देश में बच्चों की तस्करी और उनके व्यावसायिक यौन शोषण (CSE) के खिलाफ कानूनी लड़ाई को और मजबूत करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि नाबालिगों की तस्करी और यौन शोषण के मामलों में अब आरोपियों के खिलाफ बेहद सख्त ‘पॉक्सो’ (POCSO) कानून के तहत मुकदमा चलाया जाएगा।
जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने यह ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि तस्करी के मामलों में अपराधियों पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) और अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम (ITPA) के साथ-साथ पॉक्सो की धाराएं भी लगाई जा सकती हैं। अदालत का यह रुख पीड़ितों की सुरक्षा और दोषियों को कड़ी सजा दिलाने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।
कानूनी बचाव के रूप में “सहमति” के तर्क का अंत
इस फैसले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने तस्करी के मामलों में आरोपियों द्वारा दिए जाने वाले “सहमति” (Consent) के तर्क को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि वयस्क पीड़ितों के मामलों में भी सहमति कानूनी रूप से तब पूरी तरह बेमानी हो जाती है, जब पीड़ित को डरा-धमकाकर, बल प्रयोग करके, अपहरण, धोखाधड़ी, बहलाने-फुसलाने, सत्ता के दुरुपयोग या लाचारी का फायदा उठाकर जाल में फंसाया गया हो।
नाबालिगों के मामले में अदालत का रुख और भी कड़ा रहा:
“तस्करी के शिकार बच्चे की सहमति पूरी तरह से अप्रासंगिक (Irrelevant) है, चाहे उसके खिलाफ किसी बल या धोखे के माध्यम का उपयोग किया गया हो या नहीं।”
पीठ ने जोर देकर कहा कि तस्करी के अपराध को साबित करने के लिए ‘सहमति की कमी’ को साबित करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि एक बार यह साबित हो जाता है कि पीड़ित बच्चे की तस्करी की गई है, तो आरोपी यह कहकर नहीं बच सकता कि बच्चा अपनी मर्जी से आया था।
इसके साथ ही, अदालत ने यह भी साफ किया कि यदि किसी पीड़ित को पहले से यह जानकारी थी कि उसे देह व्यापार के काम में धकेला जा रहा है, तब भी उसे पीड़ित की श्रेणी से बाहर नहीं किया जा सकता। अक्सर पीड़ितों को काम की वास्तविक परिस्थितियों को लेकर गुमराह किया जाता है, जो बाद में जाकर अत्यधिक शोषक साबित होती हैं।
पॉक्सो (POCSO) एक्ट लागू होने से क्या बदलेगा?
तस्करी के मामलों में भारतीय न्याय संहिता की धारा 143, 144 और ITPA के साथ पॉक्सो कानून को जोड़ने का सुप्रीम कोर्ट का निर्णय जांच और कानूनी प्रक्रिया की तस्वीर को पूरी तरह बदल देगा।
भारतीय कानून के मुताबिक, बच्चों के साथ होने वाले किसी भी प्रकार के यौन शोषण को कानूनन गैर-सहमति वाला (Non-Consensual) ही माना जाता है। पॉक्सो कानून को विशेष रूप से बच्चों के खिलाफ होने वाले हर तरह के यौन अपराधों—जैसे यौन उत्पीड़न, गंभीर यौन हमला और बाल यौन शोषण सामग्री के निर्माण या भंडारण—को रोकने के लिए तैयार किया गया है।
पॉक्सो एक्ट लागू होने से पूरी जांच प्रक्रिया अधिक संवेदनशील हो जाती है। अदालत ने रेखांकित किया कि इस कानून के तहत मामलों की रिपोर्टिंग करने, पीड़ित बच्चे के बयान दर्ज करने और उनकी चिकित्सा जांच कराने के लिए विशेष बाल-अनुकूल नियम हैं, जो बच्चे के हितों की रक्षा करते हैं और उन्हें मानसिक तनाव से बचाते हैं।
सिर्फ ‘बचाव’ नहीं, सम्मानजनक पुनर्वास अब संवैधानिक अधिकार
यह ऐतिहासिक आदेश गैर-सरकारी संगठन (NGO) ‘प्रज्वला’ द्वारा दायर एक याचिका पर आया है, जिसमें मानव तस्करी को रोकने और व्यावसायिक यौन शोषण के पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा के लिए ठोस दिशा-निर्देशों की मांग की गई थी।
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील बात कही। अदालत ने कहा कि अब समय आ गया है जब हम तस्करी के पीड़ितों को सिर्फ “बचाव का निष्क्रिय पात्र” (Passive Subjects of Rescue) मानना बंद करें। इसके बजाय, उन्हें स्वतंत्र और सशक्त व्यक्तियों के रूप में देखा जाना चाहिए, जो अपने भविष्य के बारे में खुद निर्णय लेने में सक्षम हों।
अदालत ने जांच अधिकारियों को भी सचेत किया कि मानव तस्करी से जुड़े कानून स्थिर या एक समान नहीं हैं। यह पीड़ित की उम्र, तस्करों द्वारा अपनाए गए तरीकों और शोषण की प्रकृति के आधार पर अलग-अलग मामलों में भिन्न हो सकते हैं। इसलिए जांच अधिकारियों को हर मामले को एक समग्र दृष्टिकोण (Holistic Appreciation) से देखना चाहिए।
आखिर में, सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ितों के पुनर्वास को सीधे भारत के संविधान से जोड़ा। संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) और अनुच्छेद 23 (मानव तस्करी और जबरन श्रम पर रोक) का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि पीड़ितों का सम्मानजनक पुनर्वास राज्य का अनिवार्य कर्तव्य है। यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो पीड़ित दोबारा उसी दलदल और शोषक तंत्र में फंसने के लिए विवश हो जाते हैं जिनसे उन्हें बचाया गया था।

