लापता व्यक्तियों के मामलों में तुरंत एफआईआर का आदेश सभी पर लागू, सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को दी अवमानना की चेतावनी

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि लापता व्यक्तियों के मामलों में पुलिस को तुरंत एफआईआर दर्ज करने का उसका निर्देश बिना किसी भेदभाव के सभी नागरिकों पर लागू होता है, चाहे उनकी उम्र या लिंग कुछ भी हो। शीर्ष अदालत ने कुछ राज्य सरकारों की इस धारणा पर कड़ा एतराज जताया कि यह नियम केवल बच्चों के लापता होने के मामलों तक सीमित है। इसके साथ ही, आदेश का पालन न करने वाले और अनुपालन हलफनामा दायर न करने वाले राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों और पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को कारण बताओ नोटिस जारी कर 5 अक्टूबर को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का निर्देश दिया गया है।

राज्यों की दलील को बताया जानबूझकर गढ़ी गई कहानी

न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने 5 अगस्त के अपने आदेश में कहा कि अदालत यह जानकर स्तब्ध है कि कुछ राज्य ‘व्यक्ति’ शब्द का अर्थ केवल बच्चों तक सीमित मान रहे हैं। पीठ ने इसे राज्यों द्वारा जवाबदेही से बचने के लिए जानबूझकर गढ़ी गई एक गलत और दुर्भावनापूर्ण दलील करार दिया। अदालत ने कहा कि पूर्व में जारी आदेश की भाषा पूरी तरह स्पष्ट और असंदिग्ध है, जिसके तहत ‘व्यक्ति’ शब्द में हर उम्र और लिंग का नागरिक शामिल है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिन राज्यों ने आदेश का सही भावना के साथ पालन नहीं किया है, वे प्रथम दृष्टया अवमानना के दोषी हैं और उनके शीर्ष अधिकारियों को 5 अक्टूबर को खुद उपस्थित होकर बताना होगा कि उन पर अवमानना की कार्रवाई क्यों न चलाई जाए।

पुलिस और गृह मंत्रालय के लिए mandatory निर्देश

इससे पहले 22 मई को मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने देश में 47,000 बच्चों के लापता रहने और संगठित अंतरराज्यीय मानव तस्करी गिरोहों की सक्रियता पर गहरी चिंता जताई थी। पीठ ने निर्देश दिया था कि किसी भी व्यक्ति के लापता होने की सूचना मिलते ही संबंधित पुलिस स्टेशन को बिना किसी प्रारंभिक जांच के या परिजनों पर जिम्मेदारी डाले तुरंत एफआईआर दर्ज करनी होगी। इस एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की अपहरण और तस्करी से जुड़ी धाराओं को जोड़ना अनिवार्य किया गया है।

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अदालत ने कहा कि किसी बच्चे के गायब होने पर पुलिस को शुरुआत से ही इसे अपहरण का मामला मानकर कार्रवाई करनी चाहिए ताकि जांच में कोई ढिलाई या देरी न हो। इसके साथ ही, केंद्रीय गृह मंत्रालय को एक अखिल भारतीय डिजिटल ग्रिड तैयार करने का निर्देश दिया गया है, जो देश के हर पुलिस स्टेशन को एक मंच से जोड़ेगा। इसमें मानव तस्करी, लापता महिलाओं और बच्चों के लिए एक विशेष पोर्टल होगा। अदालत ने सभी एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट्स को चार सप्ताह के भीतर पूरी तरह सक्रिय करने के निर्देश भी दिए थे।

बायोमेट्रिक सत्यापन और 24 घंटे में सुपुर्दगी का नियम

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लापता लोगों की खोजबीन के बाद की प्रक्रिया तय करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि किसी भी व्यक्ति के सकुशल मिलने या रेस्क्यू होने पर उसका तुरंत आधार सत्यापन कराया जाए या नया आधार कार्ड बनवाया जाए, ताकि बायोमेट्रिक डेटा के जरिए सही पहचान दर्ज हो सके। वहीं, बरामद किए गए बच्चों को 24 घंटे के भीतर उनके परिवारों को सौंपने का निर्देश दिया गया है, जब तक कि इस बात के संकेत न हों कि परिवार खुद उनके शोषण या तस्करी में शामिल था।

चेन्नई से लापता बच्ची के मामले से हुई थी शुरुआत

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यह संपूर्ण कानूनी प्रक्रिया जी. गणेश नामक व्यक्ति द्वारा मद्रास हाईकोर्ट में दायर याचिका से शुरू हुई थी। याचिकाकर्ता की बेटी 19 सितंबर 2011 को चेन्नई से रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हो गई थी, जिसके बाद न्याय की गुहार लगाते हुए यह मामला शीर्ष अदालत तक पहुंचा।

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