सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक सरकार द्वारा 42 विधायकों और विधान पार्षदों (MLAs & MLCs) को विभिन्न सरकारी बोर्डों और निगमों का अध्यक्ष बनाकर उन्हें ‘कैबिनेट मंत्री’ का दर्जा देने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता को कर्नाटक हाई कोर्ट में पुनर्विचार याचिका (Review Petition) दायर करने की छूट दी है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने निर्देश देते हुए कहा, “हम याचिकाकर्ता को हाई कोर्ट के समक्ष पुनर्विचार याचिका दायर करने की स्वतंत्रता देते हुए इस याचिका को समाप्त (dispose) करते हैं।”
क्या है पूरा मामला और क्यों उठा विवाद?
यह पूरा विवाद कर्नाटक सरकार के 26 जनवरी 2025 को जारी एक आदेश से शुरू हुआ था। इस आदेश के तहत राज्य सरकार ने एक ही झटके में 34 विधायकों को कैबिनेट स्तर का दर्जा दे दिया, जबकि 8 विधायक पहले से ही इस दर्जे का लाभ ले रहे थे। एक साथ इतनी बड़ी संख्या में विधायकों को कैबिनेट का दर्जा देने से सरकार के इस कदम पर कई सवाल खड़े होने लगे।
सुप्रीम कोर्ट में यह अपील कर्नाटक राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (KSPCB) के कर्मचारी सूरी पयाला द्वारा दायर की गई थी। उन्होंने कर्नाटक हाई कोर्ट के 4 मार्च के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी प्रारंभिक याचिका को खारिज कर दिया गया था।
हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की मंशा पर उठाए थे सवाल
इससे पहले, मार्च में सुनवाई के दौरान कर्नाटक हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता सूरी पयाला के इरादों पर गंभीर सवाल उठाए थे। हाई कोर्ट का मानना था कि यह याचिका पूरी तरह से जनहित में नहीं है।
हाई कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा था, “हमें इस तर्क में दम नजर आता है कि यह याचिका पूरी तरह से जनहित से प्रेरित नहीं है, बल्कि याचिकाकर्ता की खुद की कुछ पदों को पाने की व्यक्तिगत आकांक्षाओं से जुड़ी है। कानूनन, जनहित याचिका (PIL) दायर करने वाले व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य है कि वह मामले में अपने संभावित निजी हितों का पूरा खुलासा करे, लेकिन इस मामले में याचिकाकर्ता ऐसा करने में पूरी तरह विफल रहा।”
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील के. परमेश्वर ने दलील दी कि हाई कोर्ट ने इस अत्यंत संवेदनशील और गंभीर विषय पर उचित ध्यान नहीं दिया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि जिन विभागों और निगमों को यह दर्जा दिया गया है, उनके पास अपना कोई निजी फंड नहीं होता; बल्कि उनका पूरा वित्तीय संचालन भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) से मिलने वाले सार्वजनिक पैसे से होता है।
‘कैबिनेट रैंक’ और सरकारी खजाने पर बोझ का तर्क
याचिका में विधायकों को बोर्ड और निगमों का अध्यक्ष बनाए जाने पर आपत्ति नहीं जताई गई है, बल्कि आपत्ति उन्हें ‘कैबिनेट का दर्जा’ दिए जाने को लेकर है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि विधायकों को यह दर्जा मिलने से उन्हें सरकारी खजाने से भारी-भरकम सुविधाएं दी जा रही हैं, जिनमें शामिल हैं:
- ऊंचा वेतनमान (Higher Salaries)
- सरकारी वाहन और ड्राइवर की सुविधा
- ईंधन भत्ता (Fuel Allowance)
- गृह किराया भत्ता (HRA)
- मुफ्त चिकित्सा प्रतिपूर्ति (Medical Reimbursement)
संविधान और नियमों के उल्लंघन का आरोप
कानूनी चुनौती में दलील दी गई है कि इस तरह विधायकों को कैबिनेट का दर्जा देना संविधान के कई प्रावधानों का सीधा उल्लंघन है:
- अनुच्छेद 164(1A) का उल्लंघन: यह अनुच्छेद किसी भी राज्य में मंत्रियों की कुल संख्या को सीमित करता है ताकि सरकार का अनावश्यक और मनमाना विस्तार न हो सके। आरोप है कि कैबिनेट रैंक देकर इस नियम को बाईपास किया जा रहा है।
- अनुच्छेद 191 (लाभ का पद): याचिका में कहा गया है कि ये नियुक्तियां ‘लाभ के पद’ के दायरे में आती हैं, जिसके तहत जनप्रतिनिधियों को अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
- अन्य कानून: इस याचिका में संविधान के अनुच्छेद 102, कर्नाटक विधानमंडल (अयोग्यता निवारण) अधिनियम 1956, और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 10 के उल्लंघन का भी दावा किया गया है।
“एक खतरनाक मिसाल”
याचिकाकर्ता ने चेतावनी दी कि यदि इस तरह के फैसलों को अदालती मंजूरी मिलती रही, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक बेहद खतरनाक परंपरा स्थापित करेगा। इससे विधायकों में अतिरिक्त पदों और सरकारी भत्तों को पाने के लिए लॉबिंग करने की होड़ मच जाएगी, जिससे न केवल जनता के पैसे का दुरुपयोग होगा बल्कि विधायी निष्पक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर से आम जनता का भरोसा भी उठ जाएगा।
अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को वापस राज्य स्तर पर भेज दिया है, सभी की निगाहें कर्नाटक हाई कोर्ट पर टिकी हैं, जहां याचिकाकर्ता अब इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल करेंगे।

