सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि भर्ती प्रक्रिया के दौरान उम्मीदवारों के अंकों का खुलासा नहीं किया जाता है, तो केवल इसी आधार पर उनकी नियुक्ति का आदेश नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जब तक यह साबित न हो कि उम्मीदवारों ने चयन प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पास किया है, उन्हें नियुक्त करने का निर्देश देना उचित नहीं है। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट) और कलकत्ता हाईकोर्ट के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें दुर्गापुर स्टील प्लांट को प्रतिवादियों को ‘प्लांट अटेंडेंट’ के पद पर नियुक्त करने का निर्देश दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद 2007 में दुर्गापुर स्टील प्लांट (स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड की एक इकाई) द्वारा ‘प्लांट अटेंडेंट’ के पदों के लिए निकाली गई भर्ती से जुड़ा है। शुरुआत में 90 पदों के लिए विज्ञापन जारी किया गया था, जिसे बाद में बढ़ाकर 200 कर दिया गया। इस भर्ती के लिए लगभग 52,000 आवेदन प्राप्त हुए और 29,459 उम्मीदवार एक स्वतंत्र एजेंसी द्वारा आयोजित लिखित परीक्षा में शामिल हुए। पूरी प्रक्रिया के बाद कुल 194 उम्मीदवारों ने सेवा जॉइन की।
साल 2009 में, कुछ उम्मीदवारों (प्रतिवादियों) ने परीक्षा परिणाम और अपने अंकों के खुलासे की मांग करते हुए याचिका दायर की। मामला बाद में कैट, कलकत्ता बेंच में स्थानांतरित हो गया, जिसने 2018 में प्रतिवादियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनकी नियुक्ति का आदेश दिया। ट्रिब्यूनल का मानना था कि अंक घोषित नहीं किए गए और मुकदमेबाजी लंबित होने के बावजूद भर्ती रिकॉर्ड सुरक्षित नहीं रखे गए। कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी 27 सितंबर 2019 को इस आदेश की पुष्टि कर दी थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (दुर्गापुर स्टील प्लांट): प्लांट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्री रंजीत कुमार ने दलील दी कि लिखित परीक्षा का काम एक स्वतंत्र एजेंसी को सौंपा गया था और सभी 29,459 उम्मीदवारों के अंक प्रकाशित करने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं थी। उन्होंने कहा कि भर्ती प्रक्रिया पूरी होने के बाद रिकॉर्ड सद्भावना (bona fide) के साथ नष्ट कर दिए गए थे। इसके अतिरिक्त, उन्होंने तर्क दिया कि 2008 में पद की योग्यताएं बदल दी गई थीं, इसलिए पुरानी शर्तों पर नियुक्ति संभव नहीं है।
प्रतिवादी: प्रतिवादियों के वकील श्री सुभाशीष भौमिक ने तर्क दिया कि चयन प्रक्रिया मनमानी थी क्योंकि इसमें कट-ऑफ मार्क्स या मूल्यांकन का कोई स्पष्ट मानदंड साझा नहीं किया गया था। उन्होंने दावा किया कि चूंकि अपीलकर्ता रिकॉर्ड पेश करने में विफल रहे, इसलिए यह माना जाना चाहिए कि उम्मीदवारों ने परीक्षा पास कर ली थी।
कोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस पमिदिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने भर्ती नियमों और रिकॉर्ड के रखरखाव की कानूनी बाध्यता पर विचार किया।
1. नियुक्ति का कोई अनिवार्य अधिकार नहीं सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चयन सूची में नाम आने मात्र से किसी उम्मीदवार को नियुक्ति का अटूट अधिकार नहीं मिल जाता। कोर्ट ने कहा:
“यह कानून में सुस्थापित है कि जिस उम्मीदवार का नाम चयन सूची में आता है, उसे नियुक्ति का कोई अनिवार्य (indefeasible) अधिकार प्राप्त नहीं होता, जब तक कि ऐसी नियुक्ति का हकदार बनाने वाला कोई विशिष्ट नियम न हो।”
2. गैर-प्रकटीकरण बनाम पास होने का प्रमाण अदालत ने पाया कि प्रतिवादी यह साबित नहीं कर सके कि उन्होंने परीक्षा पास की थी। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“न तो भर्ती नियमों और न ही विज्ञापन में सभी उम्मीदवारों के अंकों के प्रकाशन की आवश्यकता थी… केवल इसलिए कि प्रतिवादियों को अनुत्तीर्ण नहीं दिखाया गया था, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उन्होंने लिखित परीक्षा पास कर ली थी।”
3. रिकॉर्ड का नष्ट होना कोर्ट ने अपीलकर्ताओं द्वारा रिकॉर्ड उपलब्ध न होने के स्पष्टीकरण को स्वीकार करते हुए कहा कि रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने की कोई निश्चित अवधि तय नहीं थी। पीठ के अनुसार:
“रिकॉर्ड उपलब्ध न होने या उनके नष्ट होने के संबंध में अपीलकर्ताओं का स्पष्टीकरण सद्भावनापूर्ण प्रतीत होता है। केवल ऐसे रिकॉर्ड पेश न करने से यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है कि प्रतिवादियों ने लिखित परीक्षा पास की थी।”
4. योग्यताओं में संशोधन सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि 2008 में प्लांट अटेंडेंट के पद के लिए योग्यताएं बदल दी गई थीं, जिसके कारण अब नियुक्ति का निर्देश देना संभव नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
पीठ ने कैट और कलकत्ता हाईकोर्ट के नियुक्ति संबंधी निर्देशों को खारिज कर दिया। हालांकि, यह देखते हुए कि प्रतिवादी संख्या 1 लगभग दो दशकों से कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं, कोर्ट ने उन्हें आर्थिक राहत देने का फैसला किया।
“ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट के आदेशों को रद्द करते हुए… मामले के विशेष तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, हम अपीलकर्ताओं को निर्देश देते हैं कि वे प्रतिवादी संख्या 1 को दो महीने के भीतर 5,00,000 रुपये (पांच लाख रुपये) की राशि का भुगतान करें।”
अदालत ने अपील को निस्तारित करते हुए स्पष्ट किया कि इस मामले में किसी भी पक्ष पर अदालती खर्च (costs) नहीं लगाया जाएगा।
केस विवरण
केस का शीर्षक: दुर्गापुर स्टील प्लांट एवं अन्य बनाम बिधान चंद्र चौधरी एवं अन्य
केस संख्या: सिविल अपील संख्या ____ वर्ष 2026 (एस.एल.पी. (सिविल) संख्या 41/2020 से उद्भूत)
पीठ: जस्टिस पमिदिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे
दिनांक: 7 मई, 2026

