SNDP योगम बोर्ड के सामूहिक निष्कासन के खिलाफ अपील; वेल्लापल्ली नटेशन और पुत्र ने केरल हाईकोर्ट के आदेश को दी चुनौती

केरल की प्रमुख सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था एसएनडीपी योगम के शीर्ष पदाधिकारियों ने हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें संगठन के पूरे बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स को अयोग्य घोषित कर दिया गया था। पूर्व महासचिव वेल्लापल्ली नटेशन और उनके पुत्र थुशार वेल्लापल्ली ने सोमवार को इस फैसले के खिलाफ अपील दायर की।

यह विवाद 12 मार्च को न्यायमूर्ति टी.आर. रवि द्वारा पारित उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें संगठन के कामकाज में कथित अनियमितताओं को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह कार्रवाई की गई थी। इन याचिकाओं में एक याचिका दिवंगत प्रोफेसर एम.के. सानू की ओर से भी दाखिल की गई थी। एसएनडीपी योगम केरल में इझावा समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली एक प्रभावशाली संस्था है।

हाईकोर्ट के एकल पीठ ने न केवल वेल्लापल्ली नटेशन और थुशार वेल्लापल्ली, बल्कि एम.एन. सोमन और संतोश (उर्फ अरायाक्कांडिल संतोश) को भी निदेशक मंडल से अयोग्य ठहराया था। अदालत ने यह माना था कि निदेशक कंपनियों अधिनियम के प्रावधानों का पालन करने में विफल रहे हैं, जिसके चलते वे धारा 167(1)(a) के तहत अपने पद से स्वतः पदच्युत हो गए।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने 2021 के चुनाव के बाद हुई हिंसा के मामले में पश्चिम बंगाल की न्यायपालिका के खिलाफ आरोपों के लिए सीबीआई की आलोचना की

साथ ही, राज्य सरकार को धारा 167(3) के तहत नए निदेशकों की नियुक्ति कर संगठन के प्रबंधन की जिम्मेदारी संभालने का निर्देश दिया गया था।

अपील में याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि एकल पीठ का फैसला अधिकार क्षेत्र से परे है और इसमें कानून की गलत व्याख्या की गई है। उनके अनुसार, अदालत ने तथ्यों को सही ढंग से नहीं समझा और बाध्यकारी नज़ीरों का पालन भी नहीं किया।

अपील में कहा गया है कि निदेशकों की अयोग्यता और डायरेक्टर आइडेंटिफिकेशन नंबर (DIN) से जुड़े प्रावधानों की व्याख्या भी त्रुटिपूर्ण है, जिसके कारण पूरा निर्णय अवैध हो जाता है।

मामले का एक अहम पहलू यह है कि अदालत ने यह मान लिया था कि योगम ने लगातार तीन वित्तीय वर्षों तक वार्षिक रिटर्न दाखिल नहीं किए, जिसके आधार पर कंपनियों अधिनियम की धारा 164(2) लागू की गई।

हालांकि, अपीलकर्ताओं का कहना है कि यह निष्कर्ष गलत है। उनका दावा है कि संगठन की गतिविधियां केवल केरल तक सीमित नहीं हैं, इसलिए शुरू में रिटर्न रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज के पास दाखिल किए जाते थे।

बाद में, 23 अगस्त 2005 को केंद्र सरकार के एक आदेश के बाद, योगम को केरल नॉन-ट्रेडिंग कंपनियां अधिनियम के तहत लाया गया, जिसके बाद रिटर्न रजिस्ट्रार जनरल के पास जमा किए जाने लगे।

READ ALSO  भाजपा सांसद सिंह ने पहलवानों के यौन उत्पीड़न मामले की सुनवाई के लिए दिल्ली की अदालत के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाए।

अपील में यह भी कहा गया है कि वर्ष 2006-07 से संगठन नियमित रूप से दोनों प्राधिकरणों—रजिस्ट्रार जनरल और रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज—के समक्ष अपने वार्षिक रिटर्न और वित्तीय विवरण जमा करता रहा है।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि संगठन के रिकॉर्ड लंबे समय तक हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार (न्यायिक) की निगरानी में सीलबंद रखे गए थे, क्योंकि उनसे जुड़ा एक पुराना विवाद लंबित था। ये रिकॉर्ड वर्ष 2019 में ही जारी किए गए।

इस वजह से पहले दाखिल किए गए रिटर्न की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी, और इसी आधार पर गैर-फाइलिंग का निष्कर्ष निकालना सही नहीं है।

अपील में यह भी कहा गया है कि निदेशकों ने वैध DIN प्रस्तुत किए थे, जो कंपनियों अधिनियम के तहत केंद्र सरकार द्वारा जारी किए गए थे।

READ ALSO  हाईकोर्ट जज ने खुली अदालत में किया खुलासा, कहा उनका तबादला करने की धमकी दी गई थी- जानिए पूरा मामला

दिलचस्प बात यह है कि एकल पीठ ने खुद यह दर्ज किया था कि राज्य सरकार ने DIN जारी करने के लिए नियम नहीं बनाए हैं, फिर भी उसी आधार पर निदेशकों को अयोग्य ठहरा दिया गया।

अपीलकर्ताओं ने यह भी दलील दी है कि निदेशकों की अयोग्यता जैसे मुद्दे राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, न कि हाईकोर्ट की रिट क्षेत्राधिकार में।

उनका कहना है कि नए निदेशकों की नियुक्ति के निर्देश ने संगठन के प्रशासनिक ढांचे को पूरी तरह बदल दिया है, जो इस प्रकार की कार्यवाही में नहीं किया जा सकता था।

मामले की सुनवाई अब केरल हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष होने की संभावना है, जहां इस आदेश की वैधता पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles