आर्बिट्रेशन में हारने वाला पक्ष भी धारा 9 के तहत अंतरिम राहत पाने का हकदार: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आर्बिट्रेशन (मध्यस्थता) समझौते का कोई भी पक्ष, चाहे वह आर्बिट्रल कार्यवाही में हार ही क्यों न गया हो, आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 9 के तहत अवार्ड के बाद के चरण (post-award stage) में अंतरिम राहत के लिए याचिका दायर कर सकता है। जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने विभिन्न हाईकोर्टों के बीच चल रहे कानूनी मतभेद को समाप्त करते हुए यह निर्णय लिया कि ‘पक्ष’ (party) शब्द का अर्थ आर्बिट्रेशन के परिणाम के आधार पर बदला नहीं जा सकता।

पृष्ठभूमि और कानूनी प्रश्न

यह मामला देश के विभिन्न हाईकोर्टों द्वारा दिए गए परस्पर विरोधी फैसलों के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुँचा था। अदालत के सामने मुख्य कानूनी सवाल यह था: “क्या आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट की धारा 9 के तहत अवार्ड के बाद के चरण में उस पक्ष द्वारा दायर याचिका कानूनी रूप से विचारणीय है, जो आर्बिट्रल कार्यवाही में हार गया है और जिसके पक्ष में कोई लागू करने योग्य अवार्ड नहीं है?”

बॉम्बे, दिल्ली, मद्रास और कर्नाटक हाईकोर्टों ने पहले फैसला दिया था कि असफल पक्ष ऐसी याचिका दायर नहीं कर सकता। इसके विपरीत, तेलंगाना, गुजरात और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्टों का मानना था कि ऐसी याचिकाएं विचारणीय हैं।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल श्री के.एम. नेत्राज और वरिष्ठ अधिवक्ता श्री अभिमन्यु भंडारी ने तर्क दिया कि यदि धारा 34 के तहत अवार्ड रद्द कर दिया जाता है, तो पार्टियों के बीच का मूल अनुबंध और अधिकार पुनर्जीवित हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि यदि असफल पक्ष को धारा 9 की राहत से रोका गया, तो वे “पूरी तरह से उपचारहीन” (remediless) हो जाएंगे। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि:

  • अधिनियम की धारा 43(4) पार्टियों को फिर से आर्बिट्रेशन शुरू करने का अधिकार देती है।
  • 2019 के संशोधन ने स्पष्ट किया है कि अवार्ड के बाद आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल के पास अंतरिम उपाय करने का अधिकार नहीं रहता।
  • गायात्री बालसामी बनाम आईएसजी नोवासॉफ्ट टेक्नोलॉजीज लिमिटेड के फैसले के बाद अब अवार्ड में संशोधन संभव है, जिससे यह धारणा गलत साबित होती है कि अदालत केवल अवार्ड को बरकरार रख सकती है या रद्द कर सकती है।
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प्रतिवादियों की ओर से: वरिष्ट अधिवक्ता डॉ. मेनका गुरुस्वामी ने दलील दी कि एक बार अवार्ड आने के बाद दावों का अंतिम रूप से फैसला हो जाता है। अवार्ड के बाद के चरण में धारा 9 का उद्देश्य केवल “अवार्ड के फलों” (fruits of the award) को सुरक्षित करना है। उनकी दलीलों में शामिल था:

  • असफल पक्ष के पास सुरक्षित करने के लिए “कोई फल नहीं” होता।
  • हारने वाले पक्ष के पास एकमात्र विकल्प धारा 34 के तहत अवार्ड को चुनौती देना और धारा 36(2) के तहत रोक (stay) मांगना है।
  • असफल पक्षों को धारा 9 की राहत देने से अधिनियम का अनुशासन भंग होगा और मुकदमों की संख्या बढ़ेगी।
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अदालत का विश्लेषण

‘ए पार्टी’ (एक पक्ष) की शाब्दिक व्याख्या सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि धारा 9 में ‘ए पार्टी’ शब्द का प्रयोग किया गया है, जिसे धारा 2(h) में केवल ‘आर्बिट्रेशन समझौते के एक पक्ष’ के रूप में परिभाषित किया गया है। अदालत ने कहा:

“धारा 2(h) या धारा 9, आर्बिट्रेशन कार्यवाही के सफल और असफल पक्ष के बीच कोई अंतर नहीं करती है।”

अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि अवार्ड के बाद ‘पक्ष’ शब्द का अर्थ बदल जाना चाहिए। पीठ के अनुसार ऐसा करना “कानून में न्यायिक संशोधन” करने जैसा होगा।

UNCITRAL मॉडल कानून से भिन्नता अदालत ने रेखांकित किया कि भारतीय अधिनियम UNCITRAL मॉडल कानून पर आधारित है, लेकिन भारतीय संसद ने जानबूझकर मॉडल कानून के अनुच्छेद 9 से हटकर इसमें “अवार्ड के बाद” (post-award) का चरण जोड़ा है। अदालत ने टिप्पणी की:

“यह बदलाव… दर्शाता है कि विधायिका ने जानबूझकर धारा 9 के दायरे का विस्तार किया है। महत्वपूर्ण रूप से, ऐसा करते समय राहत मांगने के हकदार पक्षों की श्रेणी पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया।”

धारा 9, 34 और 36 के अलग-अलग कार्यक्षेत्र अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 34 और 36 अवार्ड के विरुद्ध उपचार प्रदान करती हैं, जबकि धारा 9 विवाद की विषय-वस्तु (subject matter) की सुरक्षा सुनिश्चित करती है। धारा 9 के तहत राहत न देना किसी पक्ष को तब भी उपचारहीन छोड़ देगा जब अवार्ड पर रोक लगी हो और उसके रद्द होने की संभावना हो।

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गायात्री बालसामी केस का प्रभाव सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुराने प्रतिबंधात्मक फैसलों का आधार यह था कि अदालतें अवार्ड को संशोधित नहीं कर सकतीं। लेकिन गायात्री बालसामी (सुप्रा) के फैसले ने यह तय कर दिया है कि विशिष्ट परिस्थितियों में अवार्ड को संशोधित किया जा सकता है।

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि बॉम्बे, दिल्ली, मद्रास और कर्नाटक हाईकोर्टों के प्रतिबंधात्मक विचार “सही कानून नहीं हैं।” अदालत ने तेलंगाना, गुजरात और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्टों के रुख की पुष्टि की।

पीठ ने निष्कर्ष निकाला:

“नतीजतन, यह अदालत यह मानती है कि आर्बिट्रेशन समझौते का कोई भी पक्ष, जिसमें आर्बिट्रेशन में असफल रहा पक्ष भी शामिल है, अवार्ड के बाद के चरण में अधिनियम की धारा 9 का उपयोग कर सकता है।”

हालाँकि, अदालत ने चेतावनी देते हुए कहा कि जहाँ यह अधिकार मौजूद है, वहीं असफल पक्ष को राहत देने की सीमा (threshold) अधिक कठिन होगी। अदालतों को असफल पक्ष द्वारा दायर धारा 9 की अर्जी पर विचार करते समय “सावधानी और सतर्कता” बरतने की सलाह दी गई है।

मामले का विवरण:

केस का शीर्षक: होम केयर रिटेल मार्ट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम हरेश एन. सांघवी

केस संख्या: सिविल अपील (SLP (C) संख्या 29972/2015 से उत्पन्न)

पीठ: जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन

तारीख: 24 अप्रैल, 2026

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