असम सीएम की पत्नी पर टिप्पणी का मामला: पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। यह मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी के खिलाफ की गई टिप्पणियों से जुड़ा है, जिसमें खेड़ा ने उन पर एक से अधिक पासपोर्ट और विदेश में अघोषित संपत्ति रखने के आरोप लगाए थे।

यह कानूनी विवाद पवन खेड़ा द्वारा दिए गए उन बयानों से शुरू हुआ था, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी, रिनिकी भुइयां शर्मा के पास कई देशों के पासपोर्ट हैं और उन्होंने विदेशों में संपत्ति छुपा रखी है। इन आरोपों के बाद, रिनिकी भुइयां शर्मा ने गुवाहाटी क्राइम ब्रांच में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत पवन खेड़ा और अन्य के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज कराए थे।

शुरुआत में, तेलंगाना हाईकोर्ट ने खेड़ा को सात दिनों की ट्रांजिट अग्रिम जमानत दी थी। हालांकि, असम पुलिस ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसके बाद शीर्ष अदालत ने ट्रांजिट जमानत पर रोक लगाते हुए खेड़ा को गुवाहाटी हाईकोर्ट जाने का निर्देश दिया था। 24 अप्रैल को गुवाहाटी हाईकोर्ट ने उन्हें अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद उन्होंने फिर से सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

पवन खेड़ा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस एएस चांदुरकर की पीठ के समक्ष तर्क दिया कि उनके मुवक्किल के खिलाफ लगाए गए आरोप सुनवाई (ट्रायल) का विषय हैं और इसके लिए उन्हें गिरफ्तार कर अपमानित करना जरूरी नहीं है। सिंघवी ने कहा कि जिन धाराओं के तहत मामला दर्ज है, उनमें से कुछ जमानती हैं और अन्य में तत्काल गिरफ्तारी की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि ऐसे मामलों में भी अग्रिम जमानत नहीं मिलती है, तो पूर्व-गिरफ्तारी जमानत का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।

दूसरी ओर, असम सरकार का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि मुख्यमंत्री की पत्नी के खिलाफ लगाए गए सभी आरोप पूरी तरह झूठे हैं और खेड़ा ने इसके लिए “फर्जी और छेड़छाड़ किए गए” पासपोर्ट की प्रतियों का सहारा लिया है। सॉलिसिटर जनरल ने यह भी आरोप लगाया कि खेड़ा कानूनी प्रक्रिया से बच रहे हैं और “फरार” रहते हुए भी लगातार वीडियो जारी कर रहे हैं।

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दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पीठ ने अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया। अब अदालत यह तय करेगी कि क्या कांग्रेस नेता को असम में दर्ज आपराधिक मामलों की सुनवाई लंबित रहने तक गिरफ्तारी से सुरक्षा दी जानी चाहिए या नहीं।

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