2010 बाल यौन उत्पीड़न मामला: मां और नानी के मुकरने के बावजूद दिल्ली हाईकोर्ट ने बरकरार रखी दोषी की सजा

दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2010 के एक बाल यौन उत्पीड़न मामले में दोषी व्यक्ति की दो साल की सश्रम कैद और 5,000 रुपये के जुर्माने की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा कि गरीबी और लाचारी के कारण पीड़ित बच्ची की मां और नानी भले ही मुकदमे के दौरान अपने बयानों से मुकर गईं, लेकिन पीड़ित बच्ची की गवाही पूरी तरह से विश्वसनीय और खरी साबित हुई है।

सामाजिक लाचारी पर कोर्ट की अहम टिप्पणी

16 जुलाई को पारित अपने आदेश में जस्टिस विमल कुमार यादव की पीठ ने दोषी की अपील को खारिज कर दिया। पीठ ने टिप्पणी की कि समाज और अर्थव्यवस्था की सीढ़ी पर किसी व्यक्ति का स्थान ही यह तय करता है कि वह शोषण, भेदभाव और अपराधों के प्रति कितना संवेदनशील है। अदालत ने माना कि पीड़ित परिवार की अत्यधिक गरीबी और सामाजिक-आर्थिक लाचारी की वजह से उसकी मां और नानी ने अभियोजन पक्ष का साथ छोड़ दिया था। हालांकि, तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों और मां के दबाव के बावजूद सच्चाई ठीक उसी तरह उभरकर सामने आई, जैसे पानी की सतह पर तेल तैरने लगता है।

जस्टिस यादव ने कहा कि घटना के समय बच्ची की उम्र महज सात साल थी। उसकी कम उम्र, लिंग और परिवार की आर्थिक स्थिति ने उसे और अधिक असुरक्षित बना दिया था। इसके बावजूद, जब बच्ची से पूछताछ की गई तो उसने एक निष्पाप और दुनिया की बुराइयों से अछूते बालमन के साथ सही और सच्चा विवरण अदालत के सामने रखा।

मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी तर्क

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यह मामला 30 अगस्त 2010 का है, जब एक नौकर क्वार्टर के पास छत पर सात साल की मासूम बच्ची के साथ यौन उत्पीड़न किया गया था। इस मामले में पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत बलात्कार के प्रयास के आरोप में चार्जशीट दाखिल की थी। विचारण अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए दो साल की सश्रम जेल और 5,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।

अपील दायर करते हुए बचाव पक्ष के अधिवक्ता एम.के. खन्ना ने तर्क दिया था कि पीड़ित की मां और नानी के मुकर जाने के कारण अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर पड़ गया है। उन्होंने दावा किया कि साक्ष्य बलात्कार के प्रयास के अपराध को साबित करने के लिए अपर्याप्त हैं और यह मामला किसी कम गंभीर अपराध का हो सकता है।

दूसरी ओर, अतिरिक्त लोक अभियोजक सतिंदर सिंह बावा ने इस तर्क का विरोध करते हुए कहा कि अदालत को साक्ष्यों का मूल्यांकन टुकड़ों में करने के बजाय समग्र रूप से करना चाहिए। उन्होंने कहा कि पीड़िता का बयान और दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 313 के तहत आरोपी का स्वयं का बयान निचली अदालत के फैसले को बनाए रखने के लिए पूरी तरह से पर्याप्त आधार हैं।

जमीनी हकीकत और पीड़िता का मानसिक आघात

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संवैधानिक प्रावधानों पर चर्चा करते हुए हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की संवैधानिक गारंटियों के बावजूद समाज के कमजोर वर्गों के लिए जमीनी हकीकत अब भी काफी कठोर है। शिक्षा और जागरूकता से भले ही कुछ बदलाव आया हो, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर लोग अब भी असमानता और उत्पीड़न का शिकार हो रहे हैं।

अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि किसी बच्चे से बार-बार दर्दनाक घटना के बारे में पूछने से वह उस आघात को दोबारा जीने के लिए मजबूर होता है। इस मामले में बच्ची की मां द्वारा उसे प्रभावित करने की कोशिशों ने उसकी उलझन को और बढ़ा दिया था। अदालत ने नोट किया कि बच्ची ने शुरुआत में अपनी मां के प्रभाव में आकर एक अलग बयान दिया था, लेकिन बाद में उसने स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट के समक्ष दिया गया उसका पहला बयान ही पूरी तरह से सच था।

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हाईकोर्ट ने अंततः निष्कर्ष निकाला कि पीड़िता की गवाही, रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य सामग्रियों और आरोपी के बयानों के साथ मिलाकर देखने पर, दोषी की सजा को बरकरार रखने के लिए पूरी तरह ठोस और पर्याप्त है।

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