केरल हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि जब तक नया कानून बनकर तैयार नहीं हो जाता, तब तक प्रस्तावित एंटी-रैगिंग बिल के तहत तय की गई कार्यप्रणालियों और नियमों को लागू किया जाए।
मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और जस्टिस सी जयचंद्रन की विशेष पीठ ने यह निर्देश तब जारी किया, जब सरकार की ओर से अदालत को सूचित किया गया कि ड्राफ्ट बिल फिलहाल विचाराधीन है और इसे अंतिम रूप देने में कुछ समय लग सकता है। सुनवाई के दौरान पीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक राज्य विधायिका द्वारा विधेयक को अंतिम मंजूरी नहीं मिल जाती, तब तक प्रस्तावित मसौदे में शामिल दिशानिर्देशों का पालन किया जाना चाहिए।
निगरानी तंत्र की मांग और KeLSA की याचिका
हाईकोर्ट का यह आदेश केरल राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (KeLSA) द्वारा पिछले वर्ष दायर की गई एक याचिका पर आया है। KeLSA ने अपनी याचिका में एंटी-रैगिंग कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करने और शैक्षणिक संस्थानों में रैगिंग की घटनाओं को रोकने के लिए एक राज्यस्तरीय निगरानी ढांचा स्थापित करने का अनुरोध किया था।
याचिका में प्राधिकरण ने कहा कि रैगिंग शैक्षणिक संस्थानों में गहराई से जकड़ा एक सामाजिक अभिशाप है, जो छात्रों को गंभीर मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक नुकसान पहुंचाता है। KeLSA का तर्क था कि कड़े नियमों और अदालती फैसलों के बावजूद ऐसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं, जो मौजूदा कानूनों के प्रवर्तन और प्रशासनिक जवाबदेही में बड़ी कमियों को दर्शाती हैं।
हालिया घटनाओं का हवाला
कानूनी प्रवर्तन में आ रही विफलताओं को रेखांकित करने के लिए याचिकाकर्ता ने हाल की कई घटनाओं का उल्लेख किया। इनमें कोट्टायम जिले के एक सरकारी नर्सिंग कॉलेज, तिरुवनंतपुरम जिले के कार्यवट्टम स्थित सरकारी संस्थान और कोझिकोड जिले के एक निजी कॉलेज में छात्रों के उत्पीड़न की मामले शामिल हैं।
प्राधिकरण ने जोर देकर कहा कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए राज्य और जिला, दोनों स्तरों पर एक मजबूत एवं व्यवस्थित निगरानी प्रणाली बनाई जानी चाहिए ताकि सभी परिसरों में सुरक्षा और नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित हो सके।

