एक ऐसे समाज में जहां माता-पिता को भगवान का दर्जा दिया गया है, वहां एक बेटे ने अपनी बुजुर्ग और विधवा मां को घर में एक अदद कमरा और शौचालय देने के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने इस मामले पर सख्त रुख अपनाते हुए बेटे की याचिका को न सिर्फ खारिज कर दिया, बल्कि उस पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी ठोक दिया। अदालत ने प्राचीन उपनिषद के श्लोक ‘मातृ देवो भव’ का हवाला देते हुए बेटे के इस आचरण को भारतीय समाज के नैतिक पतन का एक बेहद दुखद उदाहरण बताया।
यह पूरा मामला दिवंगत पिता की संपत्ति पर अधिकार और मां-बेटे के बीच चल रहे कड़वे विवाद से जुड़ा है। जस्टिस कुलदीप तिवारी ने 20 मई को जारी अपने आदेश में भरण-पोषण ट्रिब्यूनल (Maintenance Tribunal) और अपीलीय ट्रिब्यूनल के फैसलों को बरकरार रखा। अब बेटे को तुरंत अपनी मां को घर में प्रवेश देना होगा, ग्राउंड फ्लोर का एक कमरा उनके लिए खाली करना होगा और तीन महीने के भीतर उनके लिए एक अलग शौचालय का निर्माण करवाना होगा।
आलीशान मकान, लेकिन मां के लिए जगह नहीं
इस कड़वे पारिवारिक विवाद की जड़ें महिला के दिवंगत पति द्वारा छोड़े गए 14 मरले के दो मंजिला आलीशान मकान से जुड़ी हैं। इतना बड़ा घर होने के बावजूद, बुजुर्ग मां को वहां रहने से पूरी तरह रोक दिया गया था। थक-हारकर बुजुर्ग मां को घर की चौखट लांघने का अधिकार पाने के लिए ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007’ के तहत ट्रिब्यूनल की शरण लेनी पड़ी।
स्थानीय ट्रिब्यूनल ने 15 मई 2025 को मां के पक्ष में फैसला सुनाया था। लेकिन बेटे ने इस फैसले को स्वीकार करने के बजाय अपीलीय ट्रिब्यूनल में चुनौती दी। 25 मार्च को जब अपीलीय ट्रिब्यूनल ने भी उसकी अपील खारिज कर दी, तो वह अपनी मां को हाईकोर्ट खींच लाया।
कोर्ट में बेटे की अजीबोगरीब शर्तें
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान बेटे के वकील सिद्धांत भोंसले ने कोर्ट के सामने दलीलें रखीं। उन्होंने दावा किया कि उनका मुवक्किल अपनी मां को साथ रखने के लिए तैयार तो है, लेकिन इसके लिए उसकी एक शर्त है—मां के अन्य बच्चों (यानी बेटे के भाई-बहनों) को इस घर में कदम रखने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।
इतना ही नहीं, बेटे ने मां के लिए अलग कमरा खाली करने और शौचालय बनवाने के आदेश का विरोध करते हुए तर्क दिया कि यह एक तरह से खुद उसे ही उसके घर से “आंशिक रूप से बेदखल” (partial eviction) करने जैसा होगा। वकील ने दोनों पक्षों के बीच चल रहे वसीयत के मुकदमों और मां द्वारा पहले दर्ज कराई गई एक पुलिस शिकायत का भी जिक्र किया, जिसमें मां ने बेटे पर जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगाया था।
‘मातृ देवो भव’ – हाईकोर्ट ने याद दिलाया कर्तव्य
हाईकोर्ट ने बेटे के इन तमाम तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया। जस्टिस कुलदीप तिवारी ने अपने लिखित आदेश में गिरते सामाजिक मूल्यों पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने तैत्तिरीय उपनिषद (शिक्षावल्ली 1.11.2) के प्रसिद्ध श्लोक को उद्धृत करते हुए बेटे को उसके नैतिक कर्तव्यों का एहसास कराया:
“मातृ देवो भव पितृ देवो भव आचार्य देवो भव अतिथि देवो भव।”
(अर्थात: अपनी माता को देवता के समान पूजनीय मानो, अपने पिता को देवता के समान मानो, अपने गुरु को देवता के समान मानो और अपने अतिथि को देवता के समान पूजनीय मानो।)
अदालत ने टिप्पणी की कि भारतीय संस्कृति में माता-पिता की सेवा को एक “पवित्र और अनिवार्य दायित्व” माना गया है। लेकिन बदलते दौर के साथ ये नैतिक मूल्य तेजी से खत्म हो रहे हैं। जस्टिस तिवारी ने कहा कि संसद को 2007 का यह कानून इसलिए बनाना पड़ा क्योंकि आर्थिक रूप से सक्षम बच्चे भी अपने माता-पिता को उनके जीवन के आखिरी पड़ाव पर बेसहारा छोड़ रहे हैं।
कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा, “यह मामला हमारे समाज की सांस्कृतिक बुनियाद और नैतिक मूल्यों से भटकाव का एक ज्वलंत उदाहरण है। याचिकाकर्ता का आचरण बेहद निंदनीय है।”
बुजुर्ग मां को तुरंत न्याय सुनिश्चित कराने के लिए हाईकोर्ट ने बेटे की याचिका को खारिज करते हुए आदेश दिया कि वह जुर्माने की 50,000 रुपये की पूरी राशि एक महीने के भीतर सीधे अपनी मां के बैंक खाते में जमा कराए।

