सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली बिजली नियामक आयोग (DERC) के नियमित चेयरमैन और सदस्यों की नियुक्तियों में हो रही देरी पर सोमवार को दिल्ली सरकार को आड़े हाथों लिया। शीर्ष अदालत ने दिल्ली सरकार को एक स्पष्ट समय-सीमा (टाइमलाइन) बताने का निर्देश दिया है कि वह चयन समिति का गठन कब तक करेगी।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने दिल्ली सरकार के वकील को इस संबंध में सक्षम प्राधिकारी से स्पष्ट निर्देश लेकर आने को कहा है। इस मामले की अगली सुनवाई अब 29 मई को होगी।
ठप पड़ा है उपभोक्ताओं का काम: एक साल से नहीं हुई सुनवाई
सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता गैर-सरकारी संगठन (NGO) ‘एनर्जी वॉचडॉग’ की ओर से पेश हुए वकील प्रणव सचदेवा ने अदालत को बताया कि डीईआरसी पिछले एक साल से अपने न्यायिक कार्यों को करने में असमर्थ रहा है।
याचिका के अनुसार, यह संकट जुलाई 2025 में डीईआरसी के तत्कालीन चेयरमैन जस्टिस (सेवानिवृत्त) उमेश कुमार के सेवानिवृत्त होने के बाद शुरू हुआ। इसके बाद, आयोग की वेबसाइट पर 15 जुलाई 2025 को एक प्रशासनिक नोटिस जारी किया गया, जिसके बाद से बिजली अधिनियम की धारा 142 के तहत आने वाली शिकायतों और याचिकाओं की सुनवाई पूरी तरह से रोक दी गई है।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि आयोग में पदों का खाली होना सीधे तौर पर जनता के हितों को नुकसान पहुंचा रहा है। बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) के खिलाफ अपनी शिकायतों के निवारण का रास्ता बंद होने के कारण यह उपभोक्ताओं के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत मिलने वाले मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
नियमों और कोर्ट के आदेशों की अनदेखी का आरोप
याचिका में दिल्ली सरकार द्वारा नियमों की अनदेखी पर भी सवाल उठाए गए हैं। वर्तमान में डीईआरसी केवल दो ‘प्रो-टेम’ (अस्थायी) सदस्यों के भरोसे चल रहा है, जबकि आयोग में न तो कोई स्थायी अध्यक्ष है और न ही कोई कानून का सदस्य।
‘एनर्जी वॉचडॉग’ ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि यह अस्थायी व्यवस्था निम्नलिखित नियमों का उल्लंघन करती है:
- बिजली अधिनियम, 2003: यह कानून राज्य विद्युत नियामक आयोगों को स्वायत्त और सरकारी हस्तक्षेप से स्वतंत्र रहने की गारंटी देता है।
- सुप्रीम कोर्ट का अप्रैल 2018 का फैसला: कोर्ट ने अनिवार्य किया था कि आयोग में कम से कम एक न्यायिक सदस्य या कानून की पृष्ठभूमि का व्यक्ति होना आवश्यक है।
- शक्तियों का पृथक्करण (Separation of Powers): याचिका में कहा गया है कि कोर्ट द्वारा जनहित में बनाई गई अस्थायी ‘प्रो-टेम’ व्यवस्था के भरोसे लंबे समय तक आयोग को चलाना संवैधानिक रूप से अनुचित है, क्योंकि यह न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर करता है।
वादे के बावजूद नहीं उठाए गए कदम
यह पहला मौका नहीं है जब यह विवाद देश की सबसे बड़ी अदालत के सामने आया है। याचिकाकर्ता ने पिछले साल अगस्त (2025) में सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक अन्य मामले में दिए गए आदेश का हवाला दिया। उस समय दिल्ली सरकार के वकील ने अदालत को औपचारिक आश्वासन दिया था कि डीईआरसी में नियमित नियुक्तियों की प्रक्रिया जल्द से जल्द पूरी कर ली जाएगी।
इस आश्वासन के बावजूद, सरकार ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। सोमवार को सुनवाई के दौरान अदालत को केवल यह बताया गया कि चयन समिति गठित करने का प्रस्ताव हाल ही में 4 मई को पेश किया गया है।
याचिकाकर्ता ने मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट दिल्ली सरकार को हलफनामा दाखिल करने का आदेश दे, जिसमें वह यह स्पष्ट करे कि उसने अगस्त 2025 में कोर्ट को दिए गए वादे को पूरा क्यों नहीं किया। इसके साथ ही तुरंत चयन समिति का गठन कर आयोग की कानूनी संरचना को बहाल करने की मांग की गई है।

