सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि संपत्ति से संबंधित दीवानी (सिविल) विवादों को आपराधिक मुकदमों में बदलकर प्रतिशोध लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने गुजरात हाईकोर्ट के एक आदेश को दरकिनार करते हुए एक पुरानी एफआईआर को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली का इस्तेमाल उत्पीड़न के हथियार के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद सूरत के पनस गांव में स्थित सर्वे नंबर 157 की जमीन से जुड़ा है। इस संपत्ति को लेकर साल 2000 से सिविल अदालतों में मुकदमेबाजी चल रही है। विवाद तब गहराया जब साल 2009 में प्रतिवादी संख्या 2 ने उमरा पुलिस स्टेशन में एक एफआईआर दर्ज कराई, जिसमें धोखाधड़ी, जालसाजी और जबरन वसूली (extortion) जैसी धाराओं के तहत आरोप लगाए गए। याचिकाकर्ताओं ने इस एफआईआर को रद्द करने के लिए गुजरात हाईकोर्ट का रुख किया था, लेकिन हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
दलीलें
याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि यह एफआईआर पूरी तरह से ‘दबाव बनाने’ की रणनीति है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वर्षों तक चली सिविल मुकदमेबाजी के दौरान प्रतिवादी ने कभी भी जालसाजी या जबरन वसूली का आरोप नहीं लगाया था। उनका मुख्य तर्क यह था कि एक सिविल विवाद को आपराधिक रंग देने के लिए यह एक ‘दूसरी शिकायत’ (second complaint) है, जिसमें पहले की शिकायतों के मुकाबले मनगढ़ंत सुधार किए गए हैं।
वहीं, प्रतिवादी के वकीलों ने दावा किया कि यह केवल जमीन का विवाद नहीं है, बल्कि इसमें जालसाजी और आपराधिक साजिश शामिल है। उन्होंने याचिकाकर्ताओं के पुराने ‘आपराधिक इतिहास’ (criminal antecedents) का हवाला देते हुए इसे अपराध का एक पैटर्न बताया।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दो मुख्य बातों पर गौर किया: एफआईआर दर्ज कराने में 9 साल की अत्यधिक देरी और शिकायत में ‘सुधारात्मक बदलाव’। अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा:
“हमारी राय में, दूसरी शिकायत में जबरन वसूली, धन की मांग और धमकी के आरोपों का बाद में जुड़ना विवाद की प्रकृति को पूरी तरह बदल देता है। यह इस तर्क की पुष्टि करता है कि आपराधिक कार्यवाही महज एक ‘सोची-समझी साजिश’ (afterthought) है, जिसका मकसद सिविल विवाद को आपराधिक रंग देना है।”
अदालत ने ‘मोहम्मद इब्राहिम बनाम बिहार राज्य’ मामले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि किसी संपत्ति पर विवादित स्वामित्व का दावा करने भर से वह ‘जाली दस्तावेज’ नहीं बन जाता। साथ ही, प्रतिवादी द्वारा उठाए गए ‘आपराधिक इतिहास’ के तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने ‘मोहम्मद वाजिद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ का उल्लेख किया और कहा कि सिर्फ पुराने आपराधिक रिकॉर्ड के आधार पर राहत से इनकार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा:
“हमारा मानना है कि अचल संपत्ति के स्वामित्व से जुड़े विवादों में आपराधिक प्रक्रिया का इस्तेमाल उत्पीड़न और दबाव बनाने के हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता।”
निष्कर्ष और निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह मामला ‘राज्य बनाम भजन लाल’ मामले में निर्धारित उन श्रेणियों में आता है जहां दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत हस्तक्षेप करना आवश्यक है। कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और संबंधित एफआईआर तथा उससे जुड़ी सभी कार्यवाही को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल आपराधिक कार्यवाही तक सीमित है और इसका लंबित सिविल मुकदमों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
केस विवरण
- केस शीर्षक: भिखुभाई गोविंदभाई पटेल और अन्य बनाम गुजरात राज्य और अन्य
- केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2026 (SLP (Crl.) No. 15537/2023 से उत्पन्न)
- पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली
- निर्णय तिथि: 22 मई, 2026

