‘मिया’ मुस्लिम टिप्पणी मामला: असम के CM हिमंत बिस्वा सरमा की बढ़ीं मुश्किलें, दिल्ली कोर्ट ने जारी किया नोटिस

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के कथित भड़काऊ भाषण के मामले में दिल्ली की एक सत्र अदालत (Sessions Court) ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कद्दावर नेता हिमंत बिस्वा सरमा और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। यह नोटिस सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर की उस पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) पर जारी किया गया है, जिसमें मुख्यमंत्री के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने की मांग की गई है।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सोनू अग्निहोत्री ने 26 मई 2026 को इस मामले पर आदेश जारी किया। कोर्ट ने सभी पक्षों को अपना पक्ष रखने का निर्देश देते हुए इस मामले की अगली सुनवाई 15 जुलाई 2026 को तय की है।

‘जीरो एफआईआर’ (Zero FIR) की दलील से पलटा मामला

इस पूरे मामले में याचिकाकर्ता के वकील ने गृह मंत्रालय (MHA) के उन दिशा-निर्देशों को कोर्ट के सामने रखा, जिसने इस कानूनी लड़ाई की दिशा बदल दी।

सुनवाई के दौरान हर्ष मंदर के वकील ने कोर्ट का ध्यान गृह मंत्रालय द्वारा ‘जीरो एफआईआर’ (Zero FIR) और ‘ई-एफआईआर’ (E-FIR) के लिए जारी की गई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) की ओर खींचा। शून्य प्राथमिकी (Zero FIR) के तहत कोई भी पुलिस स्टेशन शिकायत दर्ज कर सकता है, भले ही वह घटना उसके अधिकार क्षेत्र में न हुई हो। इसके बाद केस को संबंधित थाने में ट्रांसफर कर दिया जाता है।

वकील की इसी दलील को स्वीकार करते हुए जज सोनू अग्निहोत्री ने आदेश में कहा, “याचिकाकर्ता के वकील की दलीलों को ध्यान में रखते हुए, प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया जाता है। मामले की अगली सुनवाई 15 जुलाई 2026 को होगी।”

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क्या था असम का वह विवादित बयान?

यह पूरा विवाद इस साल की शुरुआत में असम के तिनसुकिया जिले के डिगबोई में आयोजित एक कार्यक्रम से जुड़ा है। आरोप है कि 27 जनवरी 2026 को मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने असम के बंगाली मूल के मुस्लिम समुदाय (जिन्हें स्थानीय तौर पर ‘मिया’ कहा जाता है) को लेकर एक अत्यंत संवेदनशील और सांप्रदायिक रूप से आवेशित बयान दिया था।

हर्ष मंदर की याचिका के अनुसार, मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि राज्य में चल रहे विशेष गहन संशोधन (SIR) प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से “चार से पांच लाख मिया मतदाताओं” के नाम हटा दिए जाएंगे। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि सरमा ने भीड़ को उकसाते हुए कहा, “जब वे दिक्कतों का सामना करेंगे, तभी असम छोड़ेंगे” और “हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि वे असम में वोट न दे सकें।”

निचली अदालत ने क्यों खारिज किया था मामला?

इससे पहले, दिल्ली की साकेत कोर्ट (ट्रायल कोर्ट) ने 20 अप्रैल 2026 को हर्ष मंदर की इस याचिका को खारिज कर दिया था।

मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(3) के तहत याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह मामला दिल्ली कोर्ट के अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) में नहीं आता है। अदालत का मानना था कि असम में दिए गए बयान से दिल्ली की सीमा के भीतर किसी भी प्रकार की दुश्मनी, वैमनस्य या धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचने का कोई सबूत नहीं मिला है।

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तत्कालीन अदालत ने माना था कि दिल्ली के अधिकार क्षेत्र में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की निम्नलिखित धाराओं के तहत कोई अपराध नहीं बनता:

  • धारा 196 (नफरती भाषण/दुश्मनी बढ़ाना)
  • धारा 197 (राष्ट्रीय अखंडता को खतरा पहुंचाने वाले बयान)
  • धारा 299 (धार्मिक भावनाओं को आहत करने का जानबूझकर किया गया प्रयास)
  • धारा 302 (धार्मिक आस्था का अपमान करने वाले शब्द या इशारे)
  • धारा 353 (सार्वजनिक अशांति फैलाने वाले झूठे बयान प्रसारित करना)
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अब, सत्र अदालत में गृह मंत्रालय की ‘जीरो एफआईआर’ नीति को ढाल बनाकर याचिकाकर्ता ने निचली अदालत के उसी अधिकार क्षेत्र वाले फैसले को चुनौती दी है। इस मामले ने अब देश में अंतर-राज्यीय नफरती भाषणों (Cross-border Hate Speech) से निपटने के कानूनी तरीकों पर एक नई बहस छेड़ दी है।

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