दोहरे बरी करने के फैसले को महज दूसरी राय संभव होने के आधार पर नहीं पलटा जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) और हाईकोर्ट दोनों ने किसी आरोपी को बरी कर दिया है, तो संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत उस फैसले में केवल इसलिए हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता क्योंकि साक्ष्यों के आधार पर दूसरी राय भी संभव है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने 1998 के एक हत्या के मामले में आरोपी को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती देने वाली अपील खारिज करते हुए यह निर्णय दिया।

अदालत ने कहा कि बरी किए जाने का आदेश आरोपी की निर्दोषता के पूर्वधारणा (presumption of innocence) को और अधिक मजबूत करता है। जब तक कि निर्णय में कोई गंभीर अवैधता, विकृति (perversity) या साक्ष्यों का सरासर गलत मूल्यांकन न दिखे, तब तक ऐसे फैसले को नहीं बदला जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 11 अक्टूबर 1998 की शाम लगभग 4:00 बजे बिहार के सोहरपुर गांव में एक धान के खेत के पास हुई घटना से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, सूचक राजू कुमार, उनके बड़े भाई विनोद प्रसाद (मृतक), मृतक के बेटे संजय कुमार (अपीलकर्ता) और गांव के अन्य लोग योगीपुर बाजार से घरेलू सामान खरीदकर लौट रहे थे। इसी दौरान प्रतिवादी संख्या 2 (नकुल प्रसाद उर्फ नकुल यादव) और अन्य सह-आरोपियों ने उन्हें घेर लिया।

आरोप था कि अनुग्रह प्रसाद ने राइफल से विनोद प्रसाद के माथे पर गोली मारी, बब्लू प्रसाद ने कानपटी पर, राजदेव प्रसाद ने सिर के पिछले हिस्से में और नकुल प्रसाद ने राइफल से ठोड़ी/दाढ़ी के दाहिने हिस्से पर गोली चलाई। विनोद प्रसाद की मौके पर ही मौत हो गई।

घटना की रात ही फर्दबयान दर्ज किया गया, जिसके आधार पर हिलसा थाने में भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 और आर्म्स एक्ट की धारा 27 के तहत मामला दर्ज हुआ। नकुल प्रसाद के मामले को बाद में अलग करके सेशन ट्रायल संख्या 596/2003 के रूप में चलाया गया।

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24 दिसंबर 2024 को अपर सत्र न्यायाधीश-III, हिलसा (नालंदा) ने नकुल प्रसाद को बरी कर दिया। अपीलकर्ता ने इस फैसले को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन हाईकोर्ट ने 11 सितंबर 2025 को अपील खारिज कर दी। इसके बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि प्रत्यक्षदर्शियों (PW-1, PW-2 और PW-4) ने लगातार नकुल प्रसाद पर ही जानलेवा गोली चलाने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि डॉक्टर अवधेश कुमार सिंह (PW-6) ने भी मृतक की ठोड़ी पर बंदूक की गोली का घाव (इनवर्टेड मार्जिन और कालेपन के साथ) दर्ज कर इस बात की पुष्टि की थी। अपीलकर्ता ने यह भी कहा कि रिश्तेदार गवाह स्वाभाविक गवाह होते हैं और केवल मृतक से रिश्ते के आधार पर उनकी गवाही खारिज नहीं की जा सकती।

राज्य सरकार ने अपीलकर्ता का समर्थन करते हुए आरोपी के आपराधिक इतिहास का हवाला दिया और कहा कि प्रत्यक्षदर्शियों के बयान सुसंगत होने के कारण स्वतंत्र गवाहों का परीक्षण न होना अभियोजन के लिए घातक नहीं है।

दूसरी ओर, नकुल प्रसाद के वकील ने तर्क दिया कि दोहरी दोषमुक्ति (concurrent acquittal) के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप का दायरा बेहद सीमित है। उन्होंने बताया कि एफआईआर में चार गोलियों के घाव का दावा किया गया था, जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में केवल तीन ही गोलियां घुसने के निशान (entry wounds) मिले। इसके अलावा, चार्जशीट में नामजद पांच स्वतंत्र गवाहों में से दो मुकर गए (hostile) और तीन को अभियोजन ने अदालत में पेश ही नहीं किया। इस प्रकार पूरा मामला केवल हितबद्ध और रिश्तेदार गवाहों के बयानों पर ही टिका रहा।

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सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

बरी किए जाने के फैसले में हस्तक्षेप के दायरे पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने काली राम बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य, घुरे लाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, चंद्राप्पा बनाम कर्नाटक राज्य और मृणाल दास बनाम त्रिपुरा राज्य मामलों के स्थापित सिद्धांतों को दोहराया। अदालत ने जोर दिया कि दोषमुक्त किए जाने से निर्दोषता का अनुमान और मजबूत हो जाता है।

काली राम बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य मामले का उल्लेख करते हुए अदालत ने टिप्पणी की:

“यदि मामले में प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर दो विचार संभव हैं—एक आरोपी के दोष की ओर इशारा करता है और दूसरा उसकी निर्दोषता की ओर—तो आरोपी के अनुकूल विचार को ही अपनाया जाना चाहिए।”

रिश्तेदार गवाहों के बयानों का मूल्यांकन करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दलीप सिंह बनाम पंजाब राज्य मामले का हवाला दिया और स्पष्ट किया कि केवल पारिवारिक संबंधों के कारण गवाही खारिज नहीं होती, लेकिन ऐसे बयानों की बहुत सूक्ष्मता से जांच जरूरी होती है। जहां प्रत्यक्षदर्शियों के बयान मेडिकल रिपोर्ट से मेल न खाते हों और स्वतंत्र गवाह समर्थन न करें, वहां अदालतों को अत्यधिक सतर्कता बरतनी चाहिए।

प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों और मेडिकल साक्ष्यों के बीच विरोधाभास पर हाईकोर्ट के निष्कर्षों को सही ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की टिप्पणी को उद्धृत किया:

“चिकित्सीय साक्ष्यों और एफआईआर के विवरण के बीच यह स्पष्ट असंगति अभियोजन पक्ष के मामले को कमजोर करती है।”

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता के इस तर्क को खारिज कर दिया कि सिर्फ एक घाव (ठोड़ी का घाव) मैच हो जाने के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया जाना चाहिए। अदालत ने माना कि आपराधिक मामलों में किसी एक अलग-थलग परिस्थिति के आधार पर दोषसिद्धि नहीं दी जा सकती, जबकि बाकी अभियोजन कहानी विरोधाभासों से भरी हो। चश्मदीदों ने चार आरोपियों द्वारा चार गोलियां चलाए जाने का दावा किया था, जबकि पोस्टमार्टम में केवल तीन ही गोलियों के मार्ग मिले। बब्लू द्वारा कानपटी पर गोली मारने के दावे को मेडिकल रिपोर्ट में माथे की गोली का निकास घाव (exit wound) पाया गया, जो प्रत्यक्षदर्शी के दावे का सीधा खंडन करता है।

독립 गवाहों की भूमिका पर अदालत ने कहा कि अभियोजन ने केवल दो स्वतंत्र गवाहों (PW-3 और PW-5) का परीक्षण कराया और दोनों ही मुकर गए। बाकी गवाहों को बिना किसी कारण के रोक लिया गया। अदालत ने कहा कि हालांकि स्वतंत्र गवाहों का न होना हमेशा घातक नहीं होता, लेकिन जब मेडिकल और चश्मदीद गवाहों के बयानों में टकराव हो, तो यह बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।

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आरोपी के आपराधिक इतिहास और बचाव पक्ष के दावों पर अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन को अपने मामले के बल पर ही साबित होना होगा। आरोपी के अन्य मुकदमों या इतिहास का इस्तेमाल अभियोजन की कमियों को छिपाने या बरी करने के फैसले को पलटने के लिए नहीं किया जा सकता।

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट और पटना हाईकोर्ट का फैसला साक्ष्यों के तर्कसंगत और संभावित मूल्यांकन पर आधारित था और इसमें कोई विकृति या अवैधता नहीं थी। अनुच्छेद 136 के तहत हस्तक्षेप का कोई आधार न पाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी और आरोपी को बरी किए जाने के फैसले की पुष्टि की।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: संजय कुमार बनाम बिहार राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: आपराधिक अपील संख्या 3316 / 2026
पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह
निर्णय की तिथि: 21 जुलाई 2026

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