आपराधिक कार्यवाही पर रोक होने पर पासपोर्ट को रोका नहीं जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि किसी आपराधिक मामले की कार्यवाही पर उच्च न्यायालय द्वारा रोक लगा दी गई है, तो जब्त किए गए पासपोर्ट को जारी किया जाना चाहिए। मामले की प्रकृति को “मामूली” (petty nature) बताते हुए, हाईकोर्ट ने क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय को तीन सप्ताह के भीतर पासपोर्ट वापस करने का आदेश दिया है।

यह आदेश जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने सुनील कुमार सिंह द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ता ने पासपोर्ट विभाग द्वारा उसके पासपोर्ट को जब्त किए जाने के निर्णय को चुनौती दी थी, जो एक लंबित आपराधिक मामले के आधार पर लिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता का पासपोर्ट क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय (प्रतिवादी संख्या 2) द्वारा वर्ष 2020 के एक आपराधिक मामले के कारण जब्त किया गया था। यह मामला लखनऊ के विभूति खंड थाने में आईपीसी की धारा 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), 406 (आपराधिक विश्वासघात) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत दर्ज किया गया था।

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट को सूचित किया कि उसने पासपोर्ट वापस पाने के लिए विभाग को नया प्रतिवेदन दिया था। उसने दलील दी कि हाईकोर्ट ने पहले ही एक अन्य आवेदन (धारा 482 संख्या 7772 वर्ष 2025) के तहत इस पूरे आपराधिक मामले की कार्यवाही पर रोक लगा दी है और इससे संबंधित दस्तावेज भी पासपोर्ट कार्यालय को उपलब्ध कराए जा चुके हैं।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से वकील श्री शिवांशु गोस्वामी, अर्पित वर्मा और प्रेरणा जालान ने तर्क दिया कि चूंकि ट्रायल कोर्ट की पूरी कार्यवाही पर हाईकोर्ट द्वारा रोक लगा दी गई है, इसलिए पासपोर्ट को जब्त रखने का अब कोई कानूनी आधार नहीं रह गया है।

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वहीं, क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय की ओर से पेश हुए श्री एस.बी. पांडेय (सीनियर एडवोकेट एवं DSGI), जिनके साथ श्री वरुण पांडेय भी थे, ने विरोध करते हुए कहा कि पासपोर्ट वापस पाने के लिए याचिकाकर्ता को संबंधित मजिस्ट्रेट से अनुमति लेनी चाहिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा रीता वर्मा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2024) के मामले में प्रतिपादित सिद्धांतों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि पासपोर्ट की बहाली के लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति आवश्यक है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

मामले के तथ्यों का अवलोकन करने के बाद, बेंच ने पाया कि आईपीसी की धारा 323, 406 और 506 के तहत दर्ज यह मामला काफी मामूली प्रकृति का है। हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि वह पहले ही मामले की मेरिट को देखते हुए ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगा चुका है।

बेंच ने टिप्पणी की:

“विभिन्न प्रावधानों, जिन पर यह आपराधिक मामला आधारित है, के अवलोकन के बाद हमारा विचार है कि यह मामला मामूली प्रकृति का है और यह वर्ष 2020 में दर्ज किया गया था… हमारा मानना है कि चूंकि मामला जब्त पासपोर्ट को वापस करने से संबंधित है और हाईकोर्ट पहले ही रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर विचार करने के बाद ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगा चुका है, इसलिए हम संबंधित अधिकारियों को याचिकाकर्ता का पासपोर्ट कानून के अनुसार जारी करने का निर्देश देते हैं।”

न्यायालय का निर्णय

हाईकोर्ट ने रिट याचिका को निस्तारित करते हुए पासपोर्ट कार्यालय को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता का पासपोर्ट इस आदेश की तारीख से तीन सप्ताह के भीतर कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए वापस करे।

केस विवरण:

  • केस शीर्षक: सुनील कुमार सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, सचिव विदेश मंत्रालय, नई दिल्ली और अन्य के माध्यम से
  • केस संख्या: रिट-सी संख्या 2187 वर्ष 2026
  • बेंच: जस्टिस शेखर बी. सराफ, जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी
  • तारीख: 13 अप्रैल, 2026

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