Vanpic Project: यूएई कोर्ट के 500 करोड़ के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट में जुलाई से रोजाना सुनवाई, मध्यस्थता विफल होने के बाद बड़ा कदम

सुप्रीम कोर्ट ने हैदराबाद के प्रमुख उद्योगपति निम्मागड्डा प्रसाद और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की सरकारी निवेश संस्था के बीच चल रहे करोड़ों रुपये के कानूनी विवाद में एक बड़ा फैसला लिया है। दोनों पक्षों के बीच आपसी समझौते (Mediation) की कोशिशें पूरी तरह विफल होने के बाद, शीर्ष अदालत इस मामले में जुलाई के दूसरे हफ्ते से रोजाना (Day-to-day) सुनवाई करने के लिए तैयार हो गई है।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने साफ किया कि कोर्ट अब किसी भी अंतरिम आवेदन पर समय गंवाने के बजाय सीधे मुख्य मामले की मेरिट पर सुनवाई शुरू करेगी।

क्यों विफल रही देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश की मध्यस्थता?

यह पूरा विवाद यूएई की अदालत द्वारा पारित एक दीवानी फैसले (Civil Decree) को भारत में लागू करने से जुड़ा है। यह फैसला ‘रास अल खैमाह इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी’ (RAKIA) के पक्ष में और भारतीय उद्योगपति निम्मागड्डा प्रसाद के खिलाफ आया था।

मामले की गंभीरता को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने इस साल 16 मार्च को देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) यू. यू. ललित को इस विवाद को आपसी बातचीत से सुलझाने के लिए एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया था। खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति को ध्यान में रखते हुए यह मध्यस्थता ‘हाइब्रिड मोड’ (वर्चुअल और फिजिकल) में आयोजित की गई थी, ताकि यूएई के अधिकारी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए इसमें भाग ले सकें।

सोमवार को सुनवाई के दौरान RAKIA का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पीठ को औपचारिक रूप से सूचित किया कि समझौते के तमाम प्रयास बेनतीजा रहे हैं। इसके बाद कोर्ट ने मामले की कमान सीधे अपने हाथ में ले ली।

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क्या है 500 करोड़ का यह विवाद और ‘वैनपिक प्रोजेक्ट’?

इस हाई-प्रोफाइल कानूनी लड़ाई की जड़ें साल 2008 के बेहद महत्वाकांक्षी ‘वैनपिक प्रोजेक्ट’ (Vanpic Project) से जुड़ी हैं। यह आंध्र प्रदेश में आधुनिक बंदरगाह (Ports) और एक एयरपोर्ट विकसित करने के लिए शुरू किया गया एक साझा उपक्रम (Joint Venture) था, जो बाद में ठप हो गया।

यूएई की सरकारी संस्था RAKIA का आरोप है कि निम्मागड्डा प्रसाद ने संस्था के तत्कालीन सीईओ खाटर मसाद के साथ मिलकर इस प्रोजेक्ट के लिए आवंटित किए गए 120 मिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 1,000 करोड़ रुपये से अधिक) का गबन किया।

इसी मामले में यूएई की एक अदालत ने प्रसाद के खिलाफ 26,79,41,374 दिरहाम की डिक्री जारी की थी। भारतीय मुद्रा में यह राशि लगभग 543 करोड़ रुपये (मूलधन) बैठती है, जो ब्याज मिलाकर करीब 643 करोड़ रुपये हो चुकी है। अब RAKIA इसी विदेशी अदालती आदेश को भारत में लागू कराना चाहती है।

सुरक्षा के तौर पर कोर्ट में जमा हैं 600 करोड़ के एसेट्स

इस मामले में कानूनी कार्यवाही आगे बढ़ाने और अपनी याचिका पर सुनवाई के लिए निम्मागड्डा प्रसाद को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार 600 करोड़ रुपये की वित्तीय सुरक्षा (Security Deposit) देनी पड़ी है।

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प्रसाद की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने कोर्ट को बताया कि उनके मुवक्किल ने कोर्ट की वित्तीय शर्तों का पालन किया है:

  • नकद सुरक्षा: प्रसाद ने 125 करोड़ रुपये नकद जमा कराए हैं। अदालती आदेश के तहत इस राशि को सुप्रीम कोर्ट के यूको बैंक (UCO Bank) की शाखा में छह महीने की उच्च-ब्याज वाली फिक्स्ड डिपॉजिट (FDR) में रखा गया है, जिसमें ऑटो-रिन्यूअल की सुविधा है।
  • जमीन के दस्तावेज: तेलंगाना के मेडचल-मल्कनगिरी जिले के देवरयांजल गांव में स्थित 37 एकड़ जमीन (जिसे मेडचल लैंड कहा जा रहा है) के मूल मालिकाना हक के दस्तावेज कोर्ट में जमा किए गए हैं। प्रसाद के वकीलों के अनुसार, इस जमीन की कीमत करीब 408 करोड़ रुपये है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा पहले कुर्क की गई इस जमीन को क्षतिपूर्ति बांड (Indemnity Bond) के आधार पर मुक्त कराया गया था।
  • अतिरिक्त संपत्तियां: इसके अलावा, प्रसाद ने 212 करोड़ रुपये मूल्य के शेयर और अन्य संपत्तियों का भी प्रस्ताव दिया है, जो वर्तमान में कमर्शियल कोर्ट के आदेशों के तहत कुर्क हैं।
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कोर्ट की सख्त हिदायत: कारोबार चलाने की छूट, पर संपत्ति बेचने पर रोक

मामले की रोजाना सुनवाई की तारीख तय करने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने उद्योगपति निम्मागड्डा प्रसाद को थोड़ी राहत देते हुए स्पष्ट किया कि वह अपनी कंपनियों के दैनिक कामकाज को चलाने और कर्मचारियों को वेतन देने के लिए कंपनी फंड का इस्तेमाल कर सकते हैं।

हालांकि, कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि वह अदालत की अनुमति के बिना अपनी किसी भी अचल संपत्ति (Immovable Property) को बेच या ट्रांसफर नहीं कर सकेंगे।

अब इस बड़े कॉरपोरेट विवाद का भविष्य जुलाई के दूसरे सप्ताह में होने वाली रोजाना सुनवाई से तय होगा, जिस पर भारत और यूएई दोनों देशों के व्यापारिक व कानूनी हलकों की नजरें टिकी हुई हैं।

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