सुप्रीम कोर्ट ने साल 2007 के एक चर्चित बैंक कर्मी हत्याकांड में आरोपी पत्नी और दो अन्य लोगों को बरी करने के फैसले को बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष हत्या के आरोपों को साबित करने के लिए जरूरी कड़ियों को जोड़ने में नाकाम रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि परिस्थितियों की कड़ियां टूटी हुई हैं और केवल अपराध के अनुमान के आधार पर दोषसिद्धि को साबित नहीं माना जा सकता।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने महाराष्ट्र सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें बॉम्बे हाईकोर्ट के 2010 के फैसले को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने साल 2008 में निचली अदालत (सेशंस कोर्ट) द्वारा मोनिका किरण सूर्यवंशी, प्रकाश नागराज पाटिल और ज्ञानेश्वर महाले को दी गई उम्रकैद की सजा को रद्द करते हुए उन्हें बरी कर दिया था।
फोरेंसिक साक्ष्यों और जांच में गंभीर लापरवाही
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में पुलिस जांच और फोरेंसिक सबूतों की गंभीर विसंगतियों को रेखांकित किया। पुलिस का दावा था कि किरण सूर्यवंशी की उनके बेडरूम में ही बेरहमी से पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। हालांकि, कोर्ट ने इस बात पर सवाल उठाए कि घटनास्थल यानी बेडरूम के गद्दे, चादर या तकिये पर खून का एक भी निशान नहीं मिला। कोर्ट ने कहा कि यह भौतिक असंभावना अपने आप में बहुत कुछ बयां करती है और अभियोजन पक्ष के उस मूल कथानक का पूरी तरह से खंडन करती है कि मृतक को उसके बिस्तर पर ही बेदर्दी से मार दिया गया था।
इसके अलावा, कोर्ट ने बरामद किए गए हत्या के कथित हथियार को लेकर भी पुलिस की लापरवाही उजागर की। पुलिस का दावा था कि मोनिका के पास से वारदात में इस्तेमाल सिलबट्टा बरामद किया गया था, लेकिन जब उसे जब्त किया गया, तो सील नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि इस चूक की वजह से अन्य फोरेंसिक रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर भी पानी फिर गया।
प्रेम प्रसंग और कॉल रिकॉर्ड के दावे खारिज
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि मोनिका का अपने पड़ोसी प्रकाश पाटिल के साथ अवैध संबंध था और इसी वजह से उसने पति की हत्या की साजिश रची। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस कथित मकसद को बेहद कमजोर और नाकाफी माना। गवाहों के बयानों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि यह केवल प्रकाश की तरफ से एकतरफा झुकाव या आकर्षण था और इससे यह कतई साबित नहीं होता कि मोनिका भी इस रिश्ते में शामिल थी।
अदालत ने यह भी पाया कि कॉल रिकॉर्ड की जांच पुलिस की कहानी से मेल नहीं खाती। पुलिस के मुताबिक मोनिका ने घटना की रात प्रकाश से फोन पर संपर्क किया था, जबकि डिजिटल जांच में मोनिका के फोन से प्रकाश को कोई भी आउटगोइंग कॉल किए जाने का प्रमाण नहीं मिला। पीठ ने कहा कि केवल टेलीफोन रिकॉर्ड पेश करना उस अवैध संबंध का ठोस सबूत नहीं हो सकता जिसके कारण हत्या जैसी वारदात को अंजाम दिया गया हो।
यह था पूरा मामला
यह पूरा घटनाक्रम फरवरी 2007 का है, जब महाराष्ट्र के देवपुर में आईसीआईसीआई बैंक के कर्मचारी किरण सूर्यवंशी की संदिग्ध हालात में मौत हो गई थी। पुलिस का आरोप था कि पत्नी मोनिका ने अपने पति को पहले कोई नशीली दवा या इंजेक्शन दिया और फिर भारी सिलबट्टे से उसका सिर कुचल दिया। इसके बाद शव को ठिकाने लगाने के उद्देश्य से प्लास्टिक की थैली और चादर में लपेट दिया गया।
पुलिस के मुताबिक, सह-आरोपी प्रकाश और ज्ञानेश्वर बाइक पर शव को ले जा रहे थे, तभी एक पुलिस कांस्टेबल ने उन्हें रोका और इस मामले का पर्दाफाश हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने हत्या और साजिश के आरोपों से तीनों को बरी करने के फैसले को तो कायम रखा, लेकिन सबूत मिटाने के आरोप (आईपीसी की धारा 201) के तहत प्रकाश और ज्ञानेश्वर की सजा को बरकरार रखा। इस अपराध के लिए दोनों पहले ही कानूनन निर्धारित एक साल की कैद भुगत चुके हैं।

