सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अरावली पर्वतमाला की परिभाषा तय करने के लिए विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया और स्पष्ट किया कि क्षेत्र में केवल वैध खनन की ही अनुमति दी जा सकती है। अदालत ने फिलहाल खनन पर लगी रोक को जारी रखा है और कहा है कि प्रारंभिक मुद्दों पर स्पष्टता आने तक यथास्थिति बनी रहेगी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों के नाम और उनका प्रोफाइल प्रस्तुत करने को कहा। वरिष्ठ अधिवक्ताओं से भी प्रतिष्ठित विशेषज्ञों के सुझाव देने का अनुरोध किया गया है ताकि एक संतुलित समिति बनाई जा सके।
अदालत ने कहा कि मौजूदा मानदंड—जैसे 100 मीटर ऊँचाई और दो पहाड़ियों के बीच 500 मीटर की दूरी—से यह आशंका है कि अरावली के बड़े हिस्से को पर्यावरणीय सुरक्षा से बाहर किया जा सकता है। पीठ ने माना कि इन “महत्वपूर्ण अस्पष्टताओं” को दूर करना आवश्यक है, अन्यथा नियमों में ऐसी खामियाँ रह सकती हैं जो पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित करें।
सुनवाई के दौरान एक पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि उनकी कंपनी को लंबी कानूनी लड़ाई के बाद वैध खनन लाइसेंस मिला था, लेकिन अदालत के आदेश से काम रुक गया है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत केवल वैध खनन की अनुमति देगी, लेकिन पहले विशेषज्ञों से स्पष्ट परिभाषा तय कराई जाएगी।
पीठ ने यह भी स्वीकार किया कि लाइसेंस प्राप्त कंपनियों की गतिविधियाँ भी रुकी हुई हैं, लेकिन जब तक प्रारंभिक प्रश्नों का समाधान नहीं हो जाता, तब तक वर्तमान स्थिति बनाए रखना जरूरी है।
20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय की समिति की सिफारिशों के आधार पर अरावली की एक समान परिभाषा स्वीकार करते हुए दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में नए खनन पट्टों पर रोक लगा दी थी। बाद में पर्यावरणविदों की आपत्तियों और संभावित गलत व्याख्या की आशंका को देखते हुए 29 दिसंबर को अदालत ने अपने निर्देशों को स्थगित कर दिया और खनन गतिविधियों पर अस्थायी रोक लगा दी।
अदालत ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि वन सर्वेक्षण रिपोर्ट (25 अगस्त 2010) में चिन्हित अरावली क्षेत्रों में बिना उसकी अनुमति कोई नया खनन स्वीकृत नहीं किया जाएगा।
एमिकस क्यूरी के. परमेश्वर पहले परिभाषा से जुड़े सुझाव अदालत को देंगे। सभी पक्षों को 10 मार्च तक लिखित नोट दाखिल करने को कहा गया है। अगली सुनवाई में विशेषज्ञ समिति का गठन और तय किए जाने वाले मुद्दों की रूपरेखा तय की जाएगी।
यह समिति तय करेगी कि कानूनी रूप से अरावली की सीमा और संरचना क्या मानी जाएगी और उसी आधार पर भविष्य में खनन की अनुमति या रोक का निर्णय लिया जाएगा।

