव में वे किसी भी वित्तीय संस्थान से ऋण लेने में असमर्थ थीं। इसी कारण उन्हें हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता श्री राज कुमार सिंह और श्री रजत एरेन ने तर्क दिया कि नगर निगम के रिकॉर्ड के अनुसार याचिकाकर्ता संपत्ति की एकमात्र वास्तविक मालकिन हैं। चूंकि याचिकाकर्ता ने आपसी सहमति से हुए समझौते के तहत बैंक का पूरा बकाया चुका दिया है, इसलिए बैंक के पास मूल मालिकाना हक के दस्तावेजों को रोके रखने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।

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दूसरी ओर, प्रतिवादी बैंक के विद्वान अधिवक्ता श्री अशोक कुमार सिंह ने दलील दी कि मालिकाना हक के दस्तावेज केवल उसी व्यक्ति को लौटाए जा सकते हैं जिसने ऋण लिया था, और तीसरी प्रतिवादी (जिससे याचिकाकर्ता ने संपत्ति खरीदी थी) केवल एक गारंटर थीं। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि तीसरी प्रतिवादी का निधन हो चुका है और कर्जदार बेटे का कुछ पता नहीं है।

हालांकि, अदालती कार्यवाही के दौरान बैंक के वकील ने यह माना कि याचिकाकर्ता ने ऋण चुकाने के लिए 5,50,000 रुपये का भुगतान किया था और 15 मई 2013 को बैंक द्वारा नो ड्यूज सर्टिफिकेट भी जारी किया जा चुका है। उन्होंने निष्पक्षता से स्वीकार किया कि बैंक के जवाबी हलफनामे (Counter-Affidavit) में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह साबित हो कि बैंक का कोई बकाया लंबित है। उन्होंने इस बात पर भी असहमति नहीं जताई कि बैंक ने कभी भी याचिकाकर्ता के सेल डीड या संपत्ति के हस्तांतरण को चुनौती नहीं दी, भले ही बैंक का अधिकार वर्ष 2000 में बना था और रजिस्ट्री 2002 में हुई थी।

अदालत का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने मामले के अकाट्य तथ्यों का संज्ञान लेते हुए कहा कि नगर निगम के दस्तावेजों में याचिकाकर्ता ही इस संपत्ति की एकमात्र स्वामी और काबिज व्यक्ति दर्ज हैं। खंडपीठ ने रेखांकित किया कि उक्त सेल डीड पर कभी किसी पक्ष द्वारा कोई आपत्ति नहीं जताई गई और न ही इस संपत्ति से जुड़ा कोई दीवानी या आपराधिक मामला विचाराधीन है।

बैंक के रुख और उसके हलफनामे की समीक्षा करते हुए अदालत ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण टिप्पणी की:

“चूंकि याचिकाकर्ता नगर निगम के रिकॉर्ड में सुरक्षित संपत्ति की एकमात्र मालिक के रूप में काबिज है, और उक्त सेल डीड को कभी किसी ने चुनौती नहीं दी है, और न ही कोई दीवानी या आपराधिक मुकदमा लंबित है।”

दस्तावेज न लौटाने के बैंक के रवैये की आलोचना करते हुए अदालत ने आगे टिप्पणी की:

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“उपरोक्त परिस्थितियों को देखते हुए, हमारे विचार में बैंक द्वारा पैसे स्वीकार करने और नो ड्यूज सर्टिफिकेट जारी करने के बाद टाइटल डीड को रोके रखने का कोई औचित्य नहीं है, विशेषकर तब जब उसने याचिकाकर्ता की टाइटल डीड या नगर निगम के रिकॉर्ड पर कभी कोई सवाल नहीं उठाया।”

निर्णय

तदनुसार, हाईकोर्ट ने रिट याचिका को स्वीकार कर लिया और कहा कि समझौता राशि प्राप्त करने व नो ड्यूज सर्टिफिकेट जारी करने के बाद बैंक का दस्तावेज रोकना पूरी तरह से अनुचित है।

अदालत ने प्रतिवादी बैंक को एक परमादेश रिट (Writ of Mandamus) जारी करते हुए आदेश दिया कि वह 15 मई 2013 के नो ड्यूज सर्टिफिकेट के आलोक में विवादित मकान के मूल मालिकाना हक के दस्तावेज याचिकाकर्ता को सौंपे। बैंक को इस आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने की तारीख से दो सप्ताह के भीतर इस निर्देश का अनुपालन सुनिश्चित करने का आदेश दिया गया है।

मामले का विवरण

  • मामले का शीर्षक: सीमा जैन बनाम जोनल मैनेजर, बैंक ऑफ इंडिया व अन्य
  • केस संख्या: रिट सी संख्या 32865 वर्ष 2025 (न्यूट्रल साइटेशन: 2026:AHC:116981-DB)
  • पीठ: जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला
  • याचिकाकर्ता के वकील: श्री राज कुमार सिंह और श्री रजत एरेन
  • प्रतिवादी के वकील: श्री अशोक कुमार सिंह
  • दिनांक: 20 मई 2026

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