नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे पर आशियाने का सपना देख रहे हजारों मध्यमवर्गीय परिवारों के साथ हुई भारी धोखाधड़ी के मामले में देश की सर्वोच्च अदालत ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे हाउसिंग प्रोजेक्ट्स में घर खरीदारों (Homebuyers) से जुटाए गए हजारों करोड़ रुपये की कथित हेराफेरी (Siphoning) को लेकर केंद्र सरकार, वित्तीय नियामकों और कई बड़े बिल्डर्स को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
अदालत उस याचिका पर सुनवाई कर रही है जिसमें आरोप लगाया गया है कि बिल्डर्स ने व्यवस्थित तरीके से जनता की गाढ़ी कमाई को दूसरी कंपनियों में डायवर्ट कर दिया और हजारों परिवारों को सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पांचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने इस गंभीर मामले पर संज्ञान लेते हुए बुधवार को सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया। कोर्ट ने सभी जवाबदेह संस्थाओं को 15 जुलाई तक अपना पक्ष रखने का आदेश दिया है।
सर्वोच्च अदालत ने जिन प्रमुख विभागों और संस्थाओं को नोटिस भेजा है, उनमें केंद्रीय आवास एवं शहरी मामले मंत्रालय, कॉर्पोरेट मामले मंत्रालय, प्रवर्तन निदेशालय (ED), भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), उत्तर प्रदेश रेरा (UP RERA), नोएडा अथॉरिटी और यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (YEIDA) शामिल हैं। इसके अलावा जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड (JAL), जयप्रकाश इंफ्राटेक लिमिटेड (JIL), स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक सहित CRC होम्स, CRC ग्रीन्स, गौरसंस, गुलशन होम्ज़, महागुन और इन्वेस्टर्स क्लिनिक जैसे डेवलपर्स को भी कोर्ट में जवाब दाखिल करना होगा।
‘पहले पैसा जुटाया, फिर खुद को दिवालिया घोषित किया’ – धोखाधड़ी का तय पैटर्न
यह कानूनी कार्रवाई याचिकाकर्ता वंदना सभरवाल की ओर से दायर याचिका पर शुरू हुई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह कोई अकेली या सामान्य घटना नहीं है, बल्कि भारतीय रियल एस्टेट क्षेत्र में यह धोखाधड़ी का एक सोचा-समझा और व्यवस्थित पैटर्न बन चुका है।
याचिका के अनुसार, बिल्डर पहले खरीदारों से भारी-भरकम रकम वसूलते हैं। इसके बाद उस पैसे को अपनी ही सहयोगी या मुखौटा कंपनियों (Sister Concerns) में ट्रांसफर कर देते हैं। जब प्रोजेक्ट को पूरा करने की बारी आती है, तो चालाकी से खुद को दिवालिया घोषित (Insolvency) करने की प्रक्रिया में धकेल देते हैं। इस खेल में प्रमोटर्स तो सुरक्षित बच निकलते हैं, लेकिन खरीदार न तो घर पा पाते हैं और न ही अपना पैसा।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए देश के जाने-माने वकील प्रशांत भूषण ने कोर्ट के सामने ED की मनी लॉन्ड्रिंग जांच (PMLA) के बेहद चौंकाने वाले आंकड़े रखे।
भूषण ने पीठ को बताया कि JAL और JIL ने करीब 25,000 से अधिक बेकसूर खरीदारों से ₹14,559 करोड़ की भारी-भरकम राशि जुटाई थी। लेकिन इस पैसे का इस्तेमाल निर्माण कार्य में करने के बजाय, इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा जेपी ग्रुप (Jaypee Group) की ही अन्य सहयोगी कंपनियों में अवैध रूप से ट्रांसफर कर दिया गया।
प्रशांत भूषण ने अदालत के सामने तीखे तर्क रखते हुए कहा, “यह कहानी एक के बाद दूसरे प्रोजेक्ट में दोहराई जा रही है। खरीदारों का पैसा कहीं और लगा दिया जाता है और कंपनियां खुद को बैंकप्ट घोषित कर देती हैं। खरीदार लाचार होकर भटकते रहते हैं क्योंकि डायवर्ट किया गया पैसा या तो कभी ट्रैक ही नहीं हो पाता, या फिर उसे वापस लाने में इतनी देर हो जाती है कि उसका कोई फायदा नहीं बचता।”
14,000 करोड़ की लूट पर सिर्फ 400 करोड़ की जब्ती!
इस याचिका में घोटाले की विशालता और जांच एजेंसियों द्वारा अब तक की गई रिकवरी (वसूली) के बीच के भारी अंतर पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कोर्ट का ध्यान इस बात पर आकर्षित किया कि जहां हेराफेरी की कुल रकम ₹14,000 करोड़ से अधिक की है, वहीं ED ने अब तक केवल ₹400 करोड़ की संपत्तियों को ही अस्थायी रूप से कुर्क (Provisionally Attach) किया है।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से मांग की कि वह ED को इस जांच में तेजी लाने और उन सभी जमीनों तथा विकास अधिकारों (Development Rights) को तुरंत कुर्क करने का निर्देश दे, जहां इस घोटाले का पैसा लगाया गया है। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा, “अगर लूटा गया पैसा वापस नहीं आता, तो इस पूरी जांच का पीड़ितों के लिए कोई मूल्य नहीं रह जाएगा। जब तक रिकवरी नहीं होगी, खरीदारों को कोई राहत नहीं मिल सकती।”
इसके अलावा, याचिका में रिजर्व बैंक (RBI) को भी उन बैंकों का फॉरेंसिक ऑडिट करने का निर्देश देने की मांग की गई है जिन्होंने इन अटके हुए प्रोजेक्ट्स को भारी कर्ज दिया था। भूषण ने कहा कि बैंकों का पैसा डूबने से देश की वित्तीय प्रणाली को भी बड़ा नुकसान हो रहा है, इसलिए RBI को इस पर देशव्यापी गाइडलाइंस जारी करनी चाहिए।
रिफंड के नाम पर खरीदारों के साथ भद्दा मजाक
याचिका में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के जरिए खरीदारों को दिए जा रहे रिफंड के विकल्पों पर भी गहरी नाराजगी जताई गई है।
वर्तमान नियमों के तहत, जो खरीदार अब इन अटके हुए प्रोजेक्ट्स से थककर अपना पैसा वापस चाहते हैं, उन्हें केवल उनकी मूल राशि (Principal Amount) ही वापस करने की पेशकश की जा रही है, जो उन्होंने आज से 12 साल पहले जमा की थी। इस रिफंड पर उन्हें एक रुपये का ब्याज भी नहीं मिल रहा है।
प्रशांत भूषण ने इस वित्तीय अन्याय को उजागर करते हुए कहा, “आज अगर कोई खरीदार रिफंड मांगता है, तो उसे एक दशक से भी पहले चुकाई गई मूल रकम थमा दी जाती है, वह भी बिना किसी ब्याज के। जबकि हकीकत यह है कि आज उसी फ्लैट की बाजार कीमत तीन गुना से अधिक बढ़ चुकी है।”
सुप्रीम कोर्ट ने ED से मांगी स्टेटस रिपोर्ट
मामले की गंभीरता और इसके विशाल पैमाने को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इन मुद्दों को बेहद “जटिल” माना।
पीठ ने टिप्पणी की कि कोर्ट ने पहले भी इसी तरह के एक रियल एस्टेट घोटाले की जांच सीबीआई (CBI) को सौंपी थी, लेकिन इस विशेष मामले में ED पहले से ही मनी लॉन्ड्रिंग के तहत अपनी कार्रवाई कर रही है। कोर्ट को बताया गया कि दिल्ली और यूपी पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) द्वारा दर्ज शुरुआती प्राथमिकियों (FIRs) के आधार पर ही ED ने अपना प्रवर्तन मामला सूचना पत्र (ECIR) दर्ज किया है।
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, “पहले हम यह देख लें कि इस मामले पर सभी पक्षों का क्या कहना है।” इसके साथ ही उन्होंने ED को निर्देश दिया कि वह अपनी अब तक की जांच की प्रगति को लेकर कोर्ट में एक विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट (Status Report) दाखिल करे।
अब सभी की नजरें 15 जुलाई पर टिकी हैं, जब केंद्र सरकार, रिजर्व बैंक, ED और आरोपी डेवलपर्स को कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखना होगा। इस सुनवाई से यह साफ होगा कि हजारों मध्यमवर्गीय परिवारों को न्याय दिलाने और उनके आशियाने के सपने को बचाने के लिए सरकार और कानून के पास क्या ठोस योजना है।

