बार काउंसिल चुनाव विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने दिए दो नए ट्रिब्यूनल बनाने के आदेश, रिटायर्ड जजों के हाथों में होगी कमान

राज्य बार काउंसिलों के चुनावों में बढ़ते विवादों और मुकदमों के त्वरित निपटारे के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक बड़ा कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने राज्य बार काउंसिल चुनावों से जुड़ी सभी शिकायतों और विवादों की सुनवाई के लिए दो विशेष चुनावी न्यायाधिकरणों (इलेक्शन ट्रिब्यूनल) के गठन का आदेश दिया है।

इन नए न्यायाधिकरणों की कमान सुप्रीम कोर्ट के दो सेवानिवृत्त न्यायाधीशों, जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस हिमा कोहली को सौंपी जाएगी।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को निर्देश दिया कि वे इन दोनों सेवानिवृत्त न्यायाधीशों से ट्रिब्यूनल का नेतृत्व करने के लिए जल्द से जल्द उनकी औपचारिक सहमति प्राप्त करें।

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा, “एक चुनावी न्यायाधिकरण की अध्यक्षता जस्टिस दीपक गुप्ता करेंगे और दूसरे की अध्यक्षता जस्टिस हिमा कोहली करेंगी। बीसीआई तुरंत उनकी सहमति प्राप्त कर इन दोनों न्यायाधिकरणों का गठन सुनिश्चित करे। चुनाव से जुड़ी सभी शिकायतों को अब सीधे इन्हीं गठित ट्रिब्यूनलों के समक्ष भेजा जाएगा।”

मुकदमों की बढ़ती बाढ़ को रोकना है मुख्य उद्देश्य

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश के विभिन्न राज्यों में बार काउंसिल चुनावों के दौरान सामने आ रही मुकदमेबाजी की बाढ़ को देखते हुए आया है। लगातार होने वाले मुकदमों के कारण चुनाव प्रक्रिया प्रभावित हो रही थी। अदालत का मानना है कि इन दो विशिष्ट ट्रिब्यूनलों के बन जाने से चुनाव संबंधी विवादों का निपटारा एक ही जगह और बिना किसी देरी के हो सकेगा, जिससे बार परिषदों के कामकाज में प्रशासनिक स्थिरता बनी रहेगी।

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महिला प्रतिनिधित्व और ‘को-ऑप्शन’ का पेच

इस महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान राज्य बार काउंसिलों में महिला वकीलों को 30 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने के ऐतिहासिक फैसले के क्रियान्वयन पर भी चर्चा हुई। गौरतलब है कि दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य बार काउंसिलों में महिला वकीलों के लिए 30 फीसदी सीटें आरक्षित करने का आदेश दिया था।

इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए एक ‘को-ऑप्शन’ (सह-चयन) तंत्र का प्रावधान किया गया है। इसके तहत, यदि सामान्य चुनावी प्रक्रिया के जरिए पर्याप्त संख्या में महिला वकील चुनकर नहीं आ पाती हैं, तो शेष बची सीटों को भरने के लिए अधिकतम 10 प्रतिशत तक महिला उम्मीदवारों को को-ऑप्शन के माध्यम से शामिल किया जा सकता है।

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हालांकि, इस को-ऑप्शन के तौर-तरीकों को लेकर विवाद खड़ा हो गया था, और इसके प्रशासनिक दुरुपयोग को लेकर चिंताएं जताई जा रही थीं।

हाई-पावर्ड कमेटी तय करेगी को-ऑप्शन के नियम

इस विवाद और चिंताओं का समाधान करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि को-ऑप्शन की सटीक प्रक्रिया और नियम तय करने की जिम्मेदारी पहले से गठित ‘हाई-पावर्ड इलेक्शन सुपरवाइजरी कमेटी’ की होगी। 13 अप्रैल को शीर्ष अदालत ने दोहराया कि पूर्व जस्टिस सुधांशु धूलिया की अगुआई वाली यह उच्च-अधिकार प्राप्त समिति ही तय करेगी कि 30 प्रतिशत आरक्षण के लक्ष्य को पूरा करने के लिए महिला उम्मीदवारों का को-ऑप्शन किस तरह और किस नियम के तहत किया जाए।

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मुख्य न्यायाधीश की पीठ द्वारा बार काउंसिल चुनावों की देखरेख के लिए गठित इस उच्च स्तरीय समिति में जस्टिस सुधांशु धूलिया के अलावा पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रवि शंकर झा और वरिष्ठ अधिवक्ता वी गिरी भी शामिल हैं।

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