क्या आर्बिट्रेशन शुरू करने से पहले ठेकेदार से प्री-डिपॉजिट की मांग की जा सकती है? सुप्रीम कोर्ट ने मामला बड़ी पीठ को भेजा

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मनमोहन और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने उस कानूनी सवाल को भारत के मुख्य न्यायाधीश के पास बड़ी पीठ के समक्ष विचार हेतु भेज दिया है, जिसमें यह पूछा गया है कि क्या आर्बिट्रेशन शुरू करने से पहले ठेकेदार से दावे की राशि का 10 प्रतिशत प्री-डिपॉजिट जमा कराने की शर्त संवैधानिक और कानूनी रूप से वैध है। वर्ष 2009 के एस.के. जैन बनाम हरियाणा राज्य मामले में तीन जजों की पीठ द्वारा दिए गए उस फैसले की वैधता पर संदेह व्यक्त करते हुए, जिसमें रिफंडेबल सिक्योरिटी प्री-डिपॉजिट को सही ठहराया गया था, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि प्री-डिपॉजिट की ऐसी अत्यधिक शर्तें मुकदमा करने के अधिकार को नाममात्र का बना देती हैं और वैकल्पिक विवाद समाधान के मूल उद्देश्य को ही परास्त करती हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद हरियाणा स्टेट इंडस्ट्रियल एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (प्रतिवादी) द्वारा 7 नवंबर 2016 को गुरुग्राम के सेक्टर-35, उद्योग विहार, फेज-VII में स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज सिस्टम और आकस्मिक कार्यों के निष्पादन के लिए आमंत्रित ई-निविदा से जुड़ा है। याचिकाकर्ता, मेसर्स संतोष एसोसिएट प्राइवेट लिमिटेड को 17 मई 2017 को 5,14,11,635 रुपये की कुल राशि पर यह कॉन्ट्रैक्ट सौंपा गया था।

कॉन्ट्रैक्ट में क्लॉज 25-ए(vii) शामिल था, जिसके तहत यदि ठेकेदार 1,00,000 रुपये या उससे अधिक का दावा उठाता है, तो आर्बिट्रेशन के संदर्भ से पहले दावे की राशि का 10 प्रतिशत सुरक्षा जमा के रूप में जमा करना अनिवार्य था। क्लॉज में निर्दिष्ट था कि जमा की गई राशि को आर्बिट्रेटर द्वारा दावेदार के खिलाफ दिए गए किसी भी खर्च के साथ समायोजित किया जाएगा, और यदि कोई खर्च नहीं लगाया जाता है, तो पूरी राशि या शेष राशि अवॉर्ड की तारीख से एक महीने के भीतर वापस कर दी जाएगी।

परियोजना के निष्पादन के दौरान, साइट से संबंधित चुनौतियों के कारण काम के दायरे में काफी कमी आई और 19 जनवरी 2021 को कॉन्ट्रैक्ट का मूल्य घटाकर 2,40,93,059 रुपये कर दिया गया। कम हुए दायरे का काम पूरा होने के बाद अंतिम भुगतान के निपटारे को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया। 8 अगस्त 2024 को पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने आर्बिट्रेशन एंड कंसिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 11(6) के तहत अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए एक एकल आर्बिट्रेटर की नियुक्ति की।

आर्बिट्रेशन कार्यवाही की शुरुआत में ही, प्रतिवादी ने एक्ट की धारा 16 के तहत एक आवेदन दायर कर तर्क दिया कि 1,00,000 रुपये से अधिक के दावों के लिए अनिवार्य 10 प्रतिशत प्री-डिपॉजिट जमा करने में विफलता के कारण यह संदर्भ सुनवाई योग्य ही नहीं है। 1 अगस्त 2025 को एकल आर्बिट्रेटर ने धारा 16 के आवेदन को स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता को 15 दिनों के भीतर दावे की 10 प्रतिशत राशि जमा करने का निर्देश दिया। याचिकाकर्ता द्वारा इनकार किए जाने पर, उसके दावे को पूरी तरह से खारिज कर दिया गया।

याचिकाकर्ता ने इस आदेश को एक्ट की धारा 37(2) के तहत कमर्शियल कोर्ट, गुरुग्राम के समक्ष चुनौती दी। 12 सितंबर 2025 को कमर्शियल कोर्ट ने अपील खारिज कर दी और माना कि आर्बिट्रेटर का रुख तार्किक था और सुप्रीम कोर्ट के एस.के. जैन बनाम हरियाणा राज्य (2009) के फैसले द्वारा समर्थित था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

याचिकाकर्ता की ओर से दी गई दलीलें

याचिकाकर्ता के विद्वान वकील ने तर्क दिया कि क्लॉज 25-ए(vii) असंवैधानिक है और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है, क्योंकि यह केवल ठेकेदारों पर प्री-डिपॉजिट जमा करने की शर्त लगाकर उनके साथ भेदभाव करता है, जबकि राज्य को इससे छूट देता है।

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यह दलील दी गई कि 10 प्रतिशत डिपॉजिट की शर्त का तुच्छ या फर्जी दावों को रोकने के उद्देश्य से कोई तार्किक संबंध नहीं है, क्योंकि ऐसे दावों से एक्ट की धारा 31(8) के तहत आर्बिट्रेशन के समापन पर लागत लगाकर प्रभावी ढंग से निपटा जा सकता है। वकील ने ध्यान दिलाया कि 1,77,00,000 रुपये के दावे पर याचिकाकर्ता को सुरक्षा जमा के रूप में 17,70,000 रुपये जमा करने होंगे, जबकि हरियाणा में उसी दावे की राशि पर सिविल सूट दायर करने के लिए देय एड वेलोरम कोर्ट फीस केवल 7,16,300 रुपये होगी।

वकील ने कहा कि एस.के. जैन फैसले पर भरोसा करना गलत था क्योंकि उस फैसले में असमान सौदेबाजी की शक्ति और अनुचितता की दलीलों को खारिज किया गया था, लेकिन यह नहीं जांचा गया था कि क्या यह क्लॉज अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है। यह तर्क दिया गया कि यह क्लॉज पूरी तरह एकतरफा है और एक्ट की धारा 18 के विपरीत है, जो आर्बिट्रेशन कार्यवाही के सभी चरणों में पक्षों के समान उपचार का जनादेश देती है।

अपनी अपील के समर्थन में, याचिकाकर्ता ने आईकॉम टेली लिमिटेड बनाम पंजाब स्टेट वॉटर सप्लाई (2019) का हवाला दिया, जहां अनुच्छेद 14 के तहत प्री-डिपॉजिट क्लॉज को रद्द कर दिया गया था, तथा लॉम्बार्डी इंजीनियरिंग लिमिटेड बनाम उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड (2024) का भी संदर्भ दिया। लॉम्बार्डी इंजीनियरिंग मामले में तीन जजों की पीठ ने टिप्पणी की थी:

“प्रतिवादी द्वारा उपयोग में लाए गए ‘पार्टी स्वायत्तता’ के सिद्धांत को इस सीमा तक नहीं बढ़ाया जा सकता जहां वह संविधान के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करे। किसी भी आर्बिट्रेशन क्लॉज के कानूनी रूप से बाध्यकारी होने के लिए उसे ‘कानून के संचालन’ के अनुरूप होना होगा, जिसमें बुनियादी ढांचा यानी संविधान शामिल है। कानून का शासन ही सर्वोपरि है और वह बुनियादी ढांचे का हिस्सा है। प्रतिवादी की ओर से दिया गया यह तर्क कि याचिकाकर्ता ने समझौते के समय प्री-डिपॉजिट क्लॉज के लिए सहमति दी थी, इसलिए वह धारा 11(6) की याचिका में कोर्ट के समक्ष यह नहीं कह सकता कि यह शर्त मनमानी है और संविधान के अनुच्छेद 14 के खिलाफ है, पूरी तरह से निराधार है।”

याचिकाकर्ता ने संविधान पीठ के फैसले सेंट्रल ऑर्गनाइजेशन फॉर रेलवे इलेक्ट्रिफिकेशन (CORE) बनाम मेसर्स ECI-SPIC-SMO-MCML (JV) (2025) का भी सहारा लिया, जिसने आईकॉम टेली लिमिटेड और लॉम्बार्डी इंजीनियरिंग लिमिटेड के फैसलों की पुष्टि की थी। वकील ने तर्क दिया कि एस.के. जैन का फैसला अनुच्छेद 14 तथा एक्ट की धारा 18 व 38 पर सब साइलेंसियो (मौन) रहा है। उन्होंने मुंसीपल कॉर्पोरेशन ऑफ दिल्ली बनाम गुरनाम कौर (1989) के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था:

“तकनीकी अर्थ में कोई निर्णय सब साइलेंसियो तब कहलाता है, जब निर्णय में शामिल कानून का विशेष बिंदु कोर्ट द्वारा नहीं देखा जाता या उसके दिमाग में उपस्थित नहीं होता। कोर्ट पक्षकार ‘ए’ के पक्ष में निर्णय जानबूझकर दे सकता है क्योंकि वह बिंदु ‘ए’ पर विचार करता है और फैसला सुनाता है। हालांकि, यह दिखाया जा सकता है कि तार्किक रूप से कोर्ट को उस पक्षकार के पक्ष में तब तक निर्णय नहीं देना चाहिए था जब तक कि वह उसके पक्ष में बिंदु ‘बी’ का भी फैसला न कर ले; लेकिन बिंदु ‘बी’ पर कोर्ट द्वारा न तो बहस की गई और न ही विचार किया गया। ऐसी परिस्थितियों में, हालांकि बिंदु ‘बी’ तार्किक रूप से तथ्यों में शामिल था और मामले का एक विशिष्ट परिणाम हुआ था, फिर भी वह निर्णय बिंदु ‘बी’ पर एक नजीर नहीं है। तब यह कहा जाता है कि बिंदु ‘बी’ सब साइलेंसियो पारित हुआ है।”

प्रतिवादी की ओर से दी गई दलीलें

प्रतिवादी के विद्वान वकील ने तर्क दिया कि एस.के. जैन फैसला एक बाध्यकारी नजीर बना हुआ है, जो प्री-डिपॉजिट शर्तों की वैधता को कायम रखता है जहां जमा राशि रिफंडेबल होती है, क्योंकि ऐसी शर्तें तुच्छ विवादों को रोकने के वैध उद्देश्य को पूरा करती हैं।

प्रतिवादी ने एस.के. जैन, आईकॉम टेली लिमिटेड, और लॉम्बार्डी इंजीनियरिंग लिमिटेड के आर्बिट्रेशन क्लॉज का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया। यह दलील दी गई कि आईकॉम टेली लिमिटेड में क्लॉज इसलिए रद्द किया गया था क्योंकि उसमें दावेदार के जीतने पर भी जमा राशि को जब्त करने का प्रावधान था। इसके विपरीत, वर्तमान क्लॉज—एस.के. जैन की तरह—केवल एक रिफंडेबल सिक्योरिटी डिपॉजिट की मांग करता है, जिसमें कोई दंडात्मक जब्ती शामिल नहीं है।

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यह तर्क दिया गया कि लॉम्बार्डी इंजीनियरिंग लिमिटेड ने पुनः पुष्टि की है कि केवल वही शर्तें अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती हैं जो आर्बिट्रेशन तक पहुंच को पूरी तरह रोकती हैं या परिणाम की परवाह किए बिना आंशिक जब्ती का अनिवार्य नियम बनाती हैं। इसलिए, रिफंडेबल डिपॉजिट क्लॉज वैध बने हुए हैं, और आर्बिट्रेटर तथा कमर्शियल कोर्ट ने एस.के. जैन के फैसले को लागू कर याचिकाकर्ता के दावे को खारिज करके सही निर्णय दिया।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने एस.के. जैन, आईकॉम टेली लिमिटेड, लॉम्बार्डी इंजीनियरिंग लिमिटेड, और CORE के फैसलों के मूल सिद्धांतों का परीक्षण किया। कोर्ट ने नोट किया कि एस.के. जैन में तीन जजों की पीठ ने माना था कि प्री-डिपॉजिट की शर्त “…फर्जी और बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों को रोकने के लिए एक संतुलित कारक है” और यह मनमानी नहीं है।

हालांकि, दो जजों की इस पीठ ने स्वीकार किया कि न्यायिक अनुशासन के कारण वह एस.के. जैन के फैसले को सब साइलेंसियो या अब सही कानून नहीं मानने की घोषणा नहीं कर सकती, भले ही वह “आईकॉम टेली लिमिटेड में दिए गए तर्कों से प्रथम दृष्टया सहमत” हो। पीठ ने ध्यान दिया कि लॉम्बार्डी इंजीनियरिंग लिमिटेड (तीन जजों की पीठ) ने स्पष्ट रूप से कहा था कि एस.के. जैन और आईकॉम टेली लिमिटेड के बीच कोई विरोध नहीं है क्योंकि दोनों मामलों के अनुबंधीय क्लॉज एक-दूसरे से भिन्न थे, और न ही लॉम्बार्डी इंजीनियरिंग लिमिटेड या CORE की संविधान पीठ ने एस.के. जैन को अमान्य ठहराया था।

सुप्रीम कोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण सिद्धांत पर ध्यान आकर्षित किया: मुकदमा करने का अधिकार प्रत्येक व्यक्ति में निहित होता है, जब तक कि कानून द्वारा उसे स्पष्ट रूप से न रोका गया हो। कोर्ट ने श्रीमती गंगा बाई बनाम विजय कुमार व अन्य (1974) का हवाला दिया। भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 28 के तहत कानूनी कार्यवाहियों को पूरी तरह रोकने वाले समझौते शून्य होते हैं, और आर्बिट्रेशन कानून में एक अपवाद के रूप में मौजूद है।

भारत में आर्बिट्रेशन की ऐतिहासिक धारणा को रेखांकित करते हुए, कोर्ट ने मेडिएशन प्रैक्टिस एंड लॉ: द पाथ टू सक्सेसफुल डिस्प्यूट रेजोल्यूशन पुस्तक की प्रस्तावना में दिवंगत वरिष्ठ अधिवक्ता फली एस. नरीमन द्वारा लिखे गए विचारों को उद्धृत किया:

“……सच्चाई यह है कि एडीआर अभी भी भारतीय सोच में गहराई से समाहित नहीं हुआ है। यह एक नए अंग प्रत्यारोपण की तरह है, जैसे नया दिल या नई किडनी: और मानव शरीर की तरह ही, ‘व्यापारिक-तंत्र’ इसे खारिज करने का अवसर ढूंढता रहता है। इसका कारण ऐतिहासिक है। पारंपरिक रूप से, इंग्लैंड में किंग्स कोर्ट के जज ही कानून के साकार रूप थे: जैसा कि उन्नीसवीं सदी के एक टिप्पणीकार ने कहा था, ‘कॉमन लॉ महामहिम के जजों के सामूहिक सीने में लिपटा हुआ है’: जिस पर एक जज ने (कुछ दंभ के साथ) जवाब दिया था, ‘और यह बहुत सुखद निवास भी है’! दो शताब्दियों के ब्रिटिश शासन के दौरान, भारत में हमें आंग्ल-सैक्सन न्यायशास्त्र के दूध पर पाला गया-और आंग्ल-सैक्सन न्यायशास्त्र महामहिम की अदालतों के बाहर विवादों के समाधान को पूरी तरह से नापसंद करता था! जिसे इंग्लैंड नापसंद करता था, हमें ब्रिटिश भारत में उसका त्याग करना सिखाया गया था। 100 से भी अधिक वर्ष पहले जब से भारतीय कानूनी प्रणाली में कॉन्ट्रैक्ट एक्ट लागू किया गया, तब से वैकल्पिक विवाद समाधान को गैरकानूनी माना गया: और आर्बिट्रेशन द्वारा विवादों के समाधान को केवल किसी तरह सहन किया जाता था!….”

पीठ ने टिप्पणी की कि कोई आर्बिट्रेशन क्लॉज प्री-डिपॉजिट की ऐसी अत्यधिक शर्तें नहीं थोप सकता जो शुरुआत में ही मुकदमा करने के अधिकार को नाममात्र या निरर्थक बना दें। दावे की राशि का एक बड़ा प्रतिशत जमा करने की शर्त अनिवार्य रूप से दावों को दबाती है, वैकल्पिक विवाद समाधान का सहारा लेने से रोकती है, और इस प्रकार इसके मूल उद्देश्य को ही परास्त करती है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

दो जजों की पीठ में बैठते हुए और तीन जजों की पीठ के एस.के. जैन फैसले की वैधानिकता एवं वैधता पर संदेह करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने संदर्भ के आदेशों को नियंत्रित करने वाले उन कानूनी सिद्धांतों को लागू किया, जिन्हें अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनाम नरेश अग्रवाल व अन्य (2025) और सेंट्रल बोर्ड ऑफ दाऊदी बोहरा कम्युनिटी व अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य (2005) में दोहराया गया था।

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रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया कि वह इस सिविल अपील को भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करे ताकि निम्नलिखित प्रश्नों को बड़ी पीठ के पास भेजने के संबंध में उचित निर्देश प्राप्त किए जा सकें:

क. क्या केवल ठेकेदार से ही आर्बिट्रेशन के संदर्भ से पहले सुरक्षा/फीस का प्री-डिपॉजिट कराने की शर्त एक्ट की धारा 18 के विपरीत है, जो आर्बिट्रेशन के सभी चरणों में पक्षों के समान उपचार का जनादेश देती है?

ख. क्या आर्बिट्रेशन क्लॉज वाले कॉन्ट्रैक्ट्स में प्री-डिपॉजिट की शर्तें वैकल्पिक विवाद समाधान को हतोत्साहित करती हैं और अदालतों का बोझ कम करने के इसके उद्देश्य को कमजोर करती हैं?

ग. क्या आर्बिट्रेशन के संदर्भ से पहले सुरक्षा/फीस जमा करने की शर्त मनमानी है और मुकदमा करने के अधिकार के साथ-साथ संविधान के अनुच्छेद 14 और भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 28 का उल्लंघन करती है?

घ. क्या सुरक्षा/फीस के प्री-डिपॉजिट की आवश्यकता का तुच्छ दावों को रोकने के उद्देश्य से कोई तार्किक संबंध है, जबकि उस चरण में यह नहीं कहा जा सकता कि दावे तुच्छ हैं, और इसके अलावा ऐसे तुच्छ दावों से आर्बिट्रेशन कार्यवाही के समापन पर एक्ट की धारा 31(8) के तहत लागत लगाकर पर्याप्त रूप से निपटा जा सकता है?

ङ. क्या किसी आर्बिट्रेशन मामले में प्री-डिपॉजिट की शर्त तब वैध है जब उक्त जमा राशि आर्बिट्रेशन कार्यवाही के समापन पर वापस करने योग्य हो?

च. क्या एस.के. जैन (उपरोक्त) एक वैध और बाध्यकारी नजीर है?

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: मेसर्स संतोष एसोसिएट प्राइवेट लिमिटेड बनाम हरियाणा स्टेट इंडस्ट्रियल एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड

वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2026, एसएलपी सी संख्या 31245/2025

पीठ: जस्टिस मनमोहन, जस्टिस मनोज मिश्रा

निर्णय की तिथि: 17 अगस्त 2026

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