पंढरपुर मंदिर: मूर्तियों को क्षरण से बचाने के लिए केमिकल कोटिंग की मंजूरी, बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुजारियों की याचिका खारिज की

महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में स्थित प्रसिद्ध पंढरपुर मंदिर की भगवान विट्ठल और देवी रुक्मिणी की प्राचीन मूर्तियों को क्षरण से बचाने के लिए केमिकल कोटिंग (रासायनिक लेप) की जाएगी। बॉम्बे हाईकोर्ट ने श्री विट्ठल रुक्मिणी मंदिर समिति को इस संरक्षण कार्य को आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी है। इसके साथ ही अदालत ने स्थानीय पुजारियों और श्रद्धालुओं की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें केवल पारंपरिक ‘वज्रलेप’ विधि अपनाने की मांग की गई थी।

शास्त्रों और वैज्ञानिक आधार के बिना आपत्ति अमान्य: हाईकोर्ट

जस्टिस शैलेश पी ब्रह्मे की पीठ ने 7 अगस्त को जारी अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता अपने दावों के समर्थन में शास्त्रों या आगम ग्रंथों का कोई विशिष्ट नियम पेश करने में विफल रहे। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि मूर्तियों का क्षरण एक निरंतर होने वाली प्रक्रिया है और मंदिर प्रबंधन का यह वैधानिक कर्तव्य है कि वह वैज्ञानिक तरीकों से इनका रखरखाव करे।

अदालत ने पुजारियों के इस दावे को बेबुनियाद बताया कि रसायनों के इस्तेमाल से मूर्तियां अशुद्ध या अपवित्र होंगी। पीठ के अनुसार, वैज्ञानिक संरक्षण प्रयासों से मूर्तियों की धार्मिक पवित्रता पर कोई असर नहीं पड़ता। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की आपत्तियों को निरर्थक और बिना किसी वैज्ञानिक आधार के की गई केवल आशंकाएं करार दिया।

विशेषज्ञ रिपोर्ट के आधार पर लिया गया फैसला

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मंदिर समिति का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रसाद ढाकेफलकर ने अदालत को बताया कि मूर्तियों के संरक्षण का फैसला समिति ने अपने स्तर पर नहीं लिया है, बल्कि यह औरंगाबाद के उप अधीक्षक पुरातत्व रसायनज्ञ (डिप्टी सुपरिनटेंडेंट आर्कियोलॉजिकल केमिस्ट) की 19 दिसंबर 2025 की विशेषज्ञ रिपोर्ट पर आधारित है।

उन्होंने अदालत को यह भी अवगत कराया कि विशेषज्ञ मार्गदर्शन में इससे पहले भी चार मौकों पर मूर्तियों पर केमिकल कोटिंग की जा चुकी है, जिस पर तब याचिकाकर्ताओं ने कोई विरोध नहीं दर्ज कराया था।

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ट्रायल कोर्ट के फैसले को बताया त्रुटिपूर्ण

यह विवाद निचली अदालतों में विरोधाभासी फैसलों के बाद हाईकोर्ट पहुँचा था। इससे पहले 22 जून 2026 को ट्रायल कोर्ट ने यह मानते हुए केमिकल कोटिंग पर अंतरिम रोक लगा दी थी कि मूर्तियां अच्छी स्थिति में हैं और उन्हें तत्काल किसी लेप की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, 17 जुलाई 2026 को अपीलीय अदालत ने उस रोक को हटा दिया था, जिसके बाद याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट का रुख किया।

जस्टिस ब्रह्मे ने ट्रायल कोर्ट के आकलन को आधा-अधूरा, त्रुटिपूर्ण और निराधार बताते हुए कहा कि निचली अदालत के पास मूर्ति संरक्षण जैसे विशेषज्ञता वाले वैज्ञानिक विषयों का मूल्यांकन करने की दक्षता नहीं होती।

पंढरपुर मंदिर अधिनियम के तहत समिति के अधिकार

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दूसरी ओर, याचिकाकर्ता पुजारियों और श्रद्धालुओं की ओर से पेश अधिवक्ता ज्ञानेश्वरी एस उत्पाद और शांतनु गुरव ने तर्क दिया था कि पंढरपुर मंदिर अधिनियम, 1973 के तहत मंदिर समिति के पास मूर्तियों की कोटिंग कराने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। उन्होंने इस प्रक्रिया को गैर-पारदर्शी, मनमाना और अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया था।

हाईकोर्ट ने इन तर्कों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि 1973 के अधिनियम के तहत गठित मंदिर समिति एक कानूनी संस्था है, जिसका प्राथमिक दायित्व मूर्तियों की सुरक्षा और रखरखाव करना है। अदालत ने कहा कि इस कर्तव्य को केवल एक प्रशासनिक कार्य नहीं माना जा सकता, बल्कि यह मूर्तियों की पवित्रता और श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं की रक्षा से जुड़ा हुआ है।

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