रोहतक के एक उपभोक्ता आयोग ने निजी मेडिकल कॉलेज को पूर्व एमबीबीएस छात्र की ₹2.25 लाख की सिक्योरिटी और लाइब्रेरी जमा राशि लौटाने का निर्देश दिया है। आयोग ने कहा कि केवल मूल रसीद पेश न कर पाने के आधार पर उस रकम को रोककर नहीं रखा जा सकता, जब भुगतान के समर्थन में अन्य दस्तावेज मौजूद हों।
आयोग ने छात्र को मानसिक परेशानी और उत्पीड़न के लिए ₹10,000 मुआवजा तथा मुकदमे के खर्च के रूप में ₹5,000 देने का भी आदेश दिया। इस तरह कॉलेज को कुल ₹2.40 लाख का भुगतान करना होगा।
आयोग के अध्यक्ष नागेंद्र सिंह कादियान और सदस्य डॉ. तृप्ति पन्नू तथा डॉ. विजेंद्र सिंह ने 24 सितंबर को 26 वर्षीय पूर्व मेडिकल छात्र की शिकायत पर यह आदेश पारित किया।
केवल मूल रसीद न होना रिफंड रोकने का आधार नहीं
आयोग ने पाया कि छात्र द्वारा जमा की गई सिक्योरिटी राशि के समर्थन में दस्तावेजी रिकॉर्ड उपलब्ध था। कॉलेज यह भी साबित नहीं कर सका कि रकम पहले ही वापस की जा चुकी थी, किसी अन्य मद में समायोजित की गई थी या छात्र की किसी वैध देनदारी के लिए इस्तेमाल हुई थी।
आयोग ने यह भी नोट किया कि रसीद की प्रति रिकॉर्ड पर मौजूद थी और छात्र ने मूल रसीद खो जाने के संबंध में हलफनामा भी दिया था।
इन परिस्थितियों में केवल मूल रसीद न होने के कारण सिक्योरिटी और लाइब्रेरी सिक्योरिटी की रकम रोकना सेवा में कमी माना गया।
2012 में जमा किए थे ₹2.25 लाख
छात्र ने बताया कि उसने 2012 में निजी मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया था। उसने 15 सितंबर 2012 को ₹2 लाख रिफंडेबल सिक्योरिटी और ₹25,000 रिफंडेबल लाइब्रेरी सिक्योरिटी के रूप में जमा किए थे।
बाद में प्रशासनिक कारणों से संस्थान बंद हो गया और उसके छात्रों को हरियाणा के अलग-अलग मेडिकल कॉलेजों में स्थानांतरित कर दिया गया। शिकायतकर्ता को 2017 में हिसार के एक कॉलेज में भेजा गया, जहां उसने इंटर्नशिप सहित एमबीबीएस की पढ़ाई जनवरी 2019 में पूरी की।
इसके बाद उसने 2019 में प्राचार्य को आवेदन देकर ₹2.25 लाख वापस करने की मांग की और रसीद की प्रति भी संलग्न की। हालांकि, कॉलेज ने उससे मूल रसीद पेश करने को कहा।
छात्र का कहना था कि मूल रसीद खो गई थी और काफी तलाश के बाद भी नहीं मिली। कई बार अनुरोध करने के बावजूद रकम वापस नहीं की गई, जिसके बाद उसने उपभोक्ता आयोग का रुख किया।
आयोग के समक्ष छात्र की ओर से अधिवक्ता अनुराग मलिक पेश हुए।
कॉलेज ने मूल रसीद पर दिया जोर
कॉलेज ने दलील दी कि मूल रसीद के बिना सिक्योरिटी राशि वापस नहीं की जा सकती। यह भी कहा गया कि सभी बैच के छात्रों को मूल फीस रसीद जमा करने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन शिकायतकर्ता ने ऐसा नहीं किया।
आयोग ने हालांकि पाया कि यह तथ्य विवादित नहीं था कि शिकायतकर्ता पुराने कॉलेज का छात्र था और बाद में उसे दूसरे कॉलेज में स्थानांतरित किया गया था।
आयोग ने यह भी नोट किया कि कॉलेजों ने स्वयं माना था कि सरकारी निर्णय के बाद इसी स्थिति वाले अन्य छात्रों की सिक्योरिटी राशि वापस की गई थी। रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि कुछ छात्रों को बाद में रसीद जमा करने पर रिफंड दिया गया था।
आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि रिकॉर्ड से सिक्योरिटी राशि के रिफंडेबल होने की पुष्टि होती है। इसके बाद कॉलेज को ₹2.25 लाख वापस करने के साथ ₹10,000 मुआवजा और ₹5,000 मुकदमे का खर्च देने का निर्देश दिया गया।

