पश्चिम बंगाल के एक उपभोक्ता आयोग ने फर्जी दस्तावेजों के सहारे सेकेंड हैंड एसयूवी बेचने के मामले में कार डीलर और गाड़ी के पूर्व मालिक पर कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने दोनों पक्षों को निर्देश दिया है कि वे पीड़ित खरीदार को गाड़ी की पूरी कीमत 2.45 लाख रुपये 9 फीसदी वार्षिक साधारण ब्याज के साथ वापस करें। इसके साथ ही, उपभोक्ता को हुए अन्य खर्चों, मानसिक प्रताड़ना और कानूनी लागत के रूप में 1.8 लाख रुपये का अतिरिक्त भुगतान करने का भी आदेश दिया गया है।
यह फैसला आयोग के अध्यक्ष दूरी वेंकट श्रीनिवास तथा सदस्य मौमिता चक्रवर्ती और रानेश रंजीत मोंडल की पीठ ने सुनाया। पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि डीलर और वाहन मालिक ने गाड़ी की कानूनी स्थिति और कागजातों से जुड़ी बेहद अहम जानकारियां छिपाईं, जिसके कारण पुलिस को वाहन जब्त करना पड़ा।
मुआवजे और खर्च की पूरी राशि चुकाने का निर्देश
आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि 2.45 लाख रुपये की मूल राशि भुगतान की तारीख से लेकर वसूली की तारीख तक 9 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ लौटानी होगी। इसके अलावा, खरीदार द्वारा वाहन के बीमा, प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र, सर्विसिंग और सजावट पर खर्च किए गए 70,000 रुपये की भरपाई करने का भी निर्देश दिया गया है।
मानसिक प्रताड़ना और उत्पीड़न के ऐवज में पीड़ित को 1 लाख रुपये का मुआवजा देने तथा कानूनी लड़ाई के खर्च के तौर पर 10,000 रुपये का भुगतान करने का आदेश भी जारी किया गया है। इसके साथ ही कंज्यूमर फोरम ने विपक्षियों को ऐसी अनुचित व्यापारिक गतिविधियों पर तुरंत रोक लगाने की हिदायत दी है।
पुलिस जब्ती के बाद सामने आई धोखाधड़ी
पूरा मामला तब शुरू हुआ जब पीड़ित खरीदार ने ऑनलाइन विज्ञापन देखकर एक सेकेंड हैंड एसयूवी पसंद की। उसने ऑटो ट्रेडर को 2.45 लाख रुपये का भुगतान किया और गाड़ी के साथ स्वामित्व हस्तांतरण के लिए जरूरी दस्तावेज प्राप्त कर लिए।
खरीदारी के बाद उपभोक्ता ने गाड़ी के रखरखाव, बीमा, प्रदूषण प्रमाणपत्र और सर्विसिंग पर लगभग 70,000 रुपये और खर्च किए। हालांकि, 18 जुलाई 2021 को पुलिस के दो अधिकारी खरीदार के घर पहुंचे और यह कहते हुए गाड़ी जब्त कर ली कि खरीद के दौरान दिए गए स्वामित्व के कागजात पूरी तरह फर्जी थे। जब खरीदार ने इस संबंध में विक्रेता से संपर्क करने की कोशिश की, तो उन्होंने बातचीत बंद कर दी और कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद पीड़ित ने धोखाधड़ी और सेवा में कमी का आरोप लगाते हुए कंज्यूमर कमीशन का दरवाजा खटखटाया।
एकतरफा कार्रवाई में आयोग की सख्त टिप्पणी
आयोग द्वारा औपचारिक नोटिस भेजे जाने के बावजूद न तो कार डीलर और न ही वाहन का पूर्व मालिक पक्ष रखने के लिए उपस्थित हुए। इस कारण पीठ को मामले की एकतरफा सुनवाई करनी पड़ी। आयोग ने माना कि चूंकि विपक्षी पक्ष उपस्थित नहीं हुए और दावों का खंडन नहीं किया, इसलिए शिकायतकर्ता के आरोपों को बिना किसी विरोध के स्वीकार माना जाता है।
पीठ ने अपने निष्कर्ष में कहा कि खरीदार एक निर्दोष और प्रामाणिक ग्राहक (बोनाफाइड बायर) था, जिसे खरीदारी के समय धोखाधड़ी की कोई जानकारी नहीं थी। आयोग ने रेखांकित किया कि झूठे या फर्जी दस्तावेजों के आधार पर वाहन बेचना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत अनुचित व्यापार व्यवहार और सेवा में गंभीर कमी के दायरे में आता है।

