दिव्यांगों के लिए बीमा नियमों में बदलाव की मांग: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और LIC से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने यह कदम उस याचिका पर उठाया है जिसमें कल्याणकारी बीमा योजनाओं को दिव्यांगों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील बनाने और उनके लिए विशेष दिशा-निर्देश तैयार करने की मांग की गई है।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने 13 अप्रैल को दिए अपने आदेश में प्रतिवादियों को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। यह याचिका विशेष रूप से LIC की ‘जीवन आधार’ जैसी नीतियों पर सवाल उठाती है और मांग करती है कि बीमा योजनाओं का क्रियान्वयन संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण) के अनुरूप होना चाहिए।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि बौद्धिक, मानसिक या जन्मजात दिव्यांगता वाले लाभार्थियों को मौजूदा बीमा प्रक्रियाओं में कई बाधाओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे व्यक्ति अक्सर अपने कानूनी अधिकारों को स्वतंत्र रूप से समझने या उन्हें व्यक्त करने में सक्षम नहीं होते। याचिका में मांग की गई है कि ऐसे मामलों में दावों का निपटारा “मानवीय और संवेदी” तरीके से किया जाना चाहिए, न कि केवल तकनीकी या यांत्रिक प्रक्रिया के आधार पर।

यह याचिका मुख्य रूप से LIC की ‘जीवन आधार’ पॉलिसी पर केंद्रित है। वर्तमान में, यह पॉलिसी उन व्यक्तियों को दी जाती है जिनके पास आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 80DDA के तहत निर्दिष्ट शर्तों को पूरा करने वाले दिव्यांग आश्रित हैं।

याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि ‘जीवन आधार’ योजना के तहत दिव्यांगों के लिए एन्युटी (वार्षिकी) की प्रक्रिया स्वचालित होनी चाहिए। मांग की गई है कि जैसे ही पॉलिसीधारक 60 वर्ष की आयु (या निर्धारित आयु) प्राप्त कर ले, दिव्यांग आश्रित को मिलने वाली राशि खुद-ब-खुद शुरू हो जानी चाहिए, ताकि उन्हें जटिल कागजी कार्रवाई से न गुजरना पड़े।

पूरा मामला टैक्स कानून और मौलिक अधिकारों के मेल पर आधारित है:

  • धारा 80DDA: आयकर अधिनियम की यह धारा दिव्यांग आश्रितों के रखरखाव के लिए जमा की गई राशि पर कटौती की अनुमति देती है।
  • संवैधानिक गारंटी: याचिकाकर्ताओं का कहना है कि दिव्यांगों के बीमा दावों में केवल अनुबंधों की तकनीकी व्याख्या करना अनुच्छेद 21 के तहत उन्हें दिए गए सम्मानजनक जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन है।
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इस याचिका के माध्यम से कोर्ट से अपील की गई है कि वह LIC को अपनी नीतियों में ऐसे सुधार करने का निर्देश दे, जो दिव्यांगों की विशेष परिस्थितियों को पहचानते हों।

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