2000 का बलात्कार मामला: डेरा प्रमुख धनवंत सिंह की 10 साल की सजा हाईकोर्ट से बरकरार, पीड़िता को 6 लाख रुपये मुआवजा

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने वर्ष 2000 के बलात्कार मामले में डेरा प्रमुख धनवंत सिंह की 10 साल की जेल की सजा और दोषसिद्धि को बरकरार रखा है। इसके साथ ही अदालत ने पीड़िता को 6 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। जस्टिस रमेश कुमारी की एकल पीठ ने 31 जुलाई को यह फैसला सुनाते हुए आरोपी और पीड़िता दोनों की तरफ से दायर अपीलों को खारिज कर दिया।

पीड़िता के बयान और कानून पर हाईकोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि कोई भी स्वाभिमानी महिला केवल अपने सम्मान को नीचा दिखाने या झूठा बयान देने के लिए अदालत में नहीं आती, जब तक कि उसके साथ वास्तव में ऐसी घटना न हुई हो। अदालत ने कहा कि बलात्कार का अपराध चार दीवारों के भीतर और आम लोगों की नजरों से दूर होता है, इसलिए इसमें किसी प्रत्यक्षदर्शी का होना संभव नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के ‘स्टेट ऑफ पंजाब बनाम गुरमीत सिंह’ मामले का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि यदि पीड़िता की गवाही भरोसेमंद और सत्य प्रतीत होती है, तो बिना किसी अन्य सबूत के केवल उसी के आधार पर दोषसिद्धि की जा सकती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यौन अपराधों से जुड़ी सामाजिक झिझक और लोक-लाज के कारण पीड़िता द्वारा घटना की तुरंत जानकारी न देना अस्वाभाविक नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि और बचाव पक्ष के दावे

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यह मामला 25-26 नवंबर 2000 की रात का है, जब होशियारपुर स्थित डेरा में आरोपी ने अपने श्रद्धालु की 20 वर्षीय बेटी को अपने कमरे में बुलाकर उसके साथ दुष्कर्म किया था। पीड़िता ने अगले दिन डेरा छोड़ दिया और 31 दिसंबर 2000 को अपने पिता को इस घटना के बारे में बताया। बाद में जालंधर पुलिस द्वारा मामला दर्ज किए जाने पर होशियारपुर की ट्रायल कोर्ट ने 2005 में धनवंत सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत 10 साल की सश्रम कैद और 10,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान धनवंत सिंह के वकील तजिंदरबीर सिंह ने एफआईआर में देरी और गवाहों की अनुपस्थिति का तर्क देते हुए बरी करने की मांग की। बचाव पक्ष ने आरोप लगाया कि डेरा के ट्रस्टियों द्वारा 30 लाख रुपये के गबन और भूमि समझौतों में जालसाजी के विवाद से ध्यान भटकाने के लिए आरोपी को झूठे मामले में फंसाया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि श्री अकाल तख्त साहिब द्वारा धनवंत सिंह को धार्मिक उल्लंघनों के लिए ‘तनखाहिया’ घोषित किया गया था, लेकिन उस समय भी यौन उत्पीड़न का कोई आरोप नहीं लगाया गया था।

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सजा की अवधि और मुआवजे पर अदालत का निर्णय

राज्य सरकार की ओर से सहायक अधिवक्ता जनरल सिद्धार्थ अत्री और पीड़िता के वकील नवकिरण सिंह व हरमीत सिंह ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को कायम रखने का अनुरोध किया। पीड़िता के वकीलों ने सजा बढ़ाकर उम्रकैद करने और मानसिक आघात तथा लंबी कानूनी लड़ाई के लिए उचित मुआवजे की मांग की।

हाईकोर्ट ने सजा बढ़ाने की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि समाज में अपराध रोकने के लिए सजा की कठोरता से अधिक उसकी निश्चितता महत्वपूर्ण होती है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप पीड़िता को पहुंची मानसिक ठेस और न्याय की लंबी लड़ाई को देखते हुए अदालत ने उसे 6 लाख रुपये का मुआवजा देने का फैसला सुनाया।

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