शादी.कॉम के संस्थापक अनुपम मित्तल को सुप्रीम कोर्ट से राहत; गिरफ्तारी पर 8 हफ्ते की रोक, मामला फिर से तेलंगाना हाईकोर्ट भेजा

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को वैवाहिक प्लेटफॉर्म शादी.कॉम (Shaadi.com) के संस्थापक अनुपम मित्तल और दो अन्य अधिकारियों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही में हस्तक्षेप किया है। कोर्ट ने उन्हें आठ सप्ताह की अवधि के लिए किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से सुरक्षा प्रदान की है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने तेलंगाना हाईकोर्ट के उस पुराने आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें एफआईआर (FIR) को निरस्त करने से इनकार किया गया था। अब इस मामले पर हाईकोर्ट में नए सिरे से सुनवाई होगी।

इस मामले में मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या किसी मध्यस्थ (intermediary) वैवाहिक प्लेटफॉर्म के संस्थापक और अधिकारियों को उस धोखाधड़ी के लिए आपराधिक रूप से उत्तरदायी ठहराया जा सकता है जो किसी यूजर द्वारा की गई हो। इससे पहले तेलंगाना हाईकोर्ट ने मित्तल के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने से मना कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने अब उन याचिकाओं को फिर से बहाल कर दिया है और हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि वह मामले के गुणों (merits) पर विचार करे, साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि इस दौरान याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी न हो।

विवाद की शुरुआत हैदराबाद की एक महिला द्वारा दर्ज कराई गई आपराधिक शिकायत से हुई थी। शिकायतकर्ता का आरोप था कि शादी.कॉम पर मिले एक व्यक्ति ने फर्जी प्रोफाइल के जरिए उसके साथ 11 लाख रुपये की धोखाधड़ी की है। महिला का तर्क था कि प्लेटफॉर्म यूजर्स के विवरणों को ठीक से सत्यापित करने में विफल रहा, जिसके कारण उसे यह आर्थिक नुकसान हुआ।

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इस शिकायत के बाद अनुपम मित्तल और दो अन्य अधिकारियों—विग्नेश और सतीश—के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज की गई थी। पिछले साल तेलंगाना हाईकोर्ट ने इस कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद याचिकाकर्ताओं ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया। 26 जून को सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना सरकार को नोटिस जारी किया था और कार्यवाही पर रोक लगा दी थी।

अनुपम मित्तल का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता आत्माराम नाडकर्णी ने तर्क दिया कि यह प्लेटफॉर्म केवल एक मध्यस्थ या “मैचमेकर” के रूप में कार्य करता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सेवा केवल उपयोगकर्ताओं के बीच परिचय कराती है और किसी स्वतंत्र तीसरे पक्ष द्वारा किए गए आपराधिक कृत्यों के लिए प्लेटफॉर्म को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

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नाडकर्णी ने पीठ के समक्ष कहा, “मैं केवल मिलान की सुविधा प्रदान कर रहा हूँ। हम जांच में सहयोग कर रहे हैं। लेकिन मुझे आरोपी क्यों बनाया गया है?” उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि कथित धोखाधड़ी में प्लेटफॉर्म के नेतृत्व की कोई सीधी भूमिका नहीं थी।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने एफआईआर रद्द करने से इनकार करते समय मध्यस्थ के रूप में याचिकाकर्ताओं की जवाबदेही से जुड़ी कानूनी दलीलों पर पर्याप्त रूप से विचार नहीं किया था।

पीठ ने अपने आदेश में कहा:

“चूंकि निरस्तीकरण (quashing) याचिका पर गुण-दोष के आधार पर फैसला नहीं लिया गया था, इसलिए हम विवादित आदेश को रद्द करते हैं और मामले को गुण-दोष पर विचार करने के लिए हाईकोर्ट को वापस भेजते हैं। तदनुसार, आपराधिक मामलों को उनकी मूल फाइल पर बहाल किया जाता है। हाईकोर्ट द्वारा इसका निपटारा मेरिट के आधार पर किया जाएगा। इस अदालत ने मेरिट पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।”

याचिकाकर्ताओं की सुरक्षा के संबंध में कोर्ट ने मित्तल को निर्देश दिया कि वे हाईकोर्ट से अंतरिम राहत की मांग करें और तब तक के लिए एक अस्थायी सुरक्षा कवच प्रदान किया।

पीठ ने आगे कहा, “इस बीच, याचिकाकर्ता हाईकोर्ट के समक्ष अंतरिम राहत के लिए प्रार्थना करेंगे। आज से आठ सप्ताह की अवधि तक याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई भी दंडात्मक कदम नहीं उठाया जाएगा।”

सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए मामले को नए फैसले के लिए वापस भेजकर सुनवाई समाप्त की। अब हाईकोर्ट को यह तय करना होगा कि क्या शादी.कॉम के अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को पेश की गई दलीलों के आधार पर रद्द किया जाना चाहिए। ‘दंडात्मक कार्रवाई’ पर आठ सप्ताह की रोक से याचिकाकर्ताओं को अंतरिम जमानत और अन्य राहत के लिए हाईकोर्ट जाने का समय मिल गया है।

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