तमिलनाडु में गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध के हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की रोक

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें तमिलनाडु सरकार को राज्य भर में गायों और बछड़ों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया गया था। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने हाईकोर्ट के 27 मई के इस फैसले के खिलाफ राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए यह कदम उठाया और मामले में नोटिस जारी किया।

राज्य सरकार की दलीलें और कानून का हवाला

तमिलनाडु सरकार ने अपनी पैरवी के लिए वकील जयश्री नरसिम्हन के माध्यम से 9 जून को यह याचिका दायर की थी। सरकार का तर्क है कि हाईकोर्ट द्वारा लगाया गया यह पूर्ण प्रतिबंध कानूनी रूप से तर्कसंगत नहीं है। राज्य सरकार के अनुसार, मूल विवाद केवल इस बात पर था कि क्या बकरीद के अवसर पर बूचड़खानों से बाहर सार्वजनिक स्थलों पर गायों और बछड़ों की कुर्बानी दी जा सकती है। सरकार ने आरोप लगाया कि इस सीमित मुद्दे पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर चली गई और पूरे राज्य में पूर्ण प्रतिबंध का आदेश दे दिया, जो सीधे तौर पर न्यायिक कानून-निर्माण (जुडिशियल लॉ-मेकिंग) का मामला है।

अपील में स्पष्ट किया गया कि यह पूर्ण प्रतिबंध ‘तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958’ के मूल प्रावधानों के विपरीत है। इस कानून के तहत, यदि कोई सक्षम प्राधिकारी 10 वर्ष से अधिक उम्र की गाय को काम या प्रजनन के लिए अनुपयुक्त घोषित कर देता है, तो उसके वध की अनुमति है। इसके अतिरिक्त, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम (1960) और स्थानीय शहरी निकायों के नियम भी पशु वध पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाते, बल्कि इसके संचालन के लिए आवश्यक शर्तें और नियम तय करते हैं।

विवाद की शुरुआत और पुलिस का रुख

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यह कानूनी विवाद कोयंबटूर निवासी के. सूर्य प्रशांत की याचिका से शुरू हुआ था। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि स्थानीय प्रशासन ने उन गैर-निर्धारित जगहों पर होने वाली कुर्बानी को रोकने की उसकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया, जो वैध बूचड़खानों के दायरे में नहीं आतीं।

इसके जवाब में राज्य पुलिस ने हाईकोर्ट के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए बताया था कि अधिकारियों ने प्रस्तावित स्थान का निरीक्षण किया था। स्थानीय पुलिस के अनुसार, यातायात में कोई बाधा न आए और अन्य समुदायों की धार्मिक भावनाओं को ठेस न पहुंचे, इसके लिए आबादी से दूर एक बंद और गैर-सार्वजनिक स्थान पर अस्थायी शेड की व्यवस्था की गई थी। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में भी सरकार ने दोहराया कि उसने सार्वजनिक स्थानों पर वध रोकने के पर्याप्त इंतजाम किए थे और इसे केवल नियंत्रित और गैर-सार्वजनिक दायरे तक ही सीमित रखा गया था।

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हाईकोर्ट का संवैधानिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण

मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन और जस्टिस वी. लक्ष्मीनारायणन की खंडपीठ ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 48 का उल्लेख किया था। यह अनुच्छेद राज्य को गायों, बछड़ों और अन्य दुधारू या माल ढोने वाले मवेशियों के वध पर रोक लगाने के प्रयास करने का निर्देश देता है।

अपने फैसले को सही ठहराने के लिए हाईकोर्ट ने कई ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भों का सहारा लिया था। खंडपीठ ने संविधान सभा की बहसों का जिक्र करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में भगवान कृष्ण के समय से ही गाय को पूजनीय स्थान प्राप्त है। अदालत ने यह भी कहा कि कई मुस्लिम शासकों के काल में भी गोहत्या पर प्रतिबंध लागू था।

इसके साथ ही, अदालत ने महात्मा गांधी के गो-संरक्षण के प्रयासों और प्रसिद्ध विचारक धर्मपाल के शोध का भी उल्लेख किया। इस शोध का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा था कि भारत में बड़े पैमाने पर गोहत्या की शुरुआत ब्रिटिश औपनिवेशिक सेना की खान-पान की जरूरतों को पूरा करने के लिए की गई थी।

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अदालती फैसलों का संदर्भ

मद्रास हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा था कि इस्लाम में गाय की कुर्बानी देना कोई अनिवार्य धार्मिक अनुष्ठान या प्रथा नहीं है।

अदालत ने 1976 के एक सरकारी आदेश का भी उल्लेख किया, जिसे दूध उत्पादन बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए जारी किया गया था। हाईकोर्ट का मानना था कि कार्यपालिका और विधायिका की शक्तियां परस्पर जुड़ी हुई हैं, इसलिए सरकार का यह पुराना आदेश कानून के समान ही प्रभावी और लागू करने योग्य है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के इस नए अंतरिम आदेश के बाद हाईकोर्ट के वे सभी निर्देश फिलहाल निलंबित हो गए हैं, जिनमें तमिलनाडु के मुख्य सचिव और अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक को पूरे राज्य में गाय और बछड़ों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध सुनिश्चित करने के आदेश दिए गए थे।

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