सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: SCBA में महिलाओं को आरक्षण, अब 2 साल का होगा कार्यकाल; वोटिंग के बदले नियम

देश की सबसे प्रभावशाली कानूनी संस्थाओं में से एक, ‘सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन’ (SCBA) के प्रशासनिक और चुनावी ढांचे में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बड़े बदलावों की घोषणा की है। कोर्ट ने एसोसिएशन की जवाबदेही और प्रतिनिधित्व बढ़ाने के उद्देश्य से कई ऐतिहासिक सुधारों को लागू करने का निर्देश दिया है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने इस संबंध में एक विस्तृत फैसला सुनाया। कोर्ट के नए आदेश के अनुसार, SCBA की कार्यकारी समिति के निर्वाचित पदाधिकारियों का कार्यकाल अब एक साल से बढ़ाकर दो साल कर दिया गया है। यह नया नियम साल 2027 से लागू होगा। इसके साथ ही, बार एसोसिएशन के चुनाव में महिलाओं और दिव्यांग वकीलों के लिए आरक्षण की व्यवस्था भी शुरू की गई है।

इन बड़े बदलावों को सुचारू रूप से जमीन पर उतारने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल आगामी SCBA चुनावों को एक महीने के लिए टाल दिया है। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम की जगह अब ये चुनाव अगस्त महीने में आयोजित किए जाएंगे।

प्रतिनिधित्व की नई पहल: महिलाओं और दिव्यांगों को आरक्षण

बार एसोसिएशन के नेतृत्व में विविधता लाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक अभूतपूर्व कदम उठाया है। नए निर्देशों के तहत, अब SCBA के राष्ट्रपति (अध्यक्ष) पद को छोड़कर अन्य सभी महत्वपूर्ण पदों पर महिला वकीलों और दिव्यांग वकीलों के लिए सीटें आरक्षित की जा सकेंगी।

इस व्यवस्था को मजबूती देने के लिए कोर्ट ने वोटिंग के नियमों में भी बदलाव किए हैं:

  • महिला वकील: वे महिला वकील ही वोट देने की पात्र होंगी, जिन्होंने पिछले दो वर्षों में सुप्रीम कोर्ट में कम से कम 50 बार अपनी उपस्थिति दर्ज कराई हो।
  • दिव्यांग वकील: दिव्यांग वकीलों को वोटिंग का अधिकार पाने के लिए पिछले दो वर्षों में कम से कम 5 बार कोर्ट में उपस्थित होना आवश्यक होगा।
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सक्रिय वकीलों की पहचान: वोटिंग के नए और कड़े नियम

अदालत ने वोटिंग पात्रता के पुराने ढर्रे को पूरी तरह बदल दिया है। अब केवल ‘प्रॉक्सिमिटी कार्ड’ (प्रवेश पत्र) के इस्तेमाल को सक्रिय वकालत का पैमाना नहीं माना जाएगा।

पीठ ने स्पष्ट किया कि प्रॉक्सिमिटी कार्ड या किसी पैनल में नाम होना अकेले वोटिंग की पात्रता तय नहीं कर सकता। मतदाता पात्रता की मुख्य पहचान कोर्ट के ‘रिकॉर्ड ऑफ प्रोसीडिंग्स’ (RoP) और रजिस्ट्री की रिपोर्ट होगी। प्रॉक्सिमिटी कार्ड के डेटा का उपयोग केवल किसी विवाद या विसंगति की स्थिति में सहायक सबूत के तौर पर किया जाएगा।

वोट देने के लिए विभिन्न श्रेणियों के तहत निम्नलिखित कड़े मापदंड तय किए गए हैं:

1. भौतिक और वर्चुअल उपस्थिति का अनुपात

किसी वकील की कुल योग्य उपस्थिति में से कम से कम 75% शारीरिक (भौतिक) रूप से होनी चाहिए। वर्चुअल उपस्थिति को अधिकतम 25% तक ही सीमित किया गया है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के डिजिटल पोर्टल को अपडेट किया जाएगा ताकि वर्चुअल उपस्थिति का अलग से सटीक रिकॉर्ड रखा जा सके।

2. एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड (AOR)

  • सामान्य श्रेणी: पिछले तीन वर्षों के दौरान प्रति वर्ष औसतन कम से कम 20 फाइलिंग होना आवश्यक है।
  • दिव्यांग श्रेणी: दिव्यांग एओआर के लिए यह सीमा प्रति वर्ष औसतन 5 फाइलिंग रखी गई है।

3. मध्यस्थ (Mediators)

ऐसे गैर-एओआर वकील जो कम से कम दो साल से सुप्रीम कोर्ट मध्यस्थता केंद्र के पैनल में सक्रिय हैं, उन्हें वोट देने के लिए इस अवधि में कम से कम 20 मध्यस्थता मामलों को संभालना होगा। दिव्यांग मध्यस्थों के लिए यह सीमा केवल 5 मामलों की होगी।

4. वरिष्ठ, बुजुर्ग वकील और सरकारी वकील

  • बुजुर्ग वकील (Veterans): जिन वकीलों के पास 25 साल से अधिक की SCBA सदस्यता है, वे वोट दे सकेंगे, बशर्ते उन्होंने पिछले पांच वर्षों में कम से कम एक बार मतदान किया हो।
  • सीनियर एडवोकेट: दिल्ली सहित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) जैसे गुरुग्राम, नोएडा और गाजियाबाद में रहने वाले वरिष्ठ वकील भी इन नए नियमों के तहत वोटिंग के पात्र होंगे।
  • सरकारी वकील: सरकारी वकीलों को तीन साल की न्यूनतम उपस्थिति की किसी भी अलग शर्त से छूट दी गई है।
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कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट में चैंबर आवंटित होना या चैंबर आवंटन की प्रतीक्षा सूची (वेटिंग लिस्ट) में होना वोटिंग पात्रता का आधार नहीं बनेगा।

चुनाव लड़ने के लिए तय हुईं उच्च योग्यताएं

अदालत ने केवल वोटरों के लिए ही नहीं, बल्कि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए भी योग्यता का पैमाना ऊंचा कर दिया है:

  • किसी भी पद के लिए: उम्मीदवार के पास SCBA की कम से कम 5 साल की स्थायी सदस्यता होनी चाहिए।
  • प्रमुख पदों के लिए: अध्यक्ष (President), उपाध्यक्ष (Vice-President), सचिव (Secretary) और कार्यकारी समिति के अन्य मुख्य पदों पर चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार को पिछले 10 वर्षों में सुप्रीम कोर्ट में कम से कम 10 साल तक नियमित रूप से वकालत (उपस्थिति) करने का अनुभव होना अनिवार्य है।

दशकों पुराने विवाद और सुधारों का इतिहास

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय बार एसोसिएशन की मतदाता सूची को केवल नियमित रूप से अभ्यास करने वाले वकीलों तक सीमित रखने के दशकों पुराने प्रयास का नतीजा है।

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इस कानूनी सुधार की यात्रा साल 2012 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से जुड़ी है, जिसमें SCBA के उप-नियम 18 के संशोधन को सही ठहराया गया था। यह संशोधन “वन बार, वन वोट” (एक बार, एक वोट) के सिद्धांत पर आधारित था, ताकि ऐसे बाहरी लोग चुनाव को प्रभावित न कर सकें जो नियमित रूप से सुप्रीम कोर्ट में अभ्यास नहीं करते हैं।

यह विवाद साल 2023 में तब फिर से गरमा गया जब SCBA की विशेष आम बैठक (Special General Body Meeting) ने सदस्यता, शुल्क और कार्यकाल सीमा से जुड़े आठ महत्वपूर्ण सुधार प्रस्तावों को खारिज कर दिया था। इसके बाद जस्टिस (अब मुख्य न्यायाधीश) सूर्यकांत और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने मामले में हस्तक्षेप किया।

सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2025 में पूर्व न्यायाधीश एल. नागेश्वर राव की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था। इस समिति ने कानूनी बिरादरी से करीब 170 सुझावों का अध्ययन किया, जिसमें वरिष्ठ वकील के.के. वेणुगोपाल, रंजीत कुमार और कपिल सिब्बल जैसे दिग्गजों के इनपुट भी शामिल थे।

साल 2025 के SCBA चुनावों के दौरान अनियमितताओं के आरोपों के बाद सुप्रीम कोर्ट का यह ताजा निर्देश बार एसोसिएशन के भीतर पारदर्शिता, गरिमा और पेशेवर नेतृत्व सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत रोडमैप तैयार करता है।

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