आयकर अधिनियम की धारा 132 के तहत तलाशी शक्तियों को चुनौती देने वाली PIL पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को आयकर अधिनियम की धारा 132 के तहत आयकर अधिकारियों को दी गई तलाशी और जब्ती की शक्तियों को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि यह प्रावधान बड़े कर चोरी मामलों से निपटने के लिए बनाया गया है और इसे केवल संभावित दुरुपयोग की आशंका के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती।

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि किसी वैधानिक प्रावधान को केवल इस आशंका के आधार पर असंवैधानिक नहीं माना जा सकता कि उसका दुरुपयोग हो सकता है। अदालत ने कहा कि कानून में उपलब्ध उपाय फिलहाल पर्याप्त हैं।

पीठ ने कहा, “हम किसी प्रावधान को इस हद तक संदेह की दृष्टि से नहीं देख सकते कि उसमें दिए गए उपायों को ही नकार दिया जाए। हमारे लिए उपलब्ध उपाय पर्याप्त हैं।”

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मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि कई बार कानून में ऐसे प्रावधान होते हैं जो पहली नजर में साधारण लगते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य बड़े स्तर पर होने वाली कर चोरी को रोकना होता है।

उन्होंने कहा कि कुछ प्रावधानों के दुरुपयोग की आशंका हो सकती है, लेकिन समय के साथ न्यायिक परीक्षण के माध्यम से उन्हें व्यवस्थित किया जाता है और उनका वास्तविक उद्देश्य गंभीर आर्थिक अपराधों से निपटना होता है।

मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने दलील दी कि धारा 132 आयकर अधिकारियों को अत्यधिक शक्तियां देती है और इसमें तलाशी के कारणों को न तो करदाता के सामने और न ही आयकर अपीलीय अधिकरण के समक्ष प्रकट करने की बाध्यता है। उनके अनुसार यह स्थिति संवैधानिक दृष्टि से चिंता पैदा करती है।

हेगड़े ने यह भी कहा कि इस प्रावधान के तहत कार्रवाई का दायरा केवल कथित कर चोरी करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उससे जुड़े अन्य लोगों को भी प्रभावित कर सकता है।

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उन्होंने कहा, “मान लीजिए किसी वकील तक जांच पहुंचती है, फिर उसके क्लर्क का फोन भी जांच के दायरे में आ सकता है। जोखिम केवल कथित कर चोरी करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके संपर्क में आने वाले अन्य लोग भी प्रभावित हो सकते हैं।”

हालांकि पीठ ने इस तर्क से सहमति नहीं जताई और कहा कि कानून के तहत दी गई शक्तियां अनियंत्रित या निरंकुश नहीं हैं।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “यह कोई अनियंत्रित या बेलगाम शक्ति नहीं है। आपकी चिंताएं समय के साथ दूर हो जाएंगी।”

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने तलाशी और जब्ती मामलों में पूर्व सूचना देने की व्यावहारिक कठिनाइयों की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में अग्रिम सूचना मिलने पर सबूत नष्ट किए जाने की आशंका बढ़ जाती है।

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उन्होंने कहा कि यदि तलाशी से पहले नोटिस दिया जाए तो इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को नष्ट करना बहुत आसान हो जाता है, यहां तक कि संबंधित उपकरण को नष्ट करके भी जांच को प्रभावित किया जा सकता है।

अदालत की टिप्पणियों के बाद याचिकाकर्ता विश्वप्रसाद अल्वा ने अपनी याचिका वापस ले ली। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें यह स्वतंत्रता दी कि वे इस प्रावधान में संशोधन या स्पष्टीकरण की मांग को लेकर केंद्र सरकार के समक्ष प्रतिनिधित्व दे सकते हैं।

धारा 132 आयकर अधिकारियों को यह अधिकार देती है कि यदि उनके पास यह “विश्वास करने का कारण” हो कि किसी व्यक्ति के पास अघोषित आय, संपत्ति या दस्तावेज मौजूद हैं, तो वे तलाशी और जब्ती की कार्रवाई कर सकते हैं।

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