पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने पटियाला के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को समलैंगिक लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही दो बालिग महिलाओं की सुरक्षा याचिका पर तुरंत विचार करने का निर्देश दिया है।
इस रिट याचिका का निपटारा करते हुए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का हवाला दिया और समलैंगिक व एलजीबीटीक्यू (LGBTQ) समुदाय के सदस्यों के मौलिक अधिकारों और उनकी मानवीय गरिमा की सुरक्षा पर विशेष जोर दिया।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला पंजाब के पटियाला का है, जहाँ दो बालिग महिलाएँ एक साथ समलैंगिक लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही हैं। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, वे अपने परिवारों की मर्जी के खिलाफ जाकर एक साथ रह रही हैं, जिसके कारण उन्हें अपनी सुरक्षा का डर सता रहा है।
अपनी जान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने 14 मई, 2026 को एसएसपी पटियाला को एक आवेदन (Representation) सौंपा था। लेकिन जब पुलिस प्रशासन की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली, तो उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ‘परमादेश रिट’ (Writ of Mandamus) की मांग की।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई इस सुनवाई में याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील राहुल सोई पेश हुए। उन्होंने कोर्ट को बताया कि दोनों याचिकाकर्ता बालिग महिलाएँ हैं और आपसी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही हैं। उन्होंने दलील दी कि दोनों को अपने ही परिवारों से जान का खतरा है। वकील ने कहा कि यदि एसएसपी पटियाला को उनकी लंबित याचिका पर जल्द से जल्द उचित कार्रवाई करने का निर्देश दे दिया जाए, तो याचिकाकर्ता संतुष्ट होंगी।
अदालत ने इस मामले में केवल प्रतिवादी संख्या 1 से 3 (सरकारी प्रतिवादियों) को नोटिस जारी किया। पंजाब सरकार की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरल (A.A.G.) परनीत सिंह पंढेर ने कोर्ट का नोटिस स्वीकार किया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति एच.एस. ग्रेवाल ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले देवु जी. नायर बनाम केरल राज्य व अन्य (2024 SCC Online 351) पर भरोसा जताया।
हाईकोर्ट ने उल्लेख किया कि सुप्रीम कोर्ट ने देवु जी. नायर मामले में समलैंगिक जोड़ों और LGBTQ समुदाय के सदस्यों के अधिकारों, गोपनीयता और गरिमा की रक्षा के लिए विस्तृत गाइडलाइन्स जारी की थीं। जस्टिस ग्रेवाल ने सुप्रीम कोर्ट के उस महत्वपूर्ण निर्देश को भी उद्धृत किया, जिसमें कहा गया है:
“16(j). अदालत को यह स्वीकार करना चाहिए कि कुछ अंतरंग साथियों को सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ सकता है और कानून का तटस्थ रुख अपनाना अपीलकर्ता की मौलिक स्वतंत्रता के लिए नुकसानदेह होगा। इसलिए, जब कोई अदालत समलैंगिक, ट्रांसजेंडर, अंतर-धार्मिक या अंतर-जातीय होने के आधार पर अंतरंग साथियों द्वारा पुलिस सुरक्षा की याचिका पर सुनवाई कर रही हो, तो उसे अंतरिम उपाय के रूप में याचिकाकर्ताओं को तुरंत पुलिस सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए, भले ही यह साबित होना बाकी हो कि उन्हें गंभीर हिंसा और उत्पीड़न का वास्तविक खतरा है या नहीं। अंतरंग साथियों को दी जाने वाली ऐसी सुरक्षा उनकी निजता (privacy) और गरिमा (dignity) को बनाए रखने के उद्देश्य से होनी चाहिए।”
हाईकोर्ट का निर्णय
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के लिव-इन रिलेशनशिप के कानूनी दर्जे (Legal Status) पर कोई भी टिप्पणी किए बिना इस याचिका का निपटारा कर दिया।
अदालत ने एसएसपी पटियाला को निर्देश दिया कि वे 14 मई, 2026 के सुरक्षा आवेदन की गंभीरता और खतरे की आशंका का खुद मूल्यांकन करें। कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया कि एसएसपी “कानून के अनुसार ऐसे आवश्यक कदम उठाएं जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि निजी प्रतिवादियों (परिवारवालों) के हाथों याचिकाकर्ताओं के जीवन और स्वतंत्रता को कोई खतरा न पहुंचे।”
हालाँकि, हाईकोर्ट ने अपने आदेश के अंत में यह भी स्पष्ट कर दिया कि इस सुरक्षा निर्देश का मामले में कानून के मुताबिक शुरू की जा सकने वाली किसी भी दीवानी (Civil) या आपराधिक (Criminal) कार्रवाई पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

