सुप्रीम कोर्ट ने 31 वर्षीय वानस्पतिक अवस्था में पड़े युवक के लिए ‘पैसिव यूथेनेशिया’ पर मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट मांगी

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को नोएडा जिला अस्पताल को निर्देश दिया कि वह एक प्राथमिक मेडिकल बोर्ड गठित करे, जो यह जांचे कि 31 वर्षीय हरीश राणा के मामले में जीवन रक्षक उपचार वापस लिया जा सकता है या नहीं। युवक पिछले 12 साल से वानस्पतिक अवस्था में है और 100 प्रतिशत विकलांगता के साथ क्वाड्रिप्लेजिया से पीड़ित है। अदालत ने कहा कि उसका स्वास्थ्य “खराब से बदतर” हो गया है और नए चिकित्सा आकलन की आवश्यकता है।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने सेक्टर-39, नोएडा के जिला अस्पताल को दो सप्ताह के भीतर रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। यह आवेदन हरीश राणा के पिता ने दायर किया है, जिसमें पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति मांगी गई है।

पीठ ने कहा, “हम चाहते हैं कि प्राथमिक बोर्ड हमें यह रिपोर्ट दे कि जीवन रक्षक उपचार वापस लिया जा सकता है या नहीं। रिपोर्ट जल्द से जल्द हमारे सामने रखी जाए, उसके बाद हम आगे के आदेश पारित करेंगे।” रिपोर्ट देखने के बाद जस्टिस पारदीवाला ने टिप्पणी की, “जरा इस लड़के की हालत देखिए… बहुत दयनीय है।”

पैसिव यूथेनेशिया वह स्थिति है जहां मरीज को जीवित रखने वाले उपचार या लाइफ सपोर्ट को रोक दिया जाता है। याचिकाकर्ता की मांग सिर्फ पैसिव यूथेनेशिया की है, एक्टिव यूथेनेशिया की नहीं, जो भारत में कानूनी रूप से प्रतिबंधित है।

पिता की ओर से पेश हुईं अधिवक्ता रश्मि नंदकुमार ने कहा कि सरकार द्वारा सुझाए सभी उपाय आज़माए जा चुके हैं लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। उन्होंने कहा:

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“आज हालत यह है कि वह बार-बार बीमार पड़ रहा है और उसे अस्पताल ले जाना पड़ रहा है। मेरी प्रार्थना यह है कि कॉमन कॉज फैसले (2018) के अनुसार मामला प्राथमिक बोर्ड को भेजा जाए। यदि डॉक्टर यह मानें कि इलाज रोका जा सकता है, तो अगला कदम सेकेंडरी बोर्ड का गठन होगा।”

यह दूसरी बार है जब परिवार इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। पिछले वर्ष 8 नवंबर को शीर्ष अदालत ने केंद्र के स्वास्थ्य मंत्रालय की उस रिपोर्ट पर गौर किया था जिसमें रोगी को घर पर देखभाल देने और राज्य सरकार से सहायता प्रदान करने की बात कही गई थी। अदालत ने यह भी कहा था कि यदि घर पर देखभाल संभव नहीं है, तो उसे नोएडा जिला अस्पताल में स्थानांतरित किया जा सकता है।

हरीश राणा पंजाब विश्वविद्यालय का छात्र था और 2013 में पीजी आवास की चौथी मंजिल से गिरने के बाद गंभीर सिर की चोटों का शिकार हुआ। तब से वह पूरी तरह बिस्तर पर है और खाने के लिए फीडिंग ट्यूब पर निर्भर है।

पिछले साल, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस निष्कर्ष से सहमति जताई थी कि राणा वेंटिलेटर या किसी अन्य यांत्रिक जीवन रक्षक प्रणाली पर नहीं था और बाहरी मशीनरी के बिना जीवित था। इसी आधार पर अदालतों ने कहा था कि पैसिव यूथेनेशिया की कानूनी शर्तें पूरी नहीं होतीं।

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दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि अदालत सहानुभूति रखती है, लेकिन “याचिकाकर्ता किसी लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर नहीं है और बिना किसी बाहरी सहायता के जीवित है।” अदालत ने यह भी दोहराया था कि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में कानूनी रूप से अमान्य है और “कोई भी, यहां तक कि चिकित्सक भी, किसी व्यक्ति के दर्द से मुक्ति दिलाने के नाम पर उसकी मृत्यु का कारण नहीं बन सकता।”

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश की प्रति नोएडा जिला अस्पताल और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी के कार्यालय को भेजने का निर्देश दिया। प्राथमिक बोर्ड की रिपोर्ट आने के बाद अदालत कॉमन कॉज (2018) के दिशा-निर्देशों के अनुसार आगे की कार्रवाई तय करेगी।

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अदालत पहले भी यह स्वीकार कर चुकी है कि यह मामला “बहुत कठिन” है। राणा के वृद्ध माता-पिता ने अपने घर तक बेच दिए हैं और पिछले 12 वर्षों से उसकी देखभाल कर रहे हैं। अब मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट ही यह निर्धारित करेगी कि पैसिव यूथेनेशिया की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है या नहीं।

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