मणिपुर हिंसा पीड़ितों को कानूनी सहायता में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त; तत्काल अनुपालन का दिया निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को 2023 की मणिपुर जातीय हिंसा के पीड़ितों को कानूनी सहायता वकील नियुक्त करने में हो रही अत्यधिक देरी पर “गंभीर चिंता” व्यक्त की। कोर्ट ने इस बात पर नाराजगी जताई कि उसके पिछले आदेशों का एक महीने बाद भी पालन नहीं किया गया है। चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने मणिपुर और असम के राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरणों को निर्देश दिया कि वे तुरंत उन वकीलों को शॉर्टलिस्ट और नियुक्त करें जो स्थानीय भाषाओं के जानकार हों, ताकि चल रहे मुकदमों में पीड़ितों की प्रभावी मदद हो सके।

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, “हमारे आदेश पारित हुए एक महीना बीत चुका है, लेकिन अब तक कुछ भी अनुपालन नहीं हुआ है।” पीठ ने स्पष्ट किया कि दोनों राज्यों के बीच समन्वय की प्रक्रिया में “इतना समय नहीं लगना चाहिए था।”

सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप 26 फरवरी के उस निर्देश के बाद आया है, जिसमें असम और मणिपुर राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरणों को प्रत्येक पीड़ित और उनके परिवार को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करने का आदेश दिया गया था। चूंकि कई महत्वपूर्ण मामलों को मणिपुर से गुवाहाटी (असम) स्थानांतरित कर दिया गया है, इसलिए कोर्ट ने ऐसे वकीलों की आवश्यकता पर बल दिया था जो पीड़ितों की स्थानीय बोलियों को समझते हों।

मंगलवार की कार्यवाही में कोर्ट को बताया गया कि दोनों राज्यों के कानूनी सेवा निकाय अभी भी वकीलों की सूची तैयार करने में समन्वय कर रहे हैं। हालांकि, मणिपुर के एडवोकेट जनरल ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि इस मामले को तत्काल सुलझा लिया जाएगा और बिना किसी देरी के परिवारों को वकील उपलब्ध करा दिए जाएंगे।

सुनवाई के दौरान कानूनी दस्तावेजों के वितरण को लेकर भी तीखी बहस हुई। पीड़ितों का पक्ष रख रहीं वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर ने आरोप लगाया कि मुकदमों की कार्यवाही “लापरवाह तरीके” से चल रही है और परिवारों को चार्जशीट की प्रतियां तक नहीं दी गई हैं।

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दूसरी ओर, सीबीआई की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने इन दावों का विरोध करते हुए कहा कि प्रत्येक पीड़ित को चार्जशीट की प्रति उपलब्ध करा दी गई है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि जैसे ही कानूनी सहायता वकील नियुक्त हो जाते हैं, उन्हें पीड़ितों के प्रभावी प्रतिनिधित्व के लिए तुरंत चार्जशीट की प्रतियां प्राप्त करनी चाहिए। पीठ ने ट्रायल कोर्ट्स को भी आदेश दिया कि वे अपने रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से दर्ज करें कि क्या संबंधित पक्षों को ये दस्तावेज सौंप दिए गए हैं।

यह सुनवाई 3 मई, 2023 को भड़की हिंसा के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा की जा रही व्यापक निगरानी का हिस्सा है। कोर्ट ने इस प्रक्रिया में शामिल दो प्रमुख निकायों से अपडेट स्टेटस रिपोर्ट मांगी है:

  • पडसलगीकर समिति: महाराष्ट्र के पूर्व डीजीपी दत्तात्रय पडसलगीकर की अध्यक्षता वाली यह समिति सीबीआई और विशेष जांच टीमों (SIT) द्वारा की जा रही जांच की निगरानी कर रही है।
  • गीता मित्तल पैनल: हाईकोर्ट की पूर्व जज गीता मित्तल के नेतृत्व में यह तीन सदस्यीय समिति विस्थापितों के पुनर्वास, मुआवजे और आवश्यक दस्तावेजों के पुनर्निर्माण की देखरेख कर रही है।
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एटर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने पीठ को आश्वासन दिया कि यदि उनके संज्ञान में मुकदमे की प्रक्रिया से जुड़ी कोई विशिष्ट शिकायत आती है, तो उसकी जांच की जाएगी।

मणिपुर में बहुसंख्यक मैतेई समुदाय की अनुसूचित जनजाति (ST) दर्जे की मांग के विरोध में आयोजित ‘ट्राइबल सॉलिडैरिटी मार्च’ के बाद शुरू हुए इस जातीय संघर्ष में अब तक 200 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और हजारों लोग विस्थापित हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट लगातार इस मामले की कानूनी और मानवीय स्थिति पर नजर बनाए हुए है।

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