पीड़ित बच्चे से मिली सीधी जानकारी पॉक्सो कानून के तहत ‘ज्ञान’ की श्रेणी में, स्कूल अधिकारी की डिस्चार्ज याचिका रद्द: सुप्रीम कोर्ट

बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों की अनिवार्य रिपोर्टिंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी नाबालिग पीड़ित से सीधे तौर पर यौन शोषण की विश्वसनीय जानकारी मिलती है, तो वह प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस (पॉक्सो) एक्ट की धारा 19(1) के तहत कानूनी ‘ज्ञान’ (नॉलेज) की श्रेणी में आता है। ऐसी स्थिति में घटना की तुरंत रिपोर्ट दर्ज कराना अनिवार्य है।

जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने एक पीड़ित बच्ची की मां की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए आरोपी महिला स्कूल अधिकारी को बरी (डिस्चार्ज) करने के हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि स्कूल प्रशासन कानूनी तौर पर रिपोर्ट दर्ज कराने की अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए खुद अनौपचारिक रूप से कोई आंतरिक जांच या सत्यापन नहीं कर सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला अप्रैल 2020 में दर्ज की गई एक प्राथमिकी (एफआईआर) से जुड़ा है। आरोप के मुताबिक, नवंबर 2019 में अरुणाचल प्रदेश के सेप्पा स्थित एक स्कूल में कक्षा 1 में पढ़ने वाली 8 वर्षीय बच्ची के साथ कक्षा 8 के एक छात्र ने क्लासरूम में यौन उत्पीड़न किया था। बच्ची ने इस घटना की जानकारी अपनी बड़ी बहन को दी, जिसने स्कूल की हेड गर्ल को बताया। हेड गर्ल ने तुरंत इस मामले की शिकायत स्कूल की आरोपी महिला अधिकारी से की।

आरोप है कि शिकायत मिलने के बाद आरोपी महिला अधिकारी पीड़िता को एक शिक्षक के कमरे में ले गई और शारीरिक सत्यापन किया, जहां पीड़िता के निजी अंगों पर चोट के निशान पाए गए। इसके बावजूद, पुलिस या बाल कल्याण समिति को सूचित करने के बजाय, स्कूल प्रशासन ने छात्रों को चुप रहने की हिदायत दी। स्कूल प्रशासन ने शिक्षकों की एक अनौपचारिक टीम बनाकर दोनों बच्चों की निगरानी शुरू कर दी। कुछ समय बाद जब दोनों बच्चे सामान्य रूप से व्यवहार करते दिखे, तो स्कूल ने निष्कर्ष निकाल लिया कि “कुछ नहीं हुआ था” और न तो बच्ची का इलाज कराया गया और न ही उसके माता-पिता को सूचित किया गया। घटना के करीब पांच महीने बाद जब मां ने अपनी बेटियों को आपस में बात करते सुना, तब जाकर इस मामले का खुलासा हुआ।

पश्चिम कामेंग स्थित ट्रायल कोर्ट ने फरवरी 2021 में इस मामले के सभी स्कूल अधिकारियों और शिक्षकों को बरी कर दिया था। मार्च 2022 में गुवाहाटी हाईकोर्ट की ईटानगर पीठ ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। हाईकोर्ट का तर्क था कि चूंकि स्कूल की आंतरिक जांच और बाद की मेडिकल रिपोर्ट में यौन हमले के कोई स्पष्ट निशान नहीं मिले थे, इसलिए स्कूल के कर्मचारियों को घटना की जानकारी या “विश्वास करने का कारण” होना नहीं माना जा सकता।

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पक्षकारों की दलीलें

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपीलकर्ता (पीड़िता की मां) की ओर से दलील दी गई कि स्कूल प्रशासन बाल शोषण की किसी भी शिकायत को तुरंत रिपोर्ट करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है। उन्होंने तर्क दिया कि पॉक्सो अधिनियम की धारा 19 के तहत ‘ज्ञान’ के लिए अपराध को प्रत्यक्ष रूप से देखना आवश्यक नहीं है; यह पीड़ित के बयान पर भी आधारित हो सकता है। स्कूल अधिकारियों को रिपोर्ट दर्ज कराने से पहले शिकायत की सच्चाई जांचने के लिए अपनी खुद की समानांतर जांच चलाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

दूसरी तरफ, आरोपी महिला स्कूल अधिकारी ने तर्क दिया कि वह स्कूल में केवल एक लेखाकार (अकाउंटेंट) के रूप में कार्यरत थीं और प्रशासनिक मामलों पर उनका कोई नियंत्रण नहीं था। उन्होंने दावा किया कि घटना उनके सामने नहीं हुई थी और मेडिकल रिपोर्ट भी अभियोजन पक्ष के दावों का समर्थन नहीं करती है, इसलिए उनके पास रिपोर्ट दर्ज कराने का कोई आधार नहीं था। अन्य आरोपी शिक्षकों ने भी दलील दी कि उन्हें घटना की कोई प्रत्यक्ष जानकारी या शिकायत नहीं मिली थी और उन्होंने केवल स्कूल की आंतरिक समिति के फैसले के अनुसार ही काम किया था।

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कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी व्याख्या

सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो अधिनियम की धारा 19(1) के तहत ‘ज्ञान’ (नॉलेज) शब्द की कानूनी परिभाषा की विस्तार से समीक्षा की। कोर्ट ने पाया कि ‘ज्ञान’ शब्द को पॉक्सो अधिनियम, दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) या भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है।

इस अस्पष्टता को दूर करने के लिए कोर्ट ने पुराने न्यायिक फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने ए.एस. कृष्णन बनाम केरल राज्य (2004) मामले का संदर्भ देते हुए टिप्पणी की:

“ज्ञान (नॉलेज) संबंधित व्यक्ति की मानसिक स्थिति को दर्शाने वाली एक जागरूकता है। ‘विश्वास करने का कारण’ होना ‘संदेह’ या ‘शंका’ के समान नहीं है और केवल देखना भी विश्वास करने के बराबर नहीं हो सकता। ‘विश्वास करने का कारण’ मन की एक उच्च स्तर की स्थिति है। इसी तरह ‘ज्ञान’ का स्थान ‘विश्वास करने के कारण’ से थोड़ा ऊंचा होता है।”

कोर्ट ने सिस्टर टेसी जोस बनाम केरल राज्य (2018) मामले का भी संदर्भ दिया, जिसमें कहा गया था:

“अपीलकर्ताओं पर थोपी गई ज्ञान की आवश्यकता ऐसी नहीं हो सकती कि उन्हें परिस्थितियों से यह निष्कर्ष निकालना चाहिए था कि कोई अपराध किया गया है।”

इसके अलावा, कोर्ट ने महाराष्ट्र राज्य बनाम डॉ. मारोती (2023) और जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन एलायंस बनाम एस. हरीश (2024) जैसे फैसलों का हवाला दिया, जिसमें बच्चों को शोषण से बचाने के लिए तुरंत रिपोर्टिंग के महत्व को सर्वोपरि माना गया था।

हाईकोर्ट की संकीर्ण व्याख्या को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि ‘ज्ञान’ को केवल खुद आंखों से देखने तक सीमित कर दिया गया, तो पॉक्सो अधिनियम का सुरक्षात्मक उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा। पीठ ने कानूनी मानक तय करते हुए स्पष्ट किया:

“धारा 19 की उप-धारा (1) में प्रयुक्त शब्द ‘इस बात का ज्ञान है कि ऐसा अपराध किया गया है’ की व्याख्या इस प्रकार की जानी चाहिए जिसमें इस अधिनियम के तहत दंडनीय अपराध के संबंध में विश्वसनीय जानकारी प्राप्त होने पर होने वाली जागरूकता भी शामिल हो।”

सुप्रीम कोर्ट ने रिपोर्ट करने से पहले स्कूल द्वारा की गई आंतरिक जांच की कड़ी आलोचना करते हुए कहा:

“यह पता लगाने के लिए कि ऐसी घटना वास्तव में हुई है या नहीं, जांच घटना की रिपोर्ट दर्ज होने के बाद होनी चाहिए, न कि उससे पहले, क्योंकि ऐसी कवायद उस उद्देश्य को ही विफल कर देगी जिसके लिए पॉक्सो अधिनियम बनाया गया है।”

कोर्ट ने पॉक्सो अधिनियम की धारा 27 का भी उल्लेख किया, जिसके तहत प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज न होने की स्थिति में भी पीड़ित बच्चे की जल्द से जल्द चिकित्सा जांच कराने की व्यवस्था है, जो तत्काल रिपोर्टिंग की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए आरोपी महिला स्कूल अधिकारी को बरी करने के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने माना कि चूंकि शिकायत सीधे पीड़िता से प्राप्त हुई थी, इसलिए आरोपी अधिकारी को अपराध का ‘ज्ञान’ था और वह इसकी रिपोर्ट करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य थीं। अब उनके खिलाफ पॉक्सो अधिनियम की धारा 21 सहपठित धारा 19(1) और आईपीसी की धारा 176 के तहत मुकदमा चलाया जाएगा।

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हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अन्य शिक्षकों और स्कूल प्रशासकों को बरी करने के फैसले को सही ठहराया। पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल उन्हीं व्यक्तियों को रिपोर्ट न करने के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है, जिन्हें सीधे पीड़ित बच्चे से जानकारी मिली थी। चूंकि अन्य कर्मचारियों को पीड़ित बच्चे से कोई सीधी शिकायत या प्रत्यक्ष जानकारी नहीं मिली थी और उन्होंने केवल सावधानी बरतने के उद्देश्य से स्कूल के निर्णय पर काम किया था, इसलिए उन्हें मामले को दबाने की किसी आपराधिक साजिश का दोषी नहीं माना जा सकता।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: लिंडा सेमा और अन्य बनाम प्रतिवादी
वाद संख्या: एसएलपी क्रिमिनल नंबर 4772/2024
पीठ: जस्टिस मनोज मिश्रा, जस्टिस के.वी. विश्वनाथन
निर्णय की तिथि: 9 जुलाई, 2026

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