पटना हाईकोर्ट ने ऑन-ड्यूटी शराब के नशे में होने के आरोप में बर्खास्त किए गए बिहार पुलिस के एक सिपाही के बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने पाया कि विभागीय जांच में शराब सेवन का आरोप साबित नहीं हो सका और सिपाही के खिलाफ ताड़ी पीने से संबंधित कोई औपचारिक आरोप भी तय नहीं किया गया था।
विभागीय जांच की कमियों पर अदालत की सख्त टिप्पणी
जस्टिस हरीश कुमार की एकल पीठ ने 17 जुलाई को जारी अपने फैसले में मई 2020 के बर्खास्तगी आदेश को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि विभागीय प्राधिकारी ने उस मुख्य तथ्य को अनदेखा कर दिया, जिसमें आरोपी सिपाही के खिलाफ सिर्फ शराब पीने और उपद्रव मचाने का आरोप पत्र सौंपा गया था।
अदालत ने कहा, “अनुशासनिक प्राधिकारी ने इस महत्वपूर्ण तथ्य को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ तय किया गया आरोप केवल शराब के सेवन और उसके प्रभाव में उपद्रव करने तक सीमित था। ताड़ी के सेवन से जुड़ा कोई आरोप कभी बनाया ही नहीं गया था।”
पीठ ने आगे कहा कि जांच के दौरान न तो कथित ब्रेथ एनालाइजर जांच की रिपोर्ट पेश की गई और न ही उस व्यक्ति का बयान दर्ज किया गया जिसने यह टेस्ट किया था। इसके अलावा जांच में शामिल गवाह भी सिपाही द्वारा शराब पीने के दावे को साबित करने में विफल रहे। हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी के निष्कर्षों को कानूनन अमान्य और विकृत करार दिया।
नवंबर 2019 की घटना और विभागीय कार्रवाई
यह मामला नवादा जिले के पकरीबरावां पुलिस स्टेशन का है। नवंबर 2019 में गश्त पर निकले एक पुलिस अधिकारी ने थाने के मुख्य दरवाजे पर दो लोगों को आपस में बहस करते देखा। पुलिसकर्मियों को देखकर दोनों ने भागने की कोशिश की, लेकिन उन्हें पकड़ लिया गया।
पकड़े गए व्यक्तियों की पहचान रत्नाकर पंडित और याचिकाकर्ता सिपाही के रूप में हुई। याचिकाकर्ता 1986 में पुलिस सेवा में शामिल हुआ था और उस समय पकरीबरावां थाने में राइटर-कांस्टेबल (पीटीसी) के पद पर तैनात था।
पुलिस के अनुसार, मौके पर किए गए ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट में दोनों के शराब पीने का दावा किया गया। हालांकि, जब प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में सिपाही की डॉक्टरी जांच कराई गई, तो डॉक्टर ने रिपोर्ट में केवल मुंह से ताड़ी की गंध आने की बात दर्ज की। इसके बाद सिपाही को निलंबित कर विभागीय जांच शुरू कर दी गई थी।
बचाव पक्ष की दलीलें और राज्य सरकार का पक्ष
सिपाही की ओर से अदालत में पैरवी करते हुए अधिवक्ता संजय कुमार गिर ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल ने एक चिकित्सक की सलाह पर बीमारी के इलाज के लिए ताड़ी का सेवन किया था। उन्होंने बिहार नीरा (ताड़ का गैर-किण्वित रस) नियमावली, 2017 का हवाला देते हुए कहा कि ताड़ी या नीरा का सेवन प्रतिबंधित या दंडनीय नहीं है।
वकील ने यह भी रेखांकित किया कि सिपाही का 1986 से अब तक का सेवा काल बेदाग रहा है और उसे कई प्रशस्ति पत्र भी मिल चुके हैं। जांच के दौरान न तो ताड़ी की सलाह देने वाले डॉक्टर का बयान लिया गया और न ही ब्रेथ टेस्ट करने वाले तकनीशियन को बुलाया गया।
दूसरी तरफ, राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता बसरुल खान ने दलील दी कि ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट में सिपाही के नशे में होने की पुष्टि हुई थी। उन्होंने तर्क दिया कि बिहार मद्यनिषेध और उत्पाद अधिनियम के तहत ताड़ी को देशी या पारंपरिक शराब की श्रेणी में रखा गया है, इसलिए चिकित्सीय सलाह के आधार पर ताड़ी पीने का तर्क सिपाही के बचाव के लिए पर्याप्त नहीं है।
अपील खारिज होने के बाद हाईकोर्ट का फैसला
विभागीय प्राधिकारी ने सिपाही के तर्कों को खारिज करते हुए 29 मई 2020 को उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया था। इसके खिलाफ की गई विभागीय अपील भी जुलाई 2023 में खारिज कर दी गई थी, जब यह मामला हाईकोर्ट में लंबित था।
अदालत ने पाया कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने सबूतों के अभाव के बावजूद यह मान लिया कि ताड़ी का सेवन प्रतिबंधित है और केवल इसी आधार पर बर्खास्तगी को सही ठहराने का प्रयास किया। साक्ष्यों की कमी और प्रक्रियात्मक खामियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी के आदेश को रद्द करते हुए सिपाही के पक्ष में फैसला सुनाया।

