1988 में हुई व्यक्ति की मौत, 1993 में उसके नाम पर दायर हुई रिट याचिका: कर्नाटक हाईकोर्ट ने माना तथ्यों को छिपाया गया, याचिकाकर्ताओं पर लगाया ₹10,000 का जुर्माना

कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक भूमि विवाद से जुड़ी रिट याचिका खारिज करते हुए 1981 में एक काश्तकार (टेनेंट) के पक्ष में दिए गए अधिभोग अधिकार (ऑक्यूपेंसी राइट्स) के आदेश को बरकरार रखा है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी मृत व्यक्ति के नाम पर शुरू की गई कानूनी कार्यवाही कानून की नजर में अमान्य (शून्य) होती है और अदालत से महत्वपूर्ण तथ्य छिपाने वाले पक्षकार संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत किसी भी न्यायसंगत या विवेकाधीन राहत के हकदार नहीं हैं। एकल पीठ के जस्टिस ई.एस. इंदीरेश ने मृतक भूस्वामी के कानूनी वारिसों द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए उन पर कर्नाटक राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण, बेंगलुरु को 10,000 रुपये का जुर्माना (कॉस्ट्स) चुकाने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह पूरा मामला श्रीमती सी. निंगम्मा द्वारा दायर फॉर्म नंबर 7 से जुड़ा है। उन्होंने श्रीरंगपट्टण तालुक के बेलावाड़ी गांव स्थित सर्वे नंबर 38 की 4 एकड़ 21 गुंठा जमीन पर काश्तकार के रूप में अधिभोग अधिकार की मांग की थी। इस जमीन के मूल मालिक सी. मरियप्पा थे। भूमि अधिकरण (लैंड ट्रिब्यूनल), श्रीरंगपट्टण ने 9 नवंबर 1981 को आदेश पारित कर श्रीमती सी. निंगम्मा के पक्ष में अधिभोग अधिकार मंजूर कर दिया था।

इस फैसले के खिलाफ अपीलीय अधिकरण के समक्ष एलआरआरपी संख्या 527/1986 दायर की गई, जिसे बाद में हाईकोर्ट में रिट याचिका संख्या 34939/1993 के रूप में दर्ज किया गया। हाईकोर्ट ने 4 अक्टूबर 2001 को इस रिट याचिका को स्वीकार करते हुए मामले को नए सिरे से विचार के लिए वापस लैंड ट्रिब्यूनल को भेज दिया (रिमांड कर दिया)।

मामला रिमांड होने के बाद लैंड ट्रिब्यूनल में नए सिरे से कार्यवाही शुरू हुई। अधिकरण ने अंततः 11 मार्च 2023 को एलआरटी 175/1981-82 में अपना आदेश पारित किया। इस आदेश के खिलाफ स्वर्गीय सी. मरियप्पा के कानूनी वारिसों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और रिट याचिका संख्या 6541/2024 दायर कर 2023 के आदेश को रद्द करने की मांग की।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं के वकील ने लैंड ट्रिब्यूनल की कार्यवाही की क्रम-सूची (ऑर्डर शीट) का हवाला देते हुए तर्क दिया कि रिमांड के बाद की पूरी प्रक्रिया उनकी अनुपस्थिति में और उन्हें बिना सुने पूरी की गई। उन्होंने दलील दी कि 21 सितंबर 2022 को मामले की सुनवाई 2 नवंबर 2022 के लिए स्थगित की गई थी ताकि मौका मुआयना (स्पॉट इंस्पेक्शन) किया जा सके, लेकिन उस तारीख को अधिकरण की कोई बैठक ही नहीं हुई। इसके अलावा 11 मार्च 2023 को ऑर्डर शीट में अगली तारीख 15 मार्च 2023 दर्ज की गई थी, लेकिन याचिकाकर्ताओं को सुनवाई का कोई मौका दिए बिना या अगला नोटिस जारी किए बिना उसी दिन अंतिम आदेश पारित कर दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यह नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है, इसलिए हाईकोर्ट को दखल देना चाहिए।

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इसके विपरीत, निजी प्रतिवादी संख्या 2 से 7 और 9 से 11 की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि श्रीमती सी. निंगम्मा को 9 नवंबर 1981 को ही अधिभोग अधिकार मिल चुके थे। उन्होंने बताया कि सी. मरियप्पा ने 22 जुलाई 1987 को श्री बदरुद्दीन खान के पक्ष में पावर ऑफ अटॉर्नी निष्पादित की थी, लेकिन 8 अगस्त 1988 को मरियप्पा का निधन हो गया। कानून के तहत किसी व्यक्ति की मृत्यु होते ही उसके द्वारा दी गई पावर ऑफ अटॉर्नी (एजेंसी) स्वतः समाप्त हो जाती है।

वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि मरियप्पा की मौत के लगभग 13 साल बाद वर्ष 2001 में हाईकोर्ट द्वारा पारित रिमांड आदेश कानूनन कोई मायने नहीं रखता, क्योंकि 1993 में याचिका एक मृत व्यक्ति के नाम पर दायर की गई थी और उस समय निंगम्मा का कोई प्रतिनिधित्व भी नहीं था। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि जब पहली याचिकाकर्ता ने 20 दिसंबर 2011 को लैंड ट्रिब्यूनल में पक्षकार बनने का आवेदन दिया, तब उन्होंने जानबूझकर मरियप्पा की मृत्यु की सही तारीख छिपाई और अस्पष्ट रूप से केवल इतना लिखा कि उनका निधन “काफी समय पहले” हो चुका था। प्रतिवादियों ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छुपाया है, न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग किया है और वे गंदे हाथों से अदालत आए हैं, इसलिए याचिका भारी जुर्माने के साथ खारिज होनी चाहिए।

राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सरकारी वकील ने लैंड ट्रिब्यूनल के आदेश को उचित ठहराते हुए अधिकरण का मूल रिकॉर्ड अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

मूल दस्तावेजों और रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि 8 अगस्त 1988 को सी. मरियप्पा की मृत्यु का तथ्य रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों से पूरी तरह साबित है। इसके बावजूद याचिकाकर्ता यह समझाने में विफल रहे कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के वर्षों बाद उसके पावर ऑफ अटॉर्नी धारक के जरिए हाईकोर्ट में याचिका कैसे दायर की गई।

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जस्टिस इंदीरेश ने कहा कि चूंकि 1988 में भूस्वामी की मृत्यु हो चुकी थी, इसलिए 9 नवंबर 1981 को श्रीमती सी. निंगम्मा के पक्ष में दिया गया आदेश पहले ही अंतिम रूप ले चुका था, क्योंकि कानूनन उस आदेश को चुनौती देने वाली कोई वैध याचिका कभी दायर ही नहीं हुई थी। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“यह भी उल्लेखनीय है कि उस कार्यवाही में प्रतिवादी संख्या 4 श्रीमती निंगम्मा का प्रतिनिधित्व नहीं था। ये परिस्थितियां स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं कि इस अदालत के समक्ष सही और महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया गया और कार्यवाही गलत बयानी के आधार पर चलाई गई। इसे देखते हुए मुझे निजी प्रतिवादियों के विद्वान वरिष्ठ वकील की इस दलील में पर्याप्त दम नजर आता है कि मामले को लैंड ट्रिब्यूनल को रिमांड करने वाला इस अदालत का आदेश कानून की नजर में कोई आदेश नहीं है।”

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के मौलवी ईसा कुरैशी बनाम डिस्ट्रिक्ट जज, देवरिया व अन्य फैसले का उल्लेख किया, जिसमें स्पष्ट किया गया था:

“तथ्यों के विवरण से यह साफ है कि जब किसी मृत व्यक्ति को जीवित दर्शाते हुए उसकी ओर से मुकदमा दायर किया गया और सह-वादी को मुकदमे में शामिल किया गया, तो यह स्पष्ट है कि सह-वादी ने अदालत के साथ धोखाधड़ी की और न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग किया।”

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विक्रम भालचंद्र घोंगड़े बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य मामले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि मृत व्यक्तियों के पक्ष में दिया गया कोई भी निर्णय कानूनी रूप से शून्य होता है और उसका कोई कानूनी प्रभाव नहीं रहता।

लैंड ट्रिब्यूनल के समक्ष मरियप्पा की मृत्यु की तारीख न बताने के याचिकाकर्ताओं के आचरण की आलोचना करते हुए पीठ ने कहा:

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“गंदे हाथों से इस अदालत का दरवाजा खटखटाने के कारण, याचिकाकर्ता संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत किसी भी न्यायसंगत राहत के हकदार नहीं हैं।”

अदालत ने रिट क्षेत्राधिकार के बुनियादी सिद्धांतों पर सुप्रीम कोर्ट के के.डी. शर्मा बनाम स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड व अन्य मामले को उद्धृत किया:

“संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट और अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का क्षेत्राधिकार असाधारण, न्यायसंगत और विवेकाधीन है। वास्तविक न्याय करने के लिए ही विशेषाधिकार रिट जारी की जाती हैं। इसलिए, यह अत्यंत आवश्यक है कि रिट कोर्ट आने वाले याचिकाकर्ता को साफ हाथों से आना चाहिए, बिना कुछ छिपाए या दबाए सभी तथ्यों को अदालत के सामने रखना चाहिए और उचित राहत की मांग करनी चाहिए।”

इसके अलावा, पीठ ने प्रेस्टीज लाइट्स लिमिटेड बनाम स्टेट बैंक ऑफ इंडिया मामले का भी स्मरण कराया, जिसमें माना गया था कि जिस पक्षकार के हाथ साफ नहीं हैं, वह अदालत से रिट हासिल नहीं कर सकता।

फैसला

हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि 8 अगस्त 1988 को सी. मरियप्पा के निधन के बाद वर्ष 2001 में दिया गया रिमांड आदेश कानूनी रूप से शून्य था, इसलिए उसके आधार पर लैंड ट्रिब्यूनल में चली आगे की सारी कार्यवाही का कोई कानूनी महत्व नहीं है। इसके परिणामस्वरूप 9 नवंबर 1981 को श्रीमती सी. निंगम्मा को अधिभोग अधिकार देने वाला मूल आदेश अंतिम और प्रभावी माना जाएगा।

सुनवाई का मौका न मिलने संबंधी याचिकाकर्ताओं की दलील को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने रिट याचिका निरस्त कर दी। पीठ ने याचिकाकर्ताओं को आदेश की तिथि से दो महीने के भीतर कर्नाटक राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण, बेंगलुरु में 10,000 रुपये का हर्जाना जमा कराने का निर्देश दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: श्री सी. मरियाप्पा (मृतक, कानूनी वारिसों के जरिए) बनाम लैंड ट्रिब्यूनल, श्रीरंगपट्टण तालुक व अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 6541/2024
पीठ: जस्टिस ई.एस. इंदीरेश
निर्णय की तिथि: 31 अगस्त 2026

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