दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि चोरी की गई वस्तुओं की बरामदगी (रिकवरी) करना हिरासत में लेकर पूछताछ (custodial investigation) की “उचित आवश्यकता” के दायरे में नहीं आता है। कोर्ट ने एक कर्मचारी पर अपने मालिक के गोदाम से रुमाल चोरी करने के आरोप से जुड़े मामले में अग्रिम जमानत देते हुए यह टिप्पणी की। इसके साथ ही अदालत ने जांच अधिकारियों द्वारा इस बात की पड़ताल न करने पर भी सवाल उठाए कि क्या यह मामला टैक्स चोरी या ट्रेडमार्क विवाद से जुड़ा हो सकता है, क्योंकि रुमाल ‘नोकिया’ (Nokia) जैसे प्रसिद्ध ब्रांड नाम से बेचे जा रहे थे।
विधिक मुद्दा और परिणाम
यह मामला सदर बाजार पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर संख्या 401/2024 से संबंधित है, जिसमें आरोपी अनिल कुमार पर आईपीसी की धारा 381 (लिपिक या सेवक द्वारा चोरी) के तहत मामला दर्ज किया गया था। न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया ने आरोपी की अग्रिम जमानत अर्जी को स्वीकार करते हुए उसे ₹10,000 के निजी मुचलके और जांच में सहयोग करने की शर्त पर रिहा करने का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
शिकायतकर्ता के अनुसार, अनिल कुमार उसके यहां काम करता था और उसने अन्य कर्मचारियों (राजीव कुमार, हेमराज और राजन) के साथ मिलकर गोदाम से रुमाल के बंडल चोरी किए और उन्हें अन्य दुकानदारों को बेच दिया। याचिकाकर्ता जुलाई 2024 से अंतरिम सुरक्षा पर था और मामला विभिन्न बेंचों के समक्ष लंबित रहने के बाद अंततः न्यायमूर्ति कठपालिया की बेंच के पास आया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि अनिल कुमार के संबंध में जांच पूरी हो चुकी है और उसे झूठा फंसाया गया है। यह भी बताया गया कि मामले में नामजद अन्य सह-आरोपी अभी भी शिकायतकर्ता के साथ काम कर रहे हैं और उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार के वकील ने इसे एक “गंभीर अपराध” बताते हुए जमानत का विरोध किया। जांच अधिकारी (IO) ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि चोरी हुए रुमाल बरामद करने और अन्य सह-आरोपी को पकड़ने के लिए आरोपी की हिरासत जरूरी है। वहीं शिकायतकर्ता के वकील ने कुछ तस्वीरें पेश कीं, जिनमें कथित तौर पर अन्य दुकानदारों को ‘नोकिया’ ब्रांड के रुमाल बेचते हुए दिखाया गया था।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ
न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया ने जांच की दिशा पर गंभीर सवाल खड़े किए। कोर्ट ने गौर किया कि रुमाल ‘नोकिया’ ब्रांड के नाम से बेचे जा रहे थे, लेकिन जांच अधिकारी ने यह पता लगाने की कोशिश नहीं की कि क्या यह मामला ट्रेडमार्क विवाद या टैक्स चोरी से संबंधित है।
जांच के सिद्धांतों को स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“विभिन्न न्यायिक घोषणाओं के माध्यम से बार-बार यह स्पष्ट किया गया है कि जांच का उद्देश्य अपराध के जरिए अपराधी तक पहुंचना होना चाहिए, न कि केवल ऐसी सामग्री जुटाना जिससे प्रस्तावित अपराधी को किसी भी तरह अपराध से जोड़ा जा सके।”
हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता पर कड़ा रुख अपनाते हुए बेंच ने टिप्पणी की:
“कहने की आवश्यकता नहीं है कि ये (सामान की बरामदगी) हिरासत में जांच की उचित आवश्यकता का हिस्सा नहीं हैं। चोरी हुए रुमालों को बरामद करना जांच अधिकारियों का काम नहीं है।”
अदालत का फैसला
कोर्ट ने परिस्थितियों को देखते हुए आरोपी को उसकी स्वतंत्रता से वंचित करने का कोई ठोस कारण नहीं पाया। अदालत ने निर्देश दिया कि गिरफ्तारी की स्थिति में याचिकाकर्ता को ₹10,000 के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की एक जमानत पर रिहा किया जाए। साथ ही, याचिकाकर्ता को जांच अधिकारी द्वारा लिखित निर्देश मिलने पर जांच में शामिल होने का आदेश दिया गया है।
- मामले का शीर्षक: अनिल कुमार बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार)
- केस संख्या: अग्रिम जमानत आवेदन संख्या 2287/2024

