आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट (अमरावती) ने एक ज्वाइंट वेंचर फर्म द्वारा दायर उस रिट याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें लगभग ढाई साल की देरी के बाद जीएसटी असेसमेंट आदेश को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह अपनी रिट अधिकारिता का प्रयोग करते हुए ऐसे आदेश को फिर से खोलने की अनुमति नहीं दे सकता, जो पहले ही वैधानिक ढांचे के तहत अंतिम रूप प्राप्त कर चुका हो। खासकर तब, जब याचिकाकर्ता कोर्ट को देरी (laches) का कोई संतोषजनक कारण बताने में विफल रहा हो।
मामले की पृष्ठभूमि
मेसर्स एकेआर कोस्टल जेवी (याचिकाकर्ता) ने दिसंबर 2025 में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत एक रिट याचिका दायर की थी। इस याचिका के जरिए वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए राज्य और केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) अधिनियम, 2017 की धारा 73 के तहत सहायक आयुक्त (एसटी) (एफएसी), कावली सर्कल द्वारा 27 फरवरी, 2023 को पारित एक असेसमेंट आदेश को चुनौती दी गई थी।
अधिनियम की धारा 107 के अनुसार, इस आदेश के खिलाफ अपील करने की वैधानिक समय सीमा तीन महीने थी। देरी की स्थिति में, अपीलीय प्राधिकारी उचित कारण बताए जाने पर केवल एक महीने की अतिरिक्त मोहलत दे सकता था। इस मामले में, अपील दायर करने की यह पूरी समय सीमा जून 2023 में ही समाप्त हो चुकी थी, लेकिन याचिकाकर्ता ने कोई अपील दायर नहीं की।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता ने इस भारी देरी को उचित ठहराने के लिए तर्क दिया कि उसका एक ज्वाइंट वेंचर (J.V.) पार्टनर नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) द्वारा दिवालिया घोषित हो चुका था और लिक्विडेशन की प्रक्रिया में था। इसके अलावा, दूसरे पार्टनर के खिलाफ भी दिवालियापन की कार्यवाही नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT), चेन्नई में लंबित थी, जहां से उन्हें स्टे मिल चुका था।
कंपनी ने यह भी दलील दी कि सरकारी ठेकों से बकाया राशि और जीएसटी का भुगतान न होने के कारण उन पर भारी वित्तीय संकट आ गया था। इसके चलते टैक्स का कामकाज देखने वाले अकाउंटेंट समेत कई कर्मचारियों ने नौकरी छोड़ दी, जिससे आदेश को समय पर चुनौती देने के लिए कदम नहीं उठाए जा सके।
याचिकाकर्ता तभी हाईकोर्ट पहुंचा जब पहले प्रतिवादी ने रिकवरी के लिए कड़े कदम उठाते हुए 16 सितंबर, 2025 को कार्यकारी अभियंता (एग्जीक्यूटिव इंजीनियर), नेल्लोर सेंट्रल डिवीजन को गार्निशी नोटिस (Garnishee Notice) जारी कर विवादित टैक्स, ब्याज और जुर्माने की वसूली की प्रक्रिया शुरू की।
कोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस रवि नाथ तिल्हरी और जस्टिस महेश्वर राव कुंचम की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता के स्पष्टीकरण का विश्लेषण किया और पाया कि इसमें ठोस विवरण और सटीक तारीखों का अभाव है।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“उपरोक्त स्पष्टीकरण बिना किसी विशिष्ट विवरण के है। यहां तक कि तारीखों का भी उल्लेख नहीं किया गया है। हमारे विचार में, बताया गया कारण विवादित आदेश को चुनौती देने के लिए अपील दायर करने के आड़े नहीं आ सकता था। स्पष्टीकरण के अनुसार ही, अपीलीय ट्रिब्यूनल के समक्ष अन्य कानूनी कार्यवाही की गई थी। तो, याचिकाकर्ता निश्चित रूप से विवादित आदेश के खिलाफ भी कानूनी रास्ता अपना सकता था।”
कोर्ट ने देरी के बचाव को खारिज करते हुए आगे कहा:
“स्पष्टीकरण अपनी प्रामाणिकता या सत्यता के प्रति विश्वास पैदा नहीं करता है। यह पर्याप्त कारण नहीं माना जा सकता। रिट याचिका उस आदेश के लगभग ढाई साल बाद दायर की गई है, जिसने वैधानिक प्रावधानों के तहत अंतिम रूप प्राप्त कर लिया है। कोर्ट की संतुष्टि के लिए देरी को स्पष्ट नहीं किया गया है।”
वैधानिक आदेशों की अंतिम प्रकृति को रेखांकित करने के लिए, हाईकोर्ट ने नीलिमा श्रीवास्तव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [(2021) 17 SCC 693] के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा जताया और उस फैसले के पैराग्राफ 35 को उद्धृत किया:
“35. इस प्रकार, यह बहुत अच्छी तरह से स्थापित है कि पक्षों के लिए अदालत के निर्णयों को फिर से खोलना स्वीकार्य नहीं है क्योंकि यह न केवल अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग के समान हो सकता है, बल्कि न्याय प्रशासन पर भी इसका दूरगामी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।”
इस कानूनी सिद्धांत को लागू करते हुए, कोर्ट ने दृढ़ता से कहा:
“हम, रिट अधिकारिता का प्रयोग करते हुए, उस आदेश के लिए मामले को फिर से खोलने की अनुमति नहीं दे सकते, जिसने वैधानिक प्रावधानों के तहत बहुत पहले ही अंतिम रूप प्राप्त कर लिया है।”
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि वह इस रिट याचिका पर विचार करने के लिए इच्छुक नहीं है। बिना किसी जुर्माने (costs) के रिट याचिका को खारिज कर दिया गया और सभी लंबित अंतरिम आवेदनों को बंद करने का निर्देश दिया गया।
- मामले का शीर्षक: मेसर्स एकेआर कोस्टल जेवी बनाम सहायक आयुक्त (एसटी) (एफएसी), कावली सर्कल और 3 अन्य
- केस नंबर: रिट याचिका संख्या 35116/2025

