देश में बेटियों को शिक्षा के समान अवसर देने और स्कूलों से उनका ड्रॉपआउट रोकने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा कदम उठाया है। सोमवार को हुई एक अहम सुनवाई में शीर्ष अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि किसी भी लड़की को सिर्फ इसलिए पढ़ाई छोड़कर घर बैठने या घरेलू काम करने पर मजबूर नहीं होना चाहिए क्योंकि उसके स्कूल में सैनिटरी नैपकिन या साफ-सुथरे अलग शौचालय की सुविधा नहीं है।
जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह मासिक धर्म स्वच्छता (Menstrual Hygiene) से जुड़े कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों को देश के हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में “अक्षरशः” लागू करवाए।
“इसका बेहतर इस्तेमाल करें, यह बेटियों की भलाई के लिए है”
सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) अर्चना पाठक दवे ने कोर्ट को बताया कि 30 जनवरी के ऐतिहासिक फैसले के बाद से राज्यों में इस दिशा में तेजी से काम शुरू हुआ है। सरकार ने पिछले दो से ढाई महीने के भीतर राज्यों से अनुपालन (compliance) का डेटा भी इकट्ठा किया है।
इस प्रगति को स्वीकार करते हुए बेंच ने कहा, “इसका अच्छा उपयोग करें। यह देश की महिलाओं और बेटियों की भलाई के लिए है। लड़कियों को केवल इस वजह से शिक्षा नहीं छोड़नी चाहिए और घर पर बैठकर घरेलू काम नहीं करना चाहिए। अब यह आपकी जिम्मेदारी है कि हमारे फैसले का लाभ जमीनी स्तर पर हर जरूरतमंद बेटी तक पहुंचे।”
प्रक्रिया को पारदर्शी और समयबद्ध बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कड़े दिशा-निर्देश और समयसीमा जारी की है:
- शिक्षा मंत्रालय नोडल एजेंसी: भविष्य में होने वाली सभी प्रगतियों और रिपोर्ट को दाखिल करने के लिए केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को नोडल एजेंसी नियुक्त किया गया है।
- राज्यों के लिए 15 अगस्त की डेडलाइन: देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आगामी 15 अगस्त तक अपनी विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपनी होगी। कोर्ट ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि रिपोर्ट सौंपने में राज्यों की ओर से कोई ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
- हर 3 महीने में होगी समीक्षा: शीर्ष अदालत इस मामले की खुद निगरानी करेगी और केंद्र सरकार को हर तीन महीने में प्रोग्रेस रिपोर्ट पेश करनी होगी।
- अगली सुनवाई: इस मामले की अगली सुनवाई अब 1 सितंबर को तय की गई है।
संविधान के ‘जीवन के अधिकार’ से जुड़ी है बेटियों की सेहत
यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट के इसी साल 30 जनवरी को आए उस ऐतिहासिक फैसले से जुड़ा है, जिसमें अदालत ने मासिक धर्म स्वच्छता को सीधे तौर पर ‘जेंडर जस्टिस’ (लैंगिक न्याय) का हिस्सा माना था। अदालत ने स्पष्ट किया था कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले ‘जीवन के अधिकार’ (Right to Life) में मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता और स्वास्थ्य का अधिकार भी शामिल है।
अदालत ने टिप्पणी की थी कि सुरक्षित और सस्ती मासिक धर्म स्वच्छता सुविधाओं की कमी बेटियों को लड़कों की बराबरी में खड़े होने से रोकती है। स्कूल छूटने का यह असर उनके पूरे जीवन और भविष्य के अवसरों को प्रभावित करता है।
इसी के तहत अदालत ने निर्देश दिए थे कि देश के सभी सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और निजी स्कूलों में (चाहे वे ग्रामीण इलाकों में हों या शहरी) निम्नलिखित सुविधाएं अनिवार्य रूप से दी जाएं:
- मुफ़्त सैनिटरी नैपकिन: स्कूलों में छात्राओं के लिए ASTM D-6954 मानकों वाले ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन मुफ़्त उपलब्ध कराए जाएं। इन्हें शौचालय परिसर के भीतर वेंडिंग मशीन या किसी अन्य सुलभ माध्यम से दिया जाना चाहिए।
- क्रियाशील शौचालय: हर स्कूल में पानी की पर्याप्त सुविधा के साथ लड़कियों के लिए अलग और पूरी तरह कार्यशील शौचालय होने चाहिए।
पर्यावरण से जुड़ी चिंता पर भी विचार करेगी सरकार
सोमवार को सुनवाई के दौरान एक वकील ने अदालत के सामने पर्यावरण से जुड़ी चिंता भी रखी। उन्होंने एक अंतरिम आवेदन का हवाला देते हुए कहा कि कोर्ट के आदेश में जिन “ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल” सैनिटरी पैड्स का जिक्र है, वे वास्तव में पर्यावरण के लिए नुकसानदेह साबित हो सकते हैं।
इस महत्वपूर्ण तकनीकी पहलू को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जमीनी काम को रोकने के बजाय बीच का रास्ता निकाला। अदालत ने वकील को निर्देश दिया कि वे इस तकनीकी चिंता को सीधे सरकार के विधि अधिकारी (लॉ ऑफिसर) के सामने रखें। बेंच ने एएसजी अर्चना पाठक दवे से कहा कि वे इस आवेदन पर विचार करें और पर्यावरण अनुकूल विकल्पों के लिए जरूरी कदम उठाएं, ताकि नैपकिन वितरण के इस बड़े अभियान में कोई बाधा न आए।

