पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने आम आदमी पार्टी सरकार की भूमि पूलिंग नीति पर चार सप्ताह की रोक लगाई; विपक्ष ने कहा किसानों की ऐतिहासिक जीत

पंजाब सरकार की विवादित भूमि पूलिंग नीति को बड़ा झटका देते हुए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने गुरुवार को इस नीति के क्रियान्वयन पर चार सप्ताह की अंतरिम रोक लगा दी। विपक्षी दलों ने अदालत के इस फैसले को “पंजाब के किसानों की ऐतिहासिक जीत” बताया है।

यह रोक लुधियाना के गुरदीप सिंह गिल द्वारा दायर एक याचिका पर लगाई गई है, जिसमें उन्होंने पंजाब भूमि पूलिंग नीति, 2025 को असंवैधानिक और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी थी। अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 10 सितंबर की तारीख तय की है।

याचिकाकर्ता के वकील गुरजीत सिंह ने बताया कि अदालत ने राज्य सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस नीति को लागू करने से पहले न तो सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन किया गया और न ही पर्यावरणीय मूल्यांकन, जबकि यह कानूनी रूप से अनिवार्य है। उन्होंने 24 जून को जारी अधिसूचना को “रंगरूट कानून” (colourable legislation) बताया।

अदालत ने पुनर्वास और कानूनी आधार पर उठाए सवाल

बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार से पूछा कि क्या इस नीति में भूमिहीन मजदूरों के पुनर्वास का प्रावधान है और क्या अधिसूचना से पहले कोई सामाजिक प्रभाव अध्ययन कराया गया था। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि राज्य सरकार के पास भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में पारदर्शिता और उचित मुआवजा अधिनियम, 2013 के तहत ऐसी नीति बनाने का कोई अधिकार नहीं है। इसके बजाय केवल पंजाब क्षेत्रीय और नगर नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1995 के तहत ही ऐसा प्रावधान संभव है।

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याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि किसी भी ग्राम पंचायत या ग्राम सभा से सलाह-मशविरा नहीं किया गया, जो कि 2013 के अधिनियम का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता ने कहा कि जब कोई वैधानिक समाधान उपलब्ध नहीं था, तब अदालत का रुख करना ही एकमात्र उपाय बचा था।

सरकार का पक्ष: यह अधिग्रहण नहीं, स्वैच्छिक योजना है

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता जसतेज सिंह ने नीति का बचाव करते हुए कहा कि यह कोई भूमि अधिग्रहण नहीं है, बल्कि पूरी तरह स्वैच्छिक योजना है।

उन्होंने अदालत को बताया, “यह एक योजना है जिसमें दो या चार एकड़ ज़मीन रखने वाला मालिक भी स्वेच्छा से विकास के लिए ज़मीन दे सकता है। बदले में उसे विकसित भूखंड वापस मिलते हैं।” उन्होंने कहा कि इन भूखंडों के लिए एक इरादा पत्र (Letter of Intent) जारी किया जाएगा और सरकार की ओर से किसी प्रकार का दबाव नहीं है।

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सिंह ने कहा कि राज्य सरकार आगे की कार्रवाई का फैसला अदालत के विस्तृत आदेश के बाद ही करेगी।

विपक्ष ने फैसले का स्वागत किया, नीति को वापस लेने की मांग की

अदालत की अंतरिम रोक के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई। विपक्षी दलों ने इसे आम आदमी पार्टी सरकार की “कानूनी और नैतिक हार” बताया।

पंजाब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस नेता प्रताप सिंह बाजवा ने इस नीति को “गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण और असंवैधानिक” बताते हुए मुख्यमंत्री भगवंत मान से इस्तीफे की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि यह नीति “दिल्ली आधारित कॉरपोरेट लॉबी” के दबाव में लाई गई है और पंजाब की उपजाऊ ज़मीन को “भूमि माफियाओं” के हवाले किया जा रहा है।

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पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने कहा कि किसानों की चिंताएं सही साबित हुई हैं और पार्टी “कानूनी, वैधानिक और लोकतांत्रिक तरीकों” से इस नीति के खिलाफ लड़ाई जारी रखेगी।

शिरोमणि अकाली दल के नेता दलजीत सिंह चीमा ने भी अदालत के हस्तक्षेप का स्वागत करते हुए कहा कि जनता के विरोध के बावजूद आम आदमी पार्टी की केंद्रीय नेतृत्व के दबाव में यह नीति थोपी जा रही थी।

पृष्ठभूमि: क्या है भूमि पूलिंग नीति, 2025

24 जून को पंजाब सरकार द्वारा अधिसूचित भूमि पूलिंग नीति, 2025 का उद्देश्य निजी ज़मीन को समुचित योजना के तहत एकत्र कर उसे नागरिक सुविधाओं से सुसज्जित कर पुनः मालिकों को थोड़ा कम क्षेत्रफल में लेकिन अधिक मूल्य की भूमि लौटाना था। इस योजना को शहरी विकास को बढ़ावा देने के रूप में प्रस्तुत किया गया था।

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