इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ससुराल वालों के खिलाफ “सामान्य और सर्वव्यापी” आरोपों को खारिज कर समन आदेश रद्द किया; पति को मुकदमे का सामना करने का निर्देश

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 482 के तहत दायर एक याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए, दहेज उत्पीड़न के एक मामले में पति के माता-पिता के खिलाफ जारी समन आदेश और आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। हालांकि, उच्च न्यायालय ने पति को कोई भी राहत देने से इनकार करते हुए उसकी याचिका को खारिज कर दिया और निचली अदालत को निर्देश दिया कि वह बिना किसी अनावश्यक स्थगन के उसके खिलाफ मुकदमे की कार्यवाही को तेजी से आगे बढ़ाए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद पति और शिकायतकर्ता के बीच वैवाहिक संबंधों से उत्पन्न हुआ था, जिनका विवाह 28 नवंबर 2017 को संपन्न हुआ था। शिकायतकर्ता द्वारा 16 दिसंबर 2021 को दायर की गई शिकायत के अनुसार, विवाह के समय उसके पिता ने ₹5 लाख नकद, आभूषण और अन्य घरेलू सामान उपहार स्वरूप दिए थे।

शिकायतकर्ता का आरोप था कि शादी के महज दस दिन बाद ही उसके ससुर, सास और जेठ ने दहेज में ‘स्विफ्ट डिजायर’ कार की मांग शुरू कर दी। शिकायत में कहा गया कि जब शिकायतकर्ता के पिता ने अपनी असमर्थता जताई, तो उसे शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया, पर्याप्त भोजन से वंचित किया गया, कमरे में बंद रखा गया और जान से मारने की धमकी दी गई। शिकायतकर्ता ने यह भी दावा किया कि उसे 5 नवंबर 2019 को उसके ससुराल से निकाल दिया गया था, जिसके बाद उसके पति ने बिना तलाक लिए 20 नवंबर 2021 को एक अन्य महिला से दूसरी शादी कर ली।

शिकायतकर्ता और उसके भाई-बहन के बयानों को दर्ज करने के बाद, सिविल जज (जे.डी.)/एफ.टी.सी.-II/जे.एम., संत कबीर नगर की अदालत ने 16 मई 2023 को एक समन आदेश जारी किया। इस आदेश के तहत पति को भारतीय दंड संहिता (I.P.C.) की धारा 498A, 494 और दहेज निषेध अधिनियम की धारा $3/4$ के तहत तलब किया गया था, जबकि सास-ससुर को धारा 498A I.P.C. और दहेज निषेध अधिनियम की धारा $3/4$ के तहत आरोपी के रूप में कोर्ट में हाजिर होने को कहा गया था। शिकायत में नामजद अन्य रिश्तेदारों को कोर्ट ने तलब नहीं किया था।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत में तर्क दिया कि शिकायत में लगाए गए सभी आरोप पूरी तरह से झूठे, मनगढ़ंत और दुर्भावना से प्रेरित हैं। उन्होंने अपनी बात के समर्थन में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए:

  • पति ने अपनी पत्नी को वापस लाने और सुखी वैवाहिक जीवन व्यतीत करने के उद्देश्य से 4 जुलाई 2022 को हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत दाम्पत्य अधिकारों की बहाली (Restitution of Conjugal Rights) के लिए मुकदमा दायर किया था। हालांकि, शिकायतकर्ता ने अपने ससुराल वापस आने से इनकार कर दिया और केवल परिवार से अलग रहने की शर्त रखी।
  • पति द्वारा दूसरी शादी किए जाने का आरोप पूरी तरह से निराधार है, क्योंकि उसने कोई दूसरी शादी नहीं की है।
  • शिकायत दर्ज करने में 2 साल, 1 महीने और 5 दिनों की एक अत्यधिक और अस्पष्टीकृत देरी की गई है, क्योंकि शिकायतकर्ता को कथित रूप से 5 नवंबर 2019 को निकाला गया था जबकि शिकायत 16 दिसंबर 2021 को दर्ज की गई।
  • यह मामला “बिना किसी शारीरिक चोट” (no injury) का है और याचिकाकर्ताओं का कोई भी पूर्व आपराधिक इतिहास नहीं है।
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इसके विपरीत, राज्य सरकार के वकील ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए तर्क दिया कि याचिकाकर्ता शिकायत और गवाहों के बयानों में सीधे तौर पर नामजद हैं और उनके खिलाफ सक्रिय संलिप्तता के गंभीर आरोप मौजूद हैं। इस सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता के वकील अनुपस्थित रहे।

न्यायालय का विश्लेषण और टिप्पणियां

न्यायमूर्ति समित गोपाल ने मामले की समीक्षा करते हुए पाया कि यह पूरा विवाद वैवाहिक प्रकृति का है। उन्होंने इस बात पर भी ध्यान दिया कि निचली अदालत ने समान आरोप होने के बावजूद जेठ और एक अन्य रिश्तेदार को समन नहीं किया था और केवल वर्तमान याचिकाकर्ताओं को ही तलब किया था।

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सास-ससुर के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर टिप्पणी करते हुए न्यायालय ने दर्ज किया:

“जहां तक याचिकाकर्ता संख्या 2 और 3 के खिलाफ आरोपों का संबंध है, वे सामान्य और सर्वव्यापी (general and omnibus) हैं। शिकायत दर्ज करने में 2 साल 1 महीने और 5 दिनों की देरी है, जिसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है।”

वैवाहिक विवादों में पति के रिश्तेदारों की जवाबदेही तय करने के संबंध में उच्च न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) के कई ऐतिहासिक फैसलों का विस्तार से उल्लेख किया:

  1. पायल शर्मा बनाम पंजाब राज्य व अन्य (2024) (प्रीति गुप्ता बनाम झारखंड राज्य का हवाला देते हुए): सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि यह आम बात है कि वैवाहिक विवादों में घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने और पूरे परिवार को फंसाने की प्रवृत्ति देखी जाती है, जिससे सभी पक्षों को भारी मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ता है। अदालतों का यह “अपरिहार्य कर्तव्य” (irrecusable duty) है कि वे करीबी रिश्तेदारों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की पूरी संवेदनशीलता और सावधानी से जांच करें।
  2. गीता मेहरोत्रा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि किसी घरेलू झगड़े में बिना किसी सक्रिय संलिप्तता के केवल परिवार के सदस्यों के नामों का आकस्मिक उल्लेख कर देना उनके खिलाफ कानूनी संज्ञान लेने का आधार नहीं बन सकता।
  3. कहकशां कौसर उर्फ सोनम व अन्य बनाम बिहार राज्य: इस मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने सामान्य और सर्वव्यापी (general and omnibus) आरोपों के आधार पर पति के परिवार के सदस्यों के खिलाफ चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया था।
  4. हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल: इस ऐतिहासिक फैसले में तय किया गया था कि उच्च न्यायालय अपनी अंतर्निहित शक्तियों (धारा 482 Cr.P.C.) का उपयोग अदालती प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने और न्याय सुनिश्चित करने के लिए कर सकता है, विशेषकर तब जब आरोप अतार्किक या पूरी तरह से असंभव प्रतीत हों।
  5. दारा लक्ष्मी नारायण बनाम तेलंगाना राज्य (2024) एवं गेद्दम झांसी बनाम तेलंगाना राज्य (2025): इन मामलों में दोहराया गया कि दुर्भावनापूर्ण और छिपे हुए उद्देश्यों के तहत पूरे परिवार को सामान्य आरोपों के दायरे में खींचना अतिशयोक्तिपूर्ण रवैये को दर्शाता है।
  6. चारुल शुक्ला बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026): न्यायालय ने माना कि वैवाहिक मामलों में पति के परिवार को फंसाने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर आरोप लगाने की प्रवृत्ति होती है और ऐसी शिकायतों में अत्यधिक देरी केस के लिए घातक हो सकती है।
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न्यायालय का निर्णय

उच्चतम न्यायालय द्वारा स्थापित इन विधिक सिद्धांतों को लागू करते हुए, इलाहाबाद उच्च न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि सास-ससुर के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना न्यायसंगत नहीं है। न्यायालय ने आदेश दिया:

“…चूंकि शिकायतकर्ता के पति के परिवार के सदस्यों यानी ससुर और सास के खिलाफ सामान्य और सर्वव्यापी (common, general and omnibus) आरोप लगाए गए हैं, इसलिए वर्तमान याचिका स्वीकार किए जाने योग्य है…”

तदनुसार, उच्च न्यायालय ने निम्नलिखित निर्णय सुनाया:

  1. ससुर और सास के संबंध में याचिका को स्वीकार किया जाता है और उनके खिलाफ जारी 16 मई 2023 के समन आदेश और कार्यवाही को रद्द (quash) किया जाता है।
  2. पति के संबंध में दायर याचिका को खारिज किया जाता है।
  3. निचली अदालत को निर्देश दिया जाता है कि वह पति के खिलाफ मुकदमे की कार्यवाही को तेजी से आगे बढ़ाए और किसी भी पक्ष को अनावश्यक तारीख या स्थगन न दे।

मामले का विवरण

  • मुकदमे का शीर्षक: सर्वेश राय और 2 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
  • केस संख्या: धारा 482 के तहत आवेदन संख्या 24532 वर्ष 2023
  • पीठ: न्यायमूर्ति समित गोपाल
  • दिनांक: 19 मई, 2026

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