ट्रांसजेंडर अधिकार संशोधन कानून पर 17 अगस्त को अंतिम सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट, पुराने कार्डधारकों के अधिकारों पर जताई चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026’ की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 17 अगस्त को अंतिम सुनवाई करने का फैसला किया है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने पुराने कानून के तहत ट्रांसजेंडर पहचान पत्र हासिल कर चुके लोगों के अधिकारों और उनकी कानूनी स्थिति को लेकर गंभीर चिंता जताई है।

पुराने कार्डधारकों के अधिकारों की सुरक्षा पर जोर

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सोमवार को इस मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत की मुख्य चिंता उन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करना है, जिन्हें पिछले कानूनी ढांचे के तहत पहचान पत्र जारी किए जा चुके हैं।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील जयना कोठारी ने पीठ को बताया कि जब यह मामला अदालत में लंबित था, उसी दौरान केंद्र सरकार ने 25 मई को गजट अधिसूचना जारी कर संशोधित कानून लागू कर दिया। उन्होंने कहा कि पहचान पत्र जारी करने वाला ‘नेशनल पोर्टल फॉर ट्रांसजेंडर पर्सन्स’ फिलहाल बंद पड़ा है। कोठारी ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि पुराने पहचान पत्र धारकों के वैधानिक अधिकारों को छीनने से रोकने के लिए अंतरिम राहत दी जाए और इन कार्डों की वैधता पर यथास्थिति बनाए रखी जाए।

इलाज, यात्रा और आवास में आ रही व्यावहारिक दिक्कतें

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विभिन्न याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने नया कानून लागू होने के बाद आ रही व्यावहारिक समस्याओं से अदालत को अवगत कराया। पीठ को बताया गया कि जिन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों ने पासपोर्ट जैसे आधिकारिक दस्तावेजों में अपना जेंडर अपडेट करा लिया था, उन्हें अब विदेश यात्रा के दौरान अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है।

अदालत के ध्यान में यह बात भी लाई गई कि हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी करा रहे कई लोगों का इलाज डॉक्टरों ने बीच में ही रोक दिया है। इसके अलावा, मद्रास हाईकोर्ट में वकालत करने वाली एक ट्रांसजेंडर वकील ने अपनी निजी परेशानियां साझा करते हुए बताया कि उन्हें शहर में किराए पर मकान मिलने में भारी कठिनाई हो रही है। उन्होंने यह भी कहा कि हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान जज अक्सर उनके लिए ‘हिम’ (पुरुष सूचक शब्द) का इस्तेमाल करते हैं।

केंद्र सरकार ने मांगा समय, उत्तराधिकार के जटिल सवालों का दिया हवाला

केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय मांगा और मामले की अंतिम सुनवाई कराने के निर्णय का समर्थन किया।

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तुषार मेहता ने तर्क दिया कि इन याचिकाओं में उत्तराधिकार कानून से जुड़े कई जटिल कानूनी प्रश्न शामिल हैं, जिनका गहन परीक्षण आवश्यक है। उदाहरण देते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि यदि ‘जैविक रूप से पुरुष’ कोई व्यक्ति खुद को महिला के रूप में पहचानता है और बिना वसीयत छोड़े उसकी मृत्यु हो जाती है, तो उस पर हिंदू पुरुष या हिंदू महिला में से किसका उत्तराधिकार कानून लागू होगा? सॉलिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट से इस चरण में कोई अंतरिम आदेश जारी न करने की अपील करते हुए कहा कि इसमें कोई ऐसी आपात स्थिति नहीं है। हालांकि, जयना कोठारी ने अंतिम फैसला आने तक अंतरिम सुरक्षा की अपनी मांग दोहराई।

परिभाषा और संवैधानिक वैधता पर उठते सवाल

सोमवार को ही सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने केरल के एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति की ओर से दायर एक नई याचिका पर भी केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। वरिष्ठ वकील आनंद ग्रोवर के माध्यम से दायर इस याचिका में याचिकाकर्ता ने केरल लोक सेवा आयोग के खिलाफ पुलिस सब-इंस्पेक्टर पद (पुरुषों के लिए आरक्षित) पर आवेदन करने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस नई याचिका को मुख्य मामले के साथ टैग कर दिया है।

इससे पहले, अदालत ने 2026 के संशोधन अधिनियम की धारा 2(k) के परंतुक (प्रोवाइज़ो) को चुनौती देने वाली याचिका पर भी केंद्र से जवाब मांगा था। इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि संशोधन ने ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति’ की वैधानिक परिभाषा को सीमित कर दिया है और केवल स्वयं-महसूस की गई जेंडर पहचान (सेल्फ-परसीव्ड जेंडर आइडेंटिटी) के आधार पर पहचान रखने वालों को बाहर कर दिया है।

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याचिका के अनुसार, यह संशोधन सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक ‘नालसा बनाम भारत संघ’ (NALSA v. Union of India) फैसले में स्थापित जेंडर स्व-निर्धारण के सिद्धांत के विपरीत है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि स्व-पहचाने गए जेंडर को कानूनी मान्यता देने से इनकार करना संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के तहत प्राप्त समानता, गरिमा, स्वायत्तता, निजता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

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