कनाडा से ‘रद्दी कागज’ के नाम पर मंगाया गया कचरा वापस भेजने का मद्रास हाईकोर्ट का सख्त आदेश, आयातक कंपनी पर भारी जुर्माना

मद्रास हाईकोर्ट ने कनाडा से रद्दी कागज के नाम पर मंगाए गए 121.970 मीट्रिक टन ठोस घरेलू कचरे को वापस भेजने का निर्देश दिया है। अदालत ने इसे देश की संप्रभुता के लिए गंभीर खतरा बताते हुए आयात करने वाली कंपनी पर भारी जुर्माना लगाया है और इसे 60 दिनों के भीतर वापस भेजने को कहा है।

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस डी. भरत चक्रवर्ती ने 19 जून के अपने आदेश में कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि ‘भारत माता’ पर जानबूझकर विदेशी कचरा फेंकना केवल पर्यावरण कानून का उल्लंघन नहीं है, बल्कि देश की संप्रभुता को सीधी चुनौती है। उन्होंने इसे ‘देशद्रोह’ का सबसे गंभीर रूप करार दिया। अदालत ने विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों में कचरा डंप करने की इस प्रवृत्ति को ‘अपशिष्ट उपनिवेशवाद’ (वेस्ट कॉलोनियलिज्म) बताया, जो न केवल अंतरराष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन करता है बल्कि पर्यावरण को भी गंभीर नुकसान पहुंचाता है।

जांच में रद्दी कागज की जगह मिला घरेलू कचरा

यह पूरा मामला मार्च 2022 का है, जब श्रीपति पेपर एंड बोर्ड प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी ने कनाडा के एक निर्यातक से ‘वेस्ट पेपर – न्यूज एंड पैम्स’ (रद्दी समाचार पत्र और पत्रिकाएं) मंगाने का ऑर्डर दिया था। जब पांच कंटेनरों की यह खेप भारत पहुंची, तो राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) की जांच में इसमें रद्दी कागज के बजाय घरेलू कचरा पाया गया।

इसके बाद तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इस खेप की जांच की और अपनी रिपोर्ट में पुष्टि की कि इसमें इस्तेमाल की गई प्लास्टिक की बोतलें, कांच के टुकड़े, सड़क की झाड़न, सड़ा हुआ खाना, प्लास्टिक पार्सल और एल्युमीनियम के कैन भरे हुए थे। सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 और खतरनाक अपशिष्ट नियम, 2016 के तहत इस तरह के ठोस कचरे के आयात पर पूरी तरह प्रतिबंध होने के कारण सीमा शुल्क विभाग ने इस खेप को जब्त कर लिया था।

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दुबई भेजने और भारत में नष्ट करने की याचिका खारिज

कंपनी के वकील हरि राधाकृष्णन ने अदालत में याचिका दायर कर भारी वित्तीय बोझ और विलंभ शुल्क का हवाला देते हुए इस कचरे को दुबई भेजने या भारत में ही रीसाइक्लिंग या इन्सिनेरेशन (जलाकर नष्ट करने) की अनुमति मांगी थी। हालांकि, मद्रास हाईकोर्ट ने इन सभी मांगों को सिरे से खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि इस कचरे को हर हाल में उसके मूल देश कनाडा ही वापस भेजा जाएगा।

आयातक कंपनी पर भारी जुर्माना और वित्तीय देनदारियां

अदालत ने श्रीपति पेपर एंड बोर्ड प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ कड़े कदम उठाते हुए निम्नलिखित वित्तीय निर्देश दिए हैं:

  • कंपनी को 60 दिनों के भीतर इस कचरे को कनाडा वापस भेजना होगा। ऐसा न करने पर, ‘प्रदूषक भुगतान करे’ (पोल्यूटर पेज़) सिद्धांत के तहत कंपनी को 50,000 रुपये प्रतिदिन की दर से पर्यावरणीय मुआवजा देना होगा, जिसे तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड वसूलेगा।
  • याचिकाकर्ता संयुक्त रूप से शिपिंग लाइन को 4 करोड़ रुपये और अतिरिक्त माल ढुलाई शुल्क का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होंगे।
  • याचिकाकर्ताओं में से प्रत्येक को सीमा शुल्क विभाग को अदालती खर्च के रूप में 10,000 रुपये देने होंगे।
  • कंटेनर फ्रेट स्टेशनों को याचिकाकर्ताओं से डिटेंशन और डेमरेज शुल्क वसूलने का अधिकार होगा।
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नीतिगत सुधार और घरेलू कचरा प्रबंधन पर जोर

अदालत ने देश में कचरा प्रबंधन की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि भारत में रोजाना 1.70 लाख टन से अधिक ठोस कचरा पैदा होता है। जस्टिस चक्रवर्ती ने केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तथा विदेश व्यापार महानिदेशक (डीजीएफटी) को देश की नीतियों में सुधार करने का सुझाव दिया।

उन्होंने कहा कि यदि घरेलू स्तर पर रद्दी कागज का सही वर्गीकरण (सेग्रिगेशन) किया जाए और इसे जलने से बचाया जाए, तो भारतीय उद्योगों को विदेशों से रद्दी कागज आयात करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसके अलावा, अदालत ने केंद्र सरकार को राजनयिक चैनलों के जरिए उन विदेशी निर्यातकों के खिलाफ कदम उठाने की सलाह दी जो भारत में कचरा डंप करने की बार-बार कोशिश करते हैं।

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