जंतर-मंतर पर पिछले महीने हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान फेशियल रिकॉग्निशन तकनीक (FRS) के इस्तेमाल को लेकर उठे विवाद पर दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में जवाब दाखिल किया है। पुलिस ने सोमवार देर रात दिए एक हलफनामे में स्पष्ट किया कि इस तकनीक का मकसद शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की निगरानी करना नहीं था, बल्कि इसका इस्तेमाल केवल उन लोगों की पहचान के लिए किया गया जिनका पुराना गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड दर्ज है।
पुलिस कमिश्नर द्वारा गठित विशेष जांच टीम (SIT) अपनी जांच केवल उन 2,873 लोगों तक सीमित रखेगी, जिनकी पहचान गंभीर अपराधों के रिकॉर्ड से हुई है। पुलिस ने कोर्ट को आश्वासन दिया है कि बिना किसी आपराधिक इतिहास वाले आम प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोई जांच या कार्रवाई नहीं की जाएगी। यह हलफनामा सुप्रीम कोर्ट में दायर उन याचिकाओं के जवाब में पेश किया गया है, जिनमें प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग और अवैध निगरानी के आरोप लगाए गए थे।
तकनीक के इस्तेमाल और भौतिक सत्यापन की प्रक्रिया
पुलिस के अनुसार, मोबाइल फेशियल रिकॉग्निशन यूनिट्स ने भीड़ को स्कैन करके स्थापित डेटाबेस से चेहरों का मिलान किया। इसमें यातायात नियमों के उल्लंघन जैसे छोटे मामलों के बजाय केवल गंभीर मामलों के आरोपियों का डेटा ही शामिल था। हलफनामे में बताया गया कि ऑटोमेटेड फेशियल रिकॉग्निशन सिस्टम केवल प्राथमिक पहचान का जरिया है।
जब सिस्टम किसी संदिग्ध चेहरे का मिलान करता है, तब पुलिस अधिकारी मौके पर ही व्यक्ति का भौतिक सत्यापन (फील्ड वेरिफिकेशन) करते हैं। इसके बाद ही कोई कानूनी कदम उठाया जाता है। जिन अपराधों से जुड़े लोगों की पहचान हुई है, उनमें हत्या, हत्या का प्रयास, डकैती, लूट, दुष्कर्म, पॉक्सो एक्ट, महिलाओं के खिलाफ अपराध, अपहरण, झपटमारी, तथा आर्म्स व एनडीपीएस एक्ट के तहत दर्ज मामले शामिल हैं।
आपराधिक आंकड़ों और हिस्ट्रीशीट का ब्योरा
जंतर-मंतर पर तैनात मोबाइल FRS यूनिट्स के जरिए कुल 2,873 लोगों की पहचान हुई। इनमें से 2,402 लोगों का डेटा ‘क्राइम कुंडली’ डेटाबेस से और 471 लोगों का रिकॉर्ड पुलिस डोजियर से मैच हुआ। हलफनामे के मुताबिक, पहचाने गए लोगों में से 92 लोग ऐसे हैं जिनके खिलाफ 10 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें 47 सूचीबद्ध हिस्ट्रीशीटर शामिल हैं।
पुलिस ने अदालत को सूचित किया कि 20 जुलाई से 26 जुलाई के बीच जंतर-मंतर और आसपास के इलाकों में वाहन चोरी के 7 मामले, सामान्य चोरी के 67 मामले और 123 सामान गुमशुदगी की शिकायतें दर्ज की गईं। पुलिस का कहना है कि ये आंकड़े साबित करते हैं कि छात्रों के प्रदर्शन में आपराधिक तत्वों की घुसपैठ हुई थी।
डेटा एकत्र करने के आरोपों का खंडन
दिल्ली पुलिस ने उन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिनमें आधार विवरण के आधार पर समन भेजने, आम लोगों के बायोमेट्रिक एकत्र करने या डेटा निजी कंपनियों को बेचने की बात कही गई थी। पुलिस ने इसे दुर्भावनापूर्ण उद्देश्यों से फैलाया गया भ्रामक प्रचार करार दिया।
हलफनामे में जोर देकर कहा गया कि गंभीर अपराधियों का बायोमेट्रिक डेटा राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के पास वैधानिक नियमों के तहत सुरक्षित रहता है। इसके अतिरिक्त, पुलिस ने बताया कि जंतर-मंतर की पूरी घटना को सीसीटीवी फुटेज, बॉडी-वॉर्न कैमरा रिकॉर्डिंग, वायरलेस संदेशों, दैनिक डायरी प्रविष्टियों और आधिकारिक वीडियोग्राफी के जरिए व्यापक रूप से दर्ज किया गया है। सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और पुलिस पर हमले से जुड़े वीडियो साक्ष्य भी जांच के लिए सुरक्षित रखे गए हैं।

