लोकसभा ने सुप्रीम कोर्ट के जजों की संख्या 38 करने वाला विधेयक पारित किया

लोकसभा ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 ध्वनिमत से पारित कर दिया। इस विधेयक के जरिए सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सहित स्वीकृत जजों की संख्या 33 से बढ़ाकर 38 कर दी गई है।

विधेयक को कानून एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने सदन में पेश किया। यह सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) अधिनियम, 1956 की धारा 2 में संशोधन करता है। संशोधन के तहत “तैंतीस” की जगह “सैंतीस” शब्द रखा गया है, जिससे मुख्य न्यायाधीश सहित कुल स्वीकृत जजों की संख्या 38 हो जाएगी।

बढ़ते लंबित मामलों का दिया गया हवाला

विधेयक के उद्देश्यों और कारणों के विवरण (Statement of Objects and Reasons) में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट में बढ़ते लंबित मामलों को देखते हुए जजों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता महसूस की गई।

1 जनवरी 2026 तक सुप्रीम कोर्ट में 92,101 मामले लंबित थे। सरकार के अनुसार, 2019 से कोर्ट लगभग पूरी स्वीकृत क्षमता यानी 34 जजों के साथ काम कर रहा है, फिर भी 2025 में 75,410 नए मामले दाखिल हुए, जबकि केवल 65,615 मामलों का निस्तारण हो सका। सरकार ने यह भी कहा कि अतिरिक्त जजों की नियुक्ति से संविधान पीठों को अधिक समय तक नियमित रूप से बैठाने में भी सुविधा होगी।

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सरकार पर कितना आएगा खर्च

विधेयक के वित्तीय ज्ञापन (Financial Memorandum) के अनुसार, अतिरिक्त जजों और उनके स्टाफ पर हर वर्ष लगभग ₹10.57 करोड़ का आवर्ती खर्च आएगा। इसके अलावा आधिकारिक आवास और वाहनों की व्यवस्था के लिए लगभग ₹3.47 करोड़ का एकमुश्त खर्च अनुमानित है।

कैबिनेट ने पहले ही दी थी मंजूरी

सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करने के प्रस्ताव को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 5 मई 2026 को मंजूरी दी थी। इसके बाद 16 मई को इस संबंध में अध्यादेश (Ordinance) जारी किया गया था।

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अब लोकसभा से विधेयक पारित होने के बाद इस बढ़ोतरी को संसदीय मंजूरी मिल गई है।

2019 के बाद पहली बार बढ़ी स्वीकृत संख्या

संसद के कानून के जरिए सुप्रीम कोर्ट की स्वीकृत जज संख्या में यह पहली बढ़ोतरी है। इससे पहले वर्ष 2019 में जजों की संख्या 31 से बढ़ाकर 34 की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट की स्थापना 1950 में हुई थी, तब मुख्य न्यायाधीश सहित कुल आठ जजों का प्रावधान था। इसके बाद 1956 में यह संख्या 11, 1960 में 14, 1977 में 18, 1986 में 26 और 2009 में 31 की गई। 1979 तक एक अवधि के लिए कैबिनेट ने जजों की संख्या 15 तक सीमित कर दी थी, लेकिन तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के अनुरोध पर यह प्रतिबंध बाद में हटा लिया गया।

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